रविवार, 1 नवंबर 2009

शतरंज के खेल में वे ऊँट पसन्द नहीं करते

अक्सर हम इस बात की चर्चा करते हैं कि फलाना आदमी सीधा है या टेढ़ा । किसी से मिलने से पहले यह हमारी स्वाभाविक उत्सुकता होती है ताकि हम उस व्यक्ति से मिलने का तरीका तय कर लें । किसी सरकारी दफ्तर में जाने से पहले यह जानना बेहतर होता है कि साहब सीधा है या टेढा । लोग अक्सर किसी व्यक्ति के बारे में अपना अभिप्राय प्रकट करते हैं.. बड़ा सीधा आदमी है ..गऊ है बिलकुल गऊ। मतलब चाहे जैसे मूँड लो  या फिर इस तरह कि ..बड़ा टेढ़ा आदमी है भाई जरा सम्भल के ।
विडम्बना यह  है कि इस युग में सीधेपन को सहज रूप से दुर्गुण और टेढ़ेपन को मनुष्य का अच्छा गुण मान लिया गया है जबकि होना  चाहिये इसके विपरीत । इसी भाव पर प्रस्तुत है आज की यह कविता । निस्सन्देह पान की दुकान  पर चर्चा के दौरान ही यह विषय मुझे मिला है और इसका पहला पाठ भी वहीं हुआ है । इस पर भरपूर प्रतिक्रियाएँ भी मिलीं । देशबन्धु के 1994 के दीपावली विशेषांक से साभार इस कविता को उतारकर ब्लॉग के पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत कर रहा हूँ .. देखना यह है कि जीत सीधे आदमी की होती है या टेढ़े आदमी की ... आपका -शरद कोका
                                                 अक्सर लोग पसन्द नहीं करते                     


अक्सर लोग पसन्द नहीं करते
टेढ़ी ज़िन्दगी
टेढ़े रास्ते
टेढ़े इंसान




वे पसन्द करते हैं
लम्बी उम्र जीना
मीलों मील चलना
अपनो की तरह मिलना
बस
शतरंज के खेल में
वे ऊँट पसन्द नहीं करते                                   


वे पसन्द नहीं करते
टेढ़ापन लिये हुए कोई भी चीज़
कोई दीवार
कोई कमरा
या टेढ़ी बेतरतीब रखी कोई मेज़
मज़ाल कि लिखते समय
कोई पंक्ति टेढ़ी हो जाये
यहाँ तक कि सोते समय
कमर टेढ़ी हो जाये





यह नहीं कि आहत होता है
उनका सौन्दर्यबोध
यह भी नहीं कि वे डरते हैं
टेढ़ेपन से
वे खुद सीधे होते हैं
इसलिये औरों का टेढ़ा होना
पसन्द नहीं करते




नंगी आँखों से नहीं दिखाई देता
आदमी का टेढ़ापन
सीधे आदमी को नहीं दिखाई देता
टेढ़े का टेढ़ापन


सीधा आदमी
हर युग में सीधा होता  है
रूखेपन पर रोता है
पर घी निकालने के लिये
उंगली टेढ़ी नहीं कर सकता




क्या यह खुशी की बात नहीं
जिस युग में
टेढ़ा होना बुद्धिमानी में
और सीधापन मूर्खता में शामिल हो
कुछ लोग खड़े हैं तनकर
टेढ़ेपन के खिलाफ ..।


                        - शरद कोकास                                                               

3 टिप्पणियाँ:

ललित शर्मा 1 नवंबर 2009 को 1:47 pm  

बहुत बढिया - टेड़ा दिखना भी जरुरी है नही तो सीधा समझ के कोई भी काट लेगा-सीधा ही पहले कट्ता है। जहर न हो तो कोई बात नही फ़ुफ़कार तो होनी ही चाहिए- छतिसगढ़ निर्माण दिवस बधाई

विनोद कुमार पांडेय 1 नवंबर 2009 को 2:40 pm  

आज युग ही ऐसी चल रही है की सीधे . लोगों को लोग बेवकूफ़ समझते हैं और जो टेढ़ा है उसे होशियार और उससे दूर ही रहते है...बढ़िया विचार और कविता विशेस रूप से बहुत अच्छी लगी..धन्यवाद शरद जी

खुशदीप सहगल 2 नवंबर 2009 को 6:25 am  

शरद जी,

पहले तो हाथ जोड़कर माफी मांगता हूं...व्यस्तता के चलते पिछली कुछ पोस्ट पर कामेंट नहीं दे पाया...इस कविता के लिए जूही चावला के कुरकुरे विज्ञापन की तरह इतना ही कहूंगा...

टेढ़ा है पर मेरा है...

जय हिंद...