शुक्रवार, 6 नवंबर 2009

तुम्हारी औकात एक दारू की बोतल ही है! सोचो????

"पै लगी महाराज"
"जय होए तोर,आनद हो"
"आओ पान खाते हैं"
ऐसा कहकर संतोष मुझे पान की दुकान पर ले गया, पान दुकान वाला "छलिया" मुझे देखकर पान लगाने लगा, हम पान ठेले पर खड़े हो गये. इतने में राजू भी आ गया. आते ही  उसने पूछा:-
"आजकल कहाँ रहते हो महाराज,दीखते नहीं हो"
'दिल्ली गया था यार, थोडा काम था"
"तो फिर दीवाली का भेंट उपहार भी मिला होगा?"
"काहे का'
"मै सुना हूँ कि दीवाली पर सब बड़े बड़े लोग सांसदों और नेता लोगो को भेंट उपहार देते हैं दीवाली पे"
"सुना तो मै भी हूँ पर मुझे तो आज तक किसी ने  नहीं दिया, हाँ पेपर में पढा था ऐसा होता है"
"क्या महाराज? दिल्ली में आप रहते हो आपको पता नहीं? 'विजय माल्या' ने सबको "दारू का बोतल" भिजवाया है.
"हाँ यार पढा तो मैंने भी था, कोई प्रभात झा  हैं सांसद उन्होंने इस मामले पर अपना विरोध जताया था"
"कितना बड़ा बेवकूफी है? अरे अगर नही पीना था तो हमरे को भिजवा देते वापस करने का क्या मतलब था" संतोष बोला
"बाकी सांसदों ने क्या किया?" राजू बोला
"अरे खाए पिए मस्त रहे और क्या?' संतोष बोला
"सांसदों को कितना टेंशन रहता है इस बात को विजय माल्या ने समझा है. इधर संसद का टेंशन, फिर अपने क्षेत्र का टेंसन, फिर अपने घर का टेंशन, फिर स्टिंग आपरेशन का टेंशन, फिर देश का टेंशन-सारा टेंशन ही टेंशन है, इस लिए थोडा रिलेक्स हो जाये दो पैग मार के" इसलिए भेजा था और प्रकाश झा उसको गलत ले लिए" मैंनेकहा
'अरे भईया! दारू से बड़े बड़े अटके हुए काम निकल जाते हैं, जो काम पैसा नही करा सकता वो काम दारू से हो जाता है"अब देखो ना ! इलेक्सन में कितना दारू बांटना पड़ता है? नेता लोगों को और नही बांटे तो वोट नही मिलता"- राजू बोला
"हाँ यार ! तू ठीक ही बोलता है.आज कल तो इसके बिना काम ही नहीं चलता, विजय माल्या ने हमारे नेता लोगों की सही नब्ज पकड़ी है. नेता लोगों का काम भी तो बिना दारू के नहीं चलता, दारू तो हमारे शिष्टाचार में शामिल हो गयी है. अगर कोई मेहमान आ गया और दारू नहीं पूछे तो नाराज हो जाता है" संतोष बोला
"अरे भाई !विजय माल्या ने इन सांसदों को उनकी औकात दिखा दी कि तुम्हारी औकात एक दारू की बोतल से ज्यादा नहीं है. दारू पिलाओ सब काम करावो, संसद में जो भी पास करवाना है दारू पिलाओ और पास करवाओ ये तो हमारी ग्राम पचायत से भी गया बीता काम हो गया है." मै बोला 
"ये सब नेता और दारू उद्योगपतियों की मिलीभगत है कि हमारे देश की नौजवान पीढी को नशे में रखो और देश को जितना लूट सकते हो लूटो, अभी देखो मधु कोडा के पास कितना पैसा-रुपया निकला है. कभी उसका बाप भी नहीं सोचा होगा कि इतना पैसा देखने मिलेगा. गरीबों के उत्थान और विकास की बात करने वाले लोग पहले अपना ही पेट भरने में लगे हैं, क्या उद्धार होगा गरीबों का? वो तो बेचारे थे, बेचारे हैं, बेचारे रहेंगे और बेचारे ही मर जायेंगे. लेकिन उनके नाम से इन भ्रष्ट्राचारी नेताओं के घर जरुर भर जायेंगे". राजू बोला
"आजकल हर घर में एक नेता है या नेता का चमचा है. अपनी बेरोजगारी दूर करने में लगे हैं" संतोष बोला "हमारे देश के नेताओं का ये हाल है कि जब तक गद्दे में बिछाने के लिए २-४ करोड़ रुपया नही हो तो नींद नहीं आती. लैट्रिन खोली में फर्श के नीचे या छत में १०-१५ करोड़ रुपया ना होतो तो इनको  लैट्रिन नहीं लगती, कब्ज की शिकायत बनी रहती है. कायम चूर्ण की आवश्यकता बनी रहती है. और अनिद्रा -बवाशीर की बीमारी अलग से हो जाती है"राजूबोला 
"यदि ये रुपया पैसा भरपूर आ जाता है तो खूब खाओ वाला मामला चलता है. तो शुगर (मधुमेह) और ब्लड प्रेशर (उच्च रक्तचाप) की बीमारी घेर लेती है. संतोष बोला
उनकी चर्चा में मैंने बीच में हस्तक्षेप करते हुए कहा "देखो भैया! ये नेता सब हमारे बीच से आपके और जनता के वोट से चुनकर आपकी और हमारी सेवा के लिए सांसद और विधानसभा में भेजे गए हैं और हमें इनकी नियत पर शक नहीं करना चाहिए, ये दिन रात हमारी बेहतरी के लिए सोचते हैं और तुम ही बता रहे हो कि कितनी बिमारियों का शिकार भी हो जाते है. ऐसे इमानदार और देशभक्त, जनता के सदा सेवक हमारे नेताओं की निंदा करना ठीक नहीं है. इनका सत्कार करना चाहिए, समझे? जब इनकी गरीबी दूर हो जायेगी तब तो हमारी गरीबी दूर करेंगे."
"आपने ठीक ही कहा है भईया" संतोष बोला 
"साले सुबह-सुबह से मगजमारी चालू कर दिये, पान खाओ और काम पे लगो नहीं तो ये कथा अंतहीन है कभी ख़त्म ही नहीं होगी" ला रे छलिया पान दे........................फिर हम भी  चले, इनको भी साले काम धाम है नही और पै लगी करके हमको भी उलझा लेते हैं, " चलो बे निकलो.............. 
कोऊ नृप होय हमें का हानि ..................................  

ललित शर्मा 

8 टिप्पणियाँ:

Anil Pusadkar 6 नवंबर 2009 को 11:43 am  

अं हं,गलत महाराज आजकल,बोतल नही अद्धी पौवे मे भी काम चल जाता है।

पी.सी.गोदियाल 6 नवंबर 2009 को 11:52 am  

जो रखे स्वेच्छा से हमारे चरणों में, हम उसी के हो जाते है
हरे का "ह" हमारा वोट मन्त्र है, और "राम" का हम खाते है !
सीधी उंगली से घी कैसे निकाला जाता है, उसके हम वेता है
हरे को भगवे से लड़ा खुद तमाशा देखते है, इसलिए नेता है !

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ 6 नवंबर 2009 को 12:22 pm  

इस पान की दुकान पर पहली बार आना हुआ। पर आकर निराशा नहीं हुई, यह सुकून का विषय है।
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परा मनोविज्ञान- यानि की अलौकिक बातों का विज्ञान।
ओबामा जी, 75 अरब डालर नहीं, सिर्फ 70 डॉलर में लादेन से निपटिए।

अजय कुमार झा 6 नवंबर 2009 को 12:26 pm  

रुकिये रुकिये ...शर्मा जी सुने हैं कि ..माल्या जी बहुते खफ़ा हैं कह रहे थे कि ..तो ई मे जुलम का कौन बात है ..ई बोतलवा नहीं बेचेंगे /भेजेंगे तो गांधी बाबा का जो लोटा गमछा अंग्रेज लोग नीलामी करता है ऊ कैसे खरीदेंगे जी ..
आ दिल्ली आए दिवाली पर और हमको नहीं न कहे ..
जाईये जाईये ..हम तो कबे से एक ठो बडका फ़ुलझडा ,जी फ़ुलझडी से बडा , खरीद के रखे दे आपको उपहार में देने के लिये..
अब होली में भिजवा देंगे ..सारा मसाला झाड के पिचकरिया बना लिजीयेगा ..
ई पान का गुमटी हमको तो बढिया लगा...काहे नहीं हमको भी बिठा लेते हैं ..हमको तो प्रैटिस ..भी है ..चिबाने का

cmpershad 6 नवंबर 2009 को 9:15 pm  

विरोध तो इसलिए था महाराज - एक बोतल से मेरा क्या होगा:)

AlbelaKhatri.com 6 नवंबर 2009 को 10:05 pm  

jai ho..........
bahut khoob !

राजीव तनेजा 6 नवंबर 2009 को 11:50 pm  

बढिया व्यंग्य

खुशदीप सहगल 7 नवंबर 2009 को 7:26 am  

ललित भाई,
पता लगाइए माल्या महाराज ने सांसदों के नैन-सुख के लिए साथ में किंगफिशर का कलेंडर भी भेजा था या नहीं...

जय हिंद...