बुधवार, 25 नवंबर 2009

गुरू गिल्लौरी बाबा के गुमटी पर गहन गपशप


बहुत दिन हो गईस था पनवा गुलेटे.....त सोचे काहे नहीं ठोर (होंठ) रंगा जाए......अजी पान का जौन पोजिटिव हेल्थ इफ़्फ़ेक्ट है ....उ में ठोर का लाली तो एक ठो एक्स्ट्रा बोनस बिटामिन जैसा होता है....बस पहुंचे पान के दुकान ....अरे नहीं ॥अपना गुरू गिलौरी बाबा के गुमटिया पर ॥ उनका गुमटी पर जाने का एक ठो जादा फ़ेदा ई होता था कि ....लल्लन नाई के दोकान के बाद ...नयका हीरोईन सब का ...एकदम ....हर्बल टाईप फ़ोटू ....लेटेस्ट पोज वाला ....(जेतना लेटेस्ट होता था न ....ओतने ...टैण...टेनेन ....होता था )....निहारने को मिल जाता था......छौंडा सब ॥फ़ोटो देख के अईसन दांत पीस पीस के खाता था ......कि आधा बीडा तो ...दूईए मिनट में चिबा जाता था लोग ॥ बस हम सीधा गिल्लौरी गुरू के पास पहुंचे...........

" आउर झाजी ...आज इधर कईसे जी ......अरे बिलागिंग से फ़ुर्सत मिल गया कि .....फ़िर कौनो बैठकी ...आ कि किसी पोस्ट ठेलने के जोगाड में.....मुंह लाल करने पहुंचे हो भोरे भोरे जी .."

अरे नहीं नहीं गुरू जी ......आप तो बस गिल्लौरी बांध दीजीये एक ठो ...अरे हम कौनो उडन जी हैं ...जो बीडी के खोली पर भी पता नहीं केतना गजब लिख डालते हैं ...और फ़िर पनवा पर तो गाना कविता लिखा जा सकता है ....मुदा पान के पत्ता पर नहीं न ....हम त गुरू जी बस तनिक नयन सुख ....विद्व मुख का संगम देखने आए हैं...हम तब तक हर्बल हीरोईनों की सुंदर काया को देख कर किसी कविता के बोल लिख चुके थे ॥मन ही मन......।

अरे का सुनोगे ...ईयार एतना भोरे...चलो कल का एक ठो वाकया बता देते हैं....कल गुड पेर रहे थे ...रोजिना जईसे.....बैलवा सबको ....जोत दिए .....दुनू घूमे लगा एक दम ढना ढन.......हम देखे कि अपना रफ़्तार से घूम रहा है ....तो आके बैठ गिये दलान पर ...दातुन लेके....। ओतने में देखे कि अपना ओकील बाबू ...सायकिल पर कचहरी जाय के लिए निकल रहे हैं॥। पास आके तनिक रुक के बोले .....और गिल्लौरी भाई ...का चल रहा है.....अरे आप इहां बैठे हो आउर बैलबा सब अंगना में है...त काम कईसे चल रहा है ...?

लो त ई कौन भारी बात है ....आपको का लगता है ...कि खाली ताऊ जा का बिल्लनिया ऊ का नाम है रामप्यारी ही इंटेलिजेंट है ....अरे....ई हमरे बैलवा सब भी हैं जी॥आ ई जौन घंटी का आवाज सुन रहे न.....ऊ से हमको पता चल जाता है...कि दूनो ड्यूटी बजा रहे हैं......॥

ओकील साहब दू मिनट सोचे आ कहते हैं....अरे गिल्लौरी भाई मान लो दोनो बैलवा एके जगह खडे होके मुंडी हिला रहे हों ...त घंटी त तईयो बजेगा......?

हम उनका घूर के देखे आ कहे ....कईसन बात सोचते -करते हो आप ...ऊ दुनो कौनो वकालत नहीं न पढा है ...जो एतना दिमाग लगाएगा.....हा हा हा ॥॥

हमरे मुंह में तब तक जा चुका पान का गिल्लौरी बाहरे आ जाता ठहाका के साथ ......अच्छा .....चलें तब.....?

अरे रुकिए झाजी ...हम सुने हैं बडा चर्चा करते हैं...ऊहो दुउए लाईन में...हमको भी कुछ सिखाईये न ......बस बता दिजीये एक बार ॥बकिया त हम भंगिया बाबू को मनाईये लेंगे....गोली खा के ...गुलाटी मारने के लिए......॥

हम मुस्कुरा के चल दिए......ठीक किए न........॥

5 टिप्पणियाँ:

ललित शर्मा 25 नवंबर 2009 को 9:21 pm  

गिल्लौरी बबा के जय, बढिया शुरुआत है झा जी, भंगिया बबा को भी तनी ले आईए, बधाई हो, शुभकामनाएं,

cmpershad 25 नवंबर 2009 को 9:41 pm  

`अरे रुकिए झाजी ...हम सुने हैं बडा चर्चा करते हैं...ऊहो दुउए लाईन में...हमको भी कुछ सिखाईये न ......बस बता दिजीये एक बार ॥'

लो भाई, कर दी ना चुना लगाने की बात :)

विनोद कुमार पांडेय 25 नवंबर 2009 को 10:34 pm  

एतना बढ़िया चर्चा..भैया जमाएं रखिए ई महफ़िल कभो हमहूँ को शामिल करिए ना..तनिक हम भी आप जैसन बड़े लोगेन के बीच कुछ सीख पाएँ..

Udan Tashtari 26 नवंबर 2009 को 4:37 am  

गज़ब ठिया पाये हो भई गिल्लोरी बाबा का...हर्बल हीरोईनों वाला..हा हा!! पान का पूड़िया पर कुछ लिखा जाये जी..कौनो जरुरी थोड़ी है बिड़िया का पुड़िया पर ही लिखावट उतरेगी. :)

मस्त!!

राजीव तनेजा 27 नवंबर 2009 को 7:51 am  

हमको भी सिखा दो भाई ये दो लाईन कि चर्चा...बस लाईनें ज़रा लम्बी होनी चाहिए... बहुत बढिया