मंगलवार, 24 नवंबर 2009

शादी से भी सड़क जाम- अब क्या करे आदमी आम

हमारे रास्ते में एक बारात आ गई और हमें इस बारात के चक्कर में कई किलो मीटर लंबा रास्ता तय करके प्रेस जाना पड़ा। रात को जब फिर प्रेस से घर के लिए निकले तो फिर वही मुसीबत। रास्ता जाम कारण फिर वही सड़क पर ही धमा-चौकड़ी मची है और लोग ट्रेफिक जाम की परवाह किए बिना नाचे जा रहे हैं। भाई साहब आपको शादी करने से किसने रोका है, पर यार जरा उस पब्लिक के बारे में भी तो सोचो न जिसको कम से कम आपकी शादी से तो कोई लेना-देना नहीं है। हर किसी का वक्त कीमती है और हर कोई अपने काम पर समय से पहुंचना चाहता है। पर क्या करें इस कंबख्त ट्रेफिक का जो किसी न किसी वजह से जाम हो जाता है। कभी शादी के नाम पर तो कभी किसी वीआईपी के आने के नाम पर, कभी किसी रैली के नाम पर, तो कभी किसी हड़ताल के नाम पर या फिर किसी धार्मिक आयोजन के नाम पर। हमें लगता है यह हाल सिर्फ हमारे शहर का नहीं बल्कि देश के हर शहर का है।

इन दिनों शादियों का सीजन चल रहा है। इस सीजन में सबसे ज्यादा परेशानी में आम लोग हैं। आम लोग इसलिए परेशानी में हैं क्योंकि शादी करने वाले परिवारों को इन आम लोगों से मतलब ही नहीं होता है। जबकि शादी करने वाले परिवार भी आम लोग से अलग नहीं हैं। इनको भी कभी न कभी जाम का सामना करना पड़ता है। इतना सब होने के बाद भी ये लोग आखिर सुधरते क्यों नहीं है यार यह बात समझ नहीं आती है। क्या इन्होंने ठान कर ही रखा है कि जब तुम नहीं सुधरे तो हम क्या सुधरेंगे। यहां पर हर आदमी नालायक नजर आता है ऐसे में दोष किसे दिया जाए। किसी न किसी को तो इनको सुधारने की पहल करनी ही पड़ेगी। मीडिया को कभी इस बात से मतलब ही नहीं होता है कि शादियों की वजह से सड़क जाम हो रही है तो इस पर लिखा जाए। हां अगर किसी अखबार का संपादक कहीं फंस जाए तो जरूर उस अखबार में ऐसी खबर प्रमुखता से प्रकाशित हो जाती है। सड़क को शादियां करने वाले अपनी बपौती ही मानकर चलते हैं। जहां एक तरफ सड़क पर बारात इस तरह से चलती है मानो जिनकी बारात निकली है वे शहर के राजा हैं और सारी प्रजा उनके पीछे-पीछे आएगी क्योंकि उनके पास तो उनकी बारात में जाने के अलावा और कोई काम है नहीं। जिस घर में शादी का रिशेप्शन रहता है तो रिशेप्शन के लिए अगर जगह नहीं मिली तो घेर ली सड़क और लगा दिया पंडाल। हमारे जैसा कोई बंदा अगर इसका विरोध करता है तो कहा जाता है कि यार एक दिन की ही तो बात है मैनेज कर लीजिए, जरा सा घुमकर चले जाएंगे तो क्या हो जाएगा। बात एक स्थान की हो तो आदमी मैनेज भी कर ले, लेकिन यहां पर हर गली-कूचे में यही हाल है तो फिर मैनेज कैसे किया जा सकता है। कुल मिलाकर होता यह है कि शादी उनकी होती है और मुसीबत हमारी आती है।

यह बात सिर्फ शादियों पर ही लागू नहीं होती है। कोई वीआईपी आए तो भी सबसे ज्यादा मुसीबत आमजनों को झेलनी पड़ती है। तब तो आमजनों को पुलिस के डंडे भी खाने पड़ते हैं। अपने देश में शायद ही कोई ऐसा शहर होगा जहां पर रैलियों और हड़तालों के नाम पर सड़कें जाम नहीं होती है। रैलियां निकालने और हड़ताल करने वालों को इस बात से कोई मतलब नहीं रहता है कि किसी को काम पर जाना है तो किसी को स्कूल जाना है। उनकी बला से कोई समय पर कहीं न पहुंच पाता है तो उनका क्या बिगडऩे वाला है। उनको तो बस अपनी हड़ताल करनी है। आज किसी भी मुद्दे पर हड़ताल और रैली निकालना आम बात है। जनाब निकालिए न रैली और करिए न हड़ताल किसने रोका है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि आप अपनी परेशानी के चक्कर में दूसरों को परेशान करें। अगर शादियों, रैलियों और हड़ताल से रोड़ जाम करने वाले नहीं सुधर रहे हैं तो इनको सबक सीखाने के लिए आम जनों को जागना ही होगा। जब तक बिना वजह रोड़ जाम करने वालों के खिलाफ मामले दर्ज नहीं होंगे और इनका लगातार विरोध नहीं होगा लोग सुधरने वाले नहीं है। तो चलो इनको सुधारने का एक संकल्प आज लिया जाए।

3 टिप्पणियाँ:

M VERMA 24 नवंबर 2009 को 7:35 am  

जहां एक तरफ सड़क पर बारात इस तरह से चलती है मानो जिनकी बारात निकली है वे शहर के राजा हैं और सारी प्रजा उनके पीछे-पीछे आएगी'
आम आदमी होने से ठीक एक दिन पहले इस तरह की गलतफहमी बुरी नही है.

Udan Tashtari 24 नवंबर 2009 को 8:21 am  

वो भी आम आदमी ही हैं...एक दिन का राजसी अहसास बटोरे.

राजीव तनेजा 29 नवंबर 2009 को 9:55 am  

आपने सही कहा...जब तक बिना वजह सड़क घेरने वालों के खिलाफ मुकदमे दर्ज़ नहीं होंगे... तब तक लोग सुधरेंगे नहीं