शनिवार, 21 नवंबर 2009

अबे,तो अभी क्या कर रहा हूं?

मुच्छू ललित के साथ जब घूमते-घूमते उसकी मनपसंद पान की दुकान पहुंचा तो वंहा भारी भीड़ लगी थी।पान वाले ने मुच्छू की तरफ़ देखा और मुस्कुरा कर कहा ललित भैया दो मिनट।और देखते-ही देखते उसके दो मिनट पांच मिनट से ज्यादा हो गये।तभी मेरा एक पुराना साथी शिशुपाल वंहा आ टपका।मैने उससे पूछा कैसा पान लोगे?वो हैरान होकर मुझे देखने लगा।मैने कहा क्या हो गया।वो बोला आप तो पान-वान से दूर ही रहते थे फ़िर्……………।मैने कहा अभी भी दूर ही हूं,ये ललित हैं,ब्लाग लिखते हैं।अच्छा!वो बोला जभी मै बोलूं हम लोग कहते है तो गाली बक़ते हो जाओ सालो मर्द होकर लिपिस्टिक लगाओ और ब्लागर भाई के साथ खुद खड़े होकर हमको भी लिपिस्टिक दे रहे हो हैं,बताता हूं सबको।मैने कहा अबे जा बता देना,मै तो नही खा रहा हूं ना पान।

अभी शिशुपाल और मेरी बात खतम भी नही हुई थी कि कालेज के दिनों का साथी आ गया।बहुत दिनो बाद मिल रहे हैं के मेरे फ़ार्मल डायलाग के बाद दूसरा फ़ार्मल डायलाग उसकी तरफ़ से आया,कया कर रहे हो आजकल?इसका जवाब भी फ़ार्मल ही था,कुछ नही,खाली-पीली घूम रहे हैं।इस जवाब से वो थोड़ा सीरियस सा हो गया या बनने की कोशिश करने लगे।वो बोला यार इतने सालों से देख रहा हूं,तू सीरियसली कोई काम करता ही नही?मैने कहा,नही ऐसी बात नही हैं।उसने कहा क्या ऐसी बात नही है,जब पूछो तो घूम रहा हूं?क्या कर रहा है तो कुछ नही?अच्छा नही लगता यार ये सब अब हम मैच्योर हो गये हैं।मै भी सोच मे पड़ गया तो क्या अभी तक़ मै मैच्योर ही नही हुआ था?

अचानक़ उसके तेवर बदल गये और बोला,बहुत हो गई है लापरवाही अब ज़िम्मेदारी को समझो और कंही टिक कर काम करो?अब मैं भी मूड़ मे आ गया था मस्ती के।मैने पूछा कि उससे क्या होगा?वो बोला क्या होगा?नाम होगा और क्या होगा।मैने कहा नाम तो वैसे भी बहुत हो गया है अच्छा भी बुरा भी।वो बोला नाम नही चाहिये तो न सही दाम भी तो मिलेगा?मैने फ़िर से वही सवाल किया उससे क्या होगा?तरक्की मिलेगी,बैंक-बैलेंस बढेगा?उससे क्या होगा?अब वो झूंझला गया और बोला उससे क्या होगा,उससे क्या होगा?अबे नोट रहेंगे तो घूमना-फ़िरना,मस्त मज़े करना?उसकी झूंझलाहट से मै समझ गया अगर और कहूंगा कि उससे क्या होगा तो वो भड़क जायेगा,सो मैने मामले को वंही ड्राप करते हुये कहा अबे तो अभी क्या कर रहा हूं।घूम फ़िर ही तो रहा हूं,मज़े ही तो कर रहा हूं।रिटायरमेंट तक़ काम करने के बाद जो काम तू करेगा वो मैं अभी से बिना रिटायर हुये कर रहा हूं।इतना सुनते ही ललित हंसा और बगल मे शांत खड़ा सारी बात सुन रहा शिशुपाल बोला धन्य हो गुरूदेव! आप जैसे चार-पांच और हो जायें तो हम लोग भी जवानी मे ही रिटायर हो जायेंगे।

4 टिप्पणियाँ:

खुशदीप सहगल 22 नवंबर 2009 को 7:19 am  

अनिल भाई की तर्ज पर उन्हीं से सवाल...

रिटायरमेंट होने से क्या होगा...घर पर झख मारेंगे...झख मारने से क्या होगा...मेरा सिर होगा....मेरे सिर से क्या होगा...जाने दो आगे मुझे मरना थोड़े ही है...दो-दो मूंछ वाले एक साथ...

जय हिंद...

बी एस पाबला 22 नवंबर 2009 को 7:46 am  

मज़ेदार ज़वाब

बी एस पाबला

Dipak 'Mashal' 22 नवंबर 2009 को 7:59 am  

badhiya hai...

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi 22 नवंबर 2009 को 10:22 am  

जो एक जगह टिके हैं, क्या हुआ बाजार उन्हें छोड़ भागा।
अनिल भाई, ये पान की दुकान है कहाँ? रायपुर में तो हम तलाशते ही रह गए। भिलाई में भी पाबला जी ने नहीं बताई। हाँ, दिल्ली में अजय झा ने जरूर तलाश दी।