सोमवार, 30 नवंबर 2009

इच्छा

"इच्छा "

मेरी बस इतनी सी इच्छा ,
जीवन संग बिताऊँ।
पर क्या यह छोटी सी इच्छा,
उसको थी मंजूर।


मैंने तुमसे जब भी मांगा,
मांगा बस संग देदो।
पर क्या तुम इतनी सी इच्छा,
कर पाए मेरी पूरी।


मैंने सोचा एक इच्छा तुम,
सबकी करते पूरी।
पर मैंने जाना यह कि,
कभी होगी पूरी।।

- कुसुम
ठाकुर -


6 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari 30 नवंबर 2009 को 8:32 am  

भावपूर्ण!!

काजल कुमार Kajal Kumar 30 नवंबर 2009 को 8:45 am  

वाह जी बहुत सुंदर.

निर्मला कपिला 30 नवंबर 2009 को 9:07 am  

इच्छायें तो कभी भी किसी की पूरी नहीं होती। कोई न कोई रह जाती है मगर आपकी कविता वाली इच्छा का शिकवा सब से अधिक रहता है बहुत सुन्दर कविता है शुभकामनायें

ललित शर्मा 30 नवंबर 2009 को 9:26 am  

बेह्तरीन भाव पुर्ण कविता-आभार

नीरज गोस्वामी 30 नवंबर 2009 को 3:24 pm  

पता नहीं क्यूँ कुछ इच्छाएं वो कभी पूरी नहीं करता...
नीरज

राजीव तनेजा 3 दिसंबर 2009 को 7:24 am  

हर किसी को मुकमल्ल जहाँ नहीं मिलता ...भावपूर्ण रचना