सोमवार, 9 नवंबर 2009

व्यंग्य / कपूतों के ये सपूत.....

 गिरीश पंकज 
कुछ भ्रष्ट अफसर रिश्वतखोरी करते अचानक पकड़ में आए तो कलमुँही सरकार ने उनके नाम अखबारों में छपवा दिए। पहले तो अफसरों के बच्चे गदगद  हुए कि उनके पिताओं के नाम अखबारों में छपे हैं लेकिन बाद में उन्हें आत्मज्ञान हुआ कि ऐसा नाम छपना  ठीक नहीं। इससे बदनामी होती है लेकिन बच्चों ने यह भी सुन रखा था, कि बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा। कल पान ठेले पर सिगरेट फूंकते अफसरों के होनहार लडके धीरे-धीरे बतिया रहे थे. मै  जासूस की तरह किनारे खडा हो कर उनकी बातें सुन रहा था. समझ लो स्टिंग आपरेशन कर रहा था.    
एक बच्चा दूसरे से कह रहा था- ''यार, तेरे डैडी ने क्या किया था? फर्नीचर घोटाला?''
पहला बोला- ''नहीं, फर्नीचर घोटाला तो पड़ोसी अंकल ने किया था। मेरे डेड ने तो सड़क घोटाला किया था। तेरे डैडी ने?'' दूसरा बोला- ''सड़क पर डामर पड़ती है न, उसमें ही कुछ खेल किया था?'' पहले ने पूछा- ''तेरे पिता बचपन में बहुत बड़े खिलाड़ी थे क्या?''
दूसरे ने धुएँ का छल्ला बनाते हुए कहा- ''हाँ, बहुत बड़े खिलाड़ी। बचपन से ही खिलाड़ी थे। परीक्षाएं देते थे, तो अपने साथियों की मदद लेते थे। बड़ी चालाकी के साथ नकल किया करते थे। नौकरी पाने के लिए उन्होंने करप्शन का खेल खेला था।''
पहले ने कहा-''यार ये करप्शन भी बड़ी मस्त चीज है न। आपन लोग कितनी लक्ज़ीरियस लाइफ जीते हैं। सब कुछ तो फोकट में आता है घर में। डैडी की पूरी सैलेरी बच जाती है। लेकिन बेचारे पकड़े गए।''
दूसरे बच्चे ने चेहरा लटकाते हुए कहा- ''कुछ लोग कहते हैं कि करप्शन का अंत बुरा होता है। एक न एक दिन पोल खुल ही जाती है। मेरे फादर नोट लेते हुए पकड़े गए थे और तेरे फादर?''
''नोट गिनते हुए पकड़े गए।'' पहले ने कहा, ''मम्मी ने लाख समझाया था कि रिश्वत की रकम गिनते नहीं। लेकिन मेरे पिता सिद्धांतवादी। कहते हैं, मैं कोई भी रकम लेने से पहले गिनता हूँ। वे अकसर गिनते थे। आखिर मुसीबत में फँस गए न। अब सस्पेंड हैं।'' दूसरे ने गर्व से सिर ऊँचा करते हुए कहा- ''तो, इससे क्या फर्क पड़ता है? आधी तनख्वाह तो मिल ही रही है। बाकी छिपी हुई दौलत अब काम आ रही है। बड़े महान पिता हैं। कहते हैं, बाल-बच्चों को कोई तकलीफ नहीं होगी, इतनी कमाई कर चुका हूँ। पिता हो तो ऐसा। तेरे पिता क्या कहते हैं?''
''मेरे पिता भी ऐसी ही महान सोच वाले हैं। लेकिन सरकार बड़ी गंदी है। महान लोगों को पकड़ लेती है।'' पहले बच्चे ने कहा
 ''इस घटना से एक सबक मिलता है।''  पहले ने कहा
''ईमानदारी का सबक ना?'' दूसरा बोला
''नहीं, सावधान रहने का सबक। जब हम लोग बड़े होंगे तो सावधानी के साथ रिश्वत लेगे।''
''बड़ा समझदार हो गया है तू।''
''आजकल कोचिंग ले रहा हूँ न।''
''क्या कोचिंग में रिश्वत से बचने के उपाय बताए जाते हैं?''
''नहीं, लेकिन वहाँ चर्चा होती है तो कुछ अतिरिक्त ज्ञान भी मिल जाता है।''
''यार, तुझे बड़ी जानकारी हो गई है।'' 
 ''बेटा किसका हूँ। मेरे पिता तो कवि भी हैं।''
''अच्छा, साहित्यकार भी भ्रष्टाचार करते हैं?''
''हाँ, उन्हें भ्रष्टचार में भी साहित्य जैसा रस मिलता है। कविता में धार आ जाती है।'' दूसरा हँस पड़ा
 ''तब तो मैं भी साहित्यकार बनूँगा। टू इन वन। लेकिन साहित्यकार बनने के लिए क्या करना होता है?'' पहले ने उत्साहित हो कर पूछा।
''कुछ नहीं, कहते हैं, थोड़ा-बहुत पढऩा पड़ता है'', दूसरा बोला,  'नई कविताएँ लिखनी पड़ती हैं। मन में पाप हो, मगर पुण्य की बात लिखो। बस, बन गए साहित्यकार। साहित्यकार बनने से भ्रष्टïाचार के पाप कट जाते हैं इसीलिए आजकल बड़े-बड़े अफसर लोग साहित्यकार बने घूमते हैं। ।''
दोनों बच्चे उदास तो थे लेकिन इसी संकल्प के साथ दोनों सपूत घर लौटे कि हमें अपने पिताओं की तरह नहीं बनना है।  इनके पिता तो रिश्वत लेते पकड़े गए, लेकिन ये पकड़ में नहीं आएंगे। उन्होंने सिगरेट की बदबू को मिटने के लिए पान ठेले वाले से सौंप मांगी, फांकी, और होनहार बच्चे  शापिंग माल माल की और बढ़ गए.  
गिरीश  पंकज

3 टिप्पणियाँ:

ललित शर्मा 9 नवंबर 2009 को 12:23 pm  

"होनहार बच्चे शापिंग माल की ओर बढ गये"
बहुत व्यग्यात्मक कुठाराघात - "कलमुंहो" पर
आभार

sangeeta 9 नवंबर 2009 को 12:32 pm  

vyang se to aapne sahitykaaron ko bhi nahi baksha.....lekhani men bahut dhaar hai....

बी एस पाबला 9 नवंबर 2009 को 12:45 pm  

बेहतरीन कटाक्ष

टू इन वन भी :-)

बी एस पाबला