शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

माफ़ करे यह व्यग्य मधु कौडा पर नहीं है....

गिरीश पंकज
पान ठेले पर सनकी लेखक ने मीठा पान खाने के बाद  हमेशा की  तरह कड़वी बाते शुरू कर दी. उसके आते ही पानवाला भी खुश हो जाता है. उसकी बिक्री बढ़ जाता है न...लेखक को देख कर हम भी पहुँच गए पान खाने.
आसपास जैसे ही भीड़ जमा हुई तो लेखक महोदय ने शुरू कर दिया... गाँधी जी, धन्य हैं आप। तुसी ग्रेट हो जी । वंस अपन इ टाईम, आपने ही तो कहा था न,  कि आज़ादी के बाद देश में कोई भूखा-नंगा नहीं रहेगा? देख लो, आज बिल्कुल वैसा ही हो रहा है। राजनीति को धंधे का, मार्केटिंग का क्षेत्र समझ कर धंधे में माहिर जितने भी नंगे लोग थे, वे अब भूखे नहीं रहे। जब नंगे कहा जा रहा है, तो अपने देश का हर पढा-लिखा और अपढ़ आदमी तक समझ सकता है, कि इशारा छुटभैये नेताओं की ओर ही है। (अब लोग यहाँ ये न समझ लें कि मेरा इशारा आदरणीय मधु कौडा जी की ओर है. न- न-न,वे  बेचारे तो बड़े शरीफ है. छुटभैये नहीं . इनको नंगा भी नहीं कहा जा सकता और भूखा भी नहीं. अरबपति है अगला. इस नेता ने सबको बता दिया कि मौका मिले तो पिछड़ा आदमी भी पैसे वाला बन सकता है और स्विस बैंक तक अपनी कमाई जमा कर सकता है)  तो मित्रो,  भले आदमी पर कोई व्यंग्य करता है भला। कुछ नेता इस धरा पर केवल पैसे कमाने के लिए ही जन्मे हैं । राजनीति क्यों कर रहे हैं। कोइ धंधा करते। इस पर उनके मुँहलगे चमचे कहते हैं, कि राजनीति अब धंधा ही तो है इसीलिए नेताओं के साथ उनके स्पून भी लगातार धन और अन्न के गोदाम भरते जा रहे हैं। उधर जिनके तन पर कुछ कपड़े हैं, दरअसल वे बेचारे ही भूखे हैं, बदहाल हैं। गाँधीजी ने क्या सोचा था और क्या हो गया।
लेखक रुका, फिर अक और पान चबाने के बाद बोला-जानते हो, गाँधीजी कहते थे, कि लोग मेरे बताए रास्ते पर चलने से खुशहाली आएगी। कुछ लोग बहुत खुशहाल दिखते हैं। खासकर नेता प्रजाति के लोग। दिन में गाँधीगीरी करते हैं और रात में दादागीरी। उजाले में जो काम किए जाते हैं, वे तो नज़र आ जाते हैं लेकिन अंधेरे के कामों का पता करने के लिए स्टिंग आपरेशन जैसी किसी चीज़ की जरूरत पड़ती है।
कुछ देर बाद पान ठेले पर  एक सज्जन आ टपके । सफेद खादी का कुर्ता-पायजामा पहने हुए थे।
उनके चेहरे की कुटिल मुसकान देख कर इस अनपढ़ ने भी अनुमान लगा लिया कि सामने वाला पूर्णकालिक नेता होगा। लेखक का भी अनुमान सही निकला। लेखक ने पूछा- '' क्या आप गाँधी जी के रास्ते पर चलते हैं?''
लेखक के  सवाल पर नेताजी मुसकराते हुए बोले-'' जो रास्ता हमें सत्ता तक ले जाता है, वही रास्ता गाँधी का रास्ता है इसलिए उस रास्ते पर चलना तो हमारा धर्म है।''
'' गांधीजी  के रास्ते में और क्या खास बात है?''
लेखक के  अगले प्रश्र पर नेताजी मुसकरा कर बोले-''इस रास्ते में बड़ी सुविधा है भई,  टुच्चे से टुच्चा आदमी तक महान नज़र आने लगता है। शैतान भी साधु लगने लगता है। हम गाँधी जी के ऐसे भयानक भक्त हैं कि एमजी रोड पर ही रहने लगे हैं। एमजी रोड मतलब समझ गए न? महात्मा गाँधी मार्ग।''
'' धन्य  है आपकी निष्ठा।''  लेखक ने  बात आगे बढ़ाई, ''असली बात है गाँधीवादी दिखना। जो दिखता है, वही तो थोक भाव में बिकता है। बाज़ार का सिद्धांत भी तो यही है। फिर आप ठहरे बाज़ारू लोग। बुरा मत मानिएगा। बाज़ारू मतलब बाज़ार में दिखने वाला।''
'' बिलकुल  सही कहा आपने। सोलह आने सच'', नेताजी बोले, '' भई, हम बुरा नहीं मानते। नेता को किसी की बात का बुरा नहीं मानना चाहिए। गेंडे जैसी खाल हो तो नेतागीरी करो। वैसे भी ये तो मार्केटिंग का ज़माना है। हमें देखो, गोंडसेवादी होकर भी गाँधीवादी होने की मार्केटिंग कर लेते हैं। हमारे घर के पास ही फकीर गली में एक ओरिजिनल गाँधीवादी है, लेकिन मार्केटिंग में कमजोर है बेचारा। पागल हर घड़ी नैतिकता की बातें करता रहता है। उसे कोई नहीं पूछता, मगर हम हिट हैं क्योंकि समय के साथ बिल्कुल फिट हैं। गाँधीजी ने कहा था, कि पाप से घृणा करो, पापी से नहीं, तो हम भी यही कर रहे हैं । पाप से घृणा करते हैं और पारिपयों से यराना बनाए रखते हैं। हमारे सारे मित्र पापी हैं,लेकिन हम उनकी पप्पी लेे रहते हैं । उनके पाप से हमको क्या ? वे लोग कभी-कभार हमारे लाभ के लिए भी पाप करते रहते हैं। और अपना लाभांश भी लेते रहते हैं। हम तो डायरेक्ट कोई पाप नहीं करते न?''
लेखक को  लगा, यह नेता सचमुच खांटी गाँधीवादी है। खादी के सफेद कपड़े भी कमाल करते हैं। असली- नकली का भेद ही खत्म हो जाता है। नेताजी सचमुच गाँधी के रास्ते पर चल रहे हैं। सच-सच जो बोल रहे थे। लेखक क्या कर सकता था, बस इतना बोल कर आगे बढ़ गया कि, आप बहुत आगे जाएंगे। लगे रहो मुन्नाभाई। पान चबाने के बाद लेखक देश का भविष्य जानने के लिए अस्पताल की ओर बढ़ गया. वहां हमारे होनहार नेता हथौडा जी भरती है. लेखक ने कहा, मित्रो, पता तो करुँ, कि बेचारेजी  की तबीयत कैसी है. भगवान उन्हें स्वस्थ रखे. तभी तो जेल में स्वस्थ रह सकेंगे. स्विस बैंक में पैसे है, उनको भी निकालने जाना है. और भी अनेक लफडे आयेंगे. सबसे निपटना पड़ेगा. लेखक ने देश के नए किस्म के गांधीवादी नेताओं को मन ही मन श्रद्धांजलि  दी. तभी सामने एक नंगा आदमी नज़र आया. वह 'हथौडा जी कौडाजी जिंदाबाद- इन्कमटैक्स मुर्दाबाद' कर रहा था. हो सकता है, वह पागल भी रहा हो, खैर जो भी हो,  लेखक को  लगा कि इसमे नेता बनने की तो प्रबल संभावना है.
लेखक डरते-डरते आगे बढ़ गया.

2 टिप्पणियाँ:

राजीव तनेजा 6 नवंबर 2009 को 11:45 pm  

वाह....मज़ा आ गया...बहुत ही तीखा एवं धारदार व्यंग्य

sangeeta 9 नवंबर 2009 को 12:31 pm  

bahut zabardast vyang....