बुधवार, 18 नवंबर 2009

हिन्दू विवाह याने कि पति और पत्नी के बीच जन्म-जन्मांतरों का सम्बंध

हिंदू धर्म में विवाह को सोलह संस्कारों में से एक संस्कार माना गया है। पाणिग्रहण संस्कार को सामान्य रूप से हिंदू विवाह के नाम से जाना जाता है। अन्य धर्मों में विवाह पति और पत्नी के बीच एक प्रकार का करार होता है जिसे कि विशेष परिस्थितियों में तोड़ा भी जा सकता है परंतु हिंदू विवाह पति और पत्नी के बीच जन्म-जन्मांतरों का सम्बंध होता है जिसे कि किसी भी परिस्थिति में नहीं तोड़ा जा सकता। अग्नि के सात फेरे ले कर और ध्रुव तारा को साक्षी मान कर दो तन, मन तथा आत्मा एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं। हिंदू विवाह में पति और पत्नी के बीच शारीरिक संम्बंध से अधिक आत्मिक संम्बंध होता है और इस संम्बंध को अत्यंत पवित्र माना गया है।

हिंदू मान्यताओं के अनुसार मानव जीवन को चार आश्रमों (ब्रम्हचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, सन्यास आश्रम तथा वानप्रस्थ आश्रम) में विभक्त किया गया है और गृहस्थ आश्रम के लिये पाणिग्रहण संस्कार अर्थात् विवाह नितांत आवश्यक है। हिंदू विवाह में शारीरिक संम्बंध केवल वंश वृद्धि के उद्देश्य से ही होता है।

विवाह के प्रकार

  1. ब्रह्मविवाहः दोनो पक्ष की सहमति से समान वर्ग के सुयोग्य वर से कन्या का विवाह निश्चित कर देना 'ब्रह्म विवाह' कहलाता है। सामान्यतः इस विवाह के बाद कन्या को आभूषणयुक्त करके विदा किया जाता है। आज का "Arranged Marriage" 'ब्रह्म विवाह' का ही रूप है।

  2. दैवविवाहः किसी सेवा कार्य (विशेषतः धार्मिक अनुष्टान) के मूल्य के रूप अपनी कन्या को दान में दे देना 'दैवविवाह' कहलाता है।

  3. अर्शविवाहः कन्या-पक्ष वालों को कन्या का मूल्य दे कर (सामान्यतः गौदान करके) कन्या से विवाह कर लेनाअर्श विवाह' कहलाता है।

  4. प्रजापत्य विवाहः कन्या की सहमति के बिना उसका विवाह अभिजात्य वर्ग के वर से कर देना 'प्रजापत्य विवाह' कहलाता है।

  5. गंधर्व विवाहः परिवार वालों की सहमति के बिना वर और कन्या का बिना किसी रीति-रिवाज के आपस में विवाहकर लेना 'गंधर्व विवाह' कहलाता है। दुष्यंत ने शकुन्तला से 'गंधर्व विवाह' किया था। उनके पुत्र भरत के नाम से हीहमारे देश का नाम "भारतवर्ष" बना।

  6. असुर विवाहः कन्या को खरीद कर (आर्थिक रूप से) विवाह कर लेना 'असुर विवाह' कहलाता है।

  7. राक्षस विवाहः कन्या की सहमति के बिना उसका अपहरण करके जबरदस्ती विवाह कर लेना 'राक्षस विवाह' कहलाता> है।कहलाता>

  8. पैशाच विवाहः कन्या की मदहोशी (गहन निद्रा, मानसिक दुर्बलता आदि) का लाभ उठा कर उससे शारीरिकसम्बंध बना लेना और उससे विवाह करना 'पैशाच विवाह' कहलाता है।

9 टिप्पणियाँ:

पी.सी.गोदियाल 19 नवंबर 2009 को 2:38 pm  

एक और शोध परक लेख, अवधिया साहब ! उम्मीद है कि इससे वे आधुनिक लोग कुछ ज्ञान अर्जन करेंगे जो कि विवाह को भी मात्र रिश्ता जोड़ने और तलाक पर ख़त्म कर देने तक सीमित रखते है ! वैसे मेरे हिसाब से अभी भी हिन्दू समाज में विशेष कर तीन प्रकार के विवाह किन्ही रूपों में मौजूद है.ब्रह्म , अर्श एवं प्रजापत्य !

Nirmla Kapila 19 नवंबर 2009 को 2:40 pm  

हिंदू विवाह में पति और पत्नी के बीच शारीरिक संम्बंध से अधिक आत्मिक संम्बंध होता है
अवधिया जी आपकी इस बात से सहमत नहीं अगर हम आस पास नज़र डालें तो मुझे लगता है अधिकतर पति-पत्नि मे केवल शारीरिक सम्बन्ध ही रह जाता है आत्मिक सम्बन्ध नहीं नहीं तो समाज मे औरत इतनी अपमानित और प्रताडित न होती। फिर भी इस पवित्र रिश्ते को निभाने मे ही समाज का भला है। धन्यवाद्

संजय बेंगाणी 19 नवंबर 2009 को 3:34 pm  

विवाह हमारे यहाँ करार न हो कर संस्कार होता है.

mahashakti 19 नवंबर 2009 को 3:55 pm  

अवधिया जी की पोस्‍ट से मै पूर्ण रूप से सहमत हूँ, विधि का विद्यार्थी हूँ हिन्‍दू और मुस्लिम विधि का अध्‍ययन किया है, जितना आपने लिख दिया उससे ज्‍यादा कहना भी जरूरी नही है,

बहुत बहुत धन्‍यवाद

Mohammed Umar Kairanvi 19 नवंबर 2009 को 4:44 pm  

मि. अवधिया कभी बैंक से छुटटी लेके अदालतों में गए हो, वहां पता लगेगा इतना अटूट संबंध होना कितना दुख देता है, बहुत कुछ कह सकता हूं, चेतावनी और सांकल देखने आया था, दूसरे धर्म का नाम लिए बिना अपनी बात कह सकते हो तो कह लो अन्‍यथा ब्लागजगत जाने है, एक ही अपनी तरह का पागल है, 3 हफते से अधिक कभी नहीं लगते यह आप अच्‍छी तरह जानो हो किसमें, जो जवाब ही नहीं देता सवाल को ही हमेशा के लिए समाप्‍त कर देता है

पान की दुकान पर अपना बहुत पैसा बर्बाद होता है, इस पर तो सांकल भी नहीं लगी, समझ गये होंगे

शरद कोकास 19 नवंबर 2009 को 5:09 pm  

"प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व " में एम. ए. करते हुए यह प्रश्न मेरे कोर्स में था । क्षमा करें इसे हिन्दू विवाह पद्धति नहीं बल्कि वैदिक विवाह पद्धति कहा जाता था । इस तरह के विवाह अब अप्रासंगिक हो गये है । पैशाच और असुर के अर्थ के अनुसार तो सज़ा हो जायेगी । बाकी मे दहेज अधिनियम लग जायेगा ,गन्धर्व मे बालिग होना ज़रूरी है ।

श्रीश पाठक 'प्रखर' 19 नवंबर 2009 को 5:41 pm  

..यदि केवल पुरुष और स्त्री की सहमती हो तो...?

काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif 20 नवंबर 2009 को 11:28 pm  

आपने जानकारी अच्छी दी है...लेकिन मैं आपकी एक बात से सहमत नही हूं...

आपने कहा....

"अन्य धर्मों में विवाह पति और पत्नी के बीच एक प्रकार का करार होता है जिसे कि विशेष परिस्थितियों में तोड़ा भी जा सकता है परंतु हिंदू विवाह पति और पत्नी के बीच जन्म-जन्मांतरों का सम्बंध होता है जिसे कि किसी भी परिस्थिति में नहीं तोड़ा जा सकता। अग्नि के सात फेरे ले कर और ध्रुव तारा को साक्षी मान कर दो तन, मन तथा आत्मा एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं। हिंदू विवाह में पति और पत्नी के बीच शारीरिक संम्बंध से अधिक आत्मिक संम्बंध होता है और इस संम्बंध को अत्यंत पवित्र माना गया है।"

मेरी उम्र आपके मुकाबले बहुत कम है लेकिन मैने अब तक इस रिश्ते को जितना समझा उस हिसाब से....

"ये रिश्ता सिर्फ़ आपसी समझ और प्यार से बनता है इसमें किसी भी धर्म का कोई मह्त्व नही है....चाहे आप शादी कहीं भी करें और कैसे भी करें......अगर आपसी समझ और प्यार नही होगा तो इस रिश्ते को कोई नहीं बचा सकता है...और अगर ये गुण होगा तो दुनिया की कोई ताकत इसे नही रोक सकती है......"
------------------------------
और अगर इसे धर्म के हिसाब से बांटेगे तो सबसे ज़्यादा तलाक लेने वाले लोगों में हिन्दु धर्म के लोगों के प्रतिशत बहुत ज़्यादा है....उनकी तलाक की अर्ज़ीयां अब भी सबसे ज़्यादा मौजुद है देश की अदालतों में....

डॉ टी एस दराल 20 दिसंबर 2009 को 8:26 am  

विवाह के प्रकारों के बारे में अच्छी जानकारी।
लेकिन आजकल विवाह के मायने बदलते जा रहे हैं।
और भला कौन रोक सकता है, समय को और समय के साथ आते बदलाव को।