हमारे देश मे पान की दुकानें नुक्कड़, चौराहे, गली, मोहल्ले के हर कोने पर होती हैं, यह एक ऐसा खुला मंच है जहाँ देश-विदेश की राजनीति, कला, फ़िल्म, गीत, कविता, गजल, ज्ञान- विज्ञान, जमीन से लेकर अंतरिक्ष तक की घटनाओं की बेबाक चर्चा होती है, कभी-कभी जूतम पैजार की नौबत भी आ जाती है, ये एक स्थान है जहाँ एक आम आदमी भी अपनी बात कह जाता है बड़े रोचक अन्दाज मे, कलमकारों को यहीं पर मौलिक चिंतन नि:शुल्क प्राप्त होते हैं लेखन के लिए, इस मायने मे यह एक महत्वपुर्ण स्थान है और माना जाता है कि राजनीति की प्रथम पाठशाला से लेकर सामाजिक सरोकारों से सम्बधित विभिन्न विषयों पर अंतिम शोध कार्य भी तो यहीं पर ही होता है। इसमे प्रकाशित विचार एवं आलेख लेखक के अपने हैं उसमे व्यवस्थापक की सहमति अनिवार्य नही है, लेखक स्वयं उत्तरदायी है।
एक थप्पड़ दिल्ली में ऐसा पड़ा कि अब इसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनाई पड़ रही है। सुनाई पड़नी भी चाहिए। आखिर यह आम आदमी का थप्पड़ है, इसकी गूंज तो दूर तलक जानी ही चाहिए। कहते हैं कि जब आम आदमी तस्त्र होकर आप खोता है तो ऐसा ही होता है। आखिर कब तक आम जनों को ये नेता बेवकूफ बनाते रहेंगे और कीड़े-मकोड़े समाते रहेंगे। अन्ना हजारे का बयान वाकई गौर करने लायक है कि क्या एक ही मारा। वास्तव में महंगाई को देखते हुए यह एक तमाचा तो नाकाफी लगता है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि आज देश का हर आमजन महंगाई की मार से इस तरह मर रहा है कि उनको कुछ सुझता नहीं है। ऐसे में जबकि कुछ समझ नहीं आता है तो इंसान वही करता है जो उसे सही लगता है। और संभवत: उस आम आदमी हरविंदर सिंह ने भी वही किया जो उनको ठीक लगा। भले कानून के ज्ञाता लाख यह कहें कि कानून को हाथ में लेना ठीक नहीं है। लेकिन क्या कानून महज आम जनों के लिए बना है? क्या अपने देश के नेता और मंत्री कानून से बड़े हैं? क्यों कर आम जनों के खून पसीने की कमाई पर भ्रष्टाचार करके ये नेता मौज करते हैं। क्या भ्रष्टाचार करने वाले नेताओं के लिए कोई कानून नहीं है? हर नेता भ्रष्टाचार करके बच जाता है। अब अपने देश के राजनेताओं को समझ लेना चाहिए कि आम आदमी जाग गया है, अब अगर ये नेता नहीं सुधरे तो हर दिन इनकों सड़कों पर पिटते रहने की नौबत आने वाली है। कौन कहता है कि महंगाई पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता है। हकीकत तो यह है कि सरकार की मानसकिता ही नहीं है देश में महंगाई कम करने की। एक छोटा सा उदाहरण यह है कि आज पेट्रोल की कीमत लगातार बढ़ाई जा रही है। कीमत बढ़ रही है, वह तो ठीक है, लेकिन सरकार क्यों कर इस पर लगने वाले टैक्स को समाप्त करने का काम नहीं करती है। एक इसी काम से महंगाई पर अंकुश लग जाएगा। जब पेट्रोल-डीजल पर टैक्स ही नहीं होगा तो यह इतना सस्ता हो जाएगा जिसकी कल्पना भी कोई नहीं कर सकता है। आज पेट्रोल और डीजल की कीमत का दोगुना टैक्स लगता है। टैक्स हटा दिया जाए तो महंगाई हो जाएगी न समाप्त। पेट्रोल और डीजल की बढ़ी कीमतों की मांग ही आम जनों के खाने की वस्तुओं पर पड़ती है। माल भाड़ा बढ़ता है और महंगाई बेलगाम हो जाती है। जब महंगाई अपने देश में बेलगाम है तो एक आम इंसान बेलगाम होकर मंत्री का गाल लाल कर देता है तो क्या यह गलत है। एक आम आदमी के नजरिए से तो यह कताई गलत नहीं है। थप्पड़ पर अन्ना हजारे के बयान पर विवाद खड़ा करने का भी प्रयास किया गया। उनका कहना गलत नहीं था, बस एक मारा। वास्तव में महंगाई की मार में जिस तरह से आम इंसान पिस रहा है, उस हिसाब से तो एक तमाचा नाकाफी है।
आज अपने देश की राजनीति पूरी तरह से धंधेबाजों का खेल बनकर रह गई है। यह बात हम हवा में नहीं कह रहे हैं। आज अपने राज्य और देश का विकास चाहने वाले राजनेताओं की जरूरत नहीं रह गई है। अच्छे राजनेता राजनीति से किनारा कर गए हैं। अपने राज्य छत्तीसगढ़ के पूर्व वित्त मंत्री डॉ. रामचंद्र सिंह देव भी ऐसे नेता हैं जिन्होंने राजनीति की गंदगी को देखते हुए राजनीति से किनारा कर लिया है। उनसे बात करने का मौका मिला तो उनका यह दर्द उभर कर सामना आया। उन्होंने जो कुछ हमें बताया हम उनके शब्दों में ही पेश कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ में विकास का सपना लिए मैंने 1967 में पहला विधानसभा चुनाव रिकॉर्ड मतों से जीता था। मेरी जीत के पीछे मेरा नहीं बल्कि मेरे पिता डीएस सिंह देव का नाम था जिनके कारण मुझ जैसे अंजान को मतदाताओं ने सिर आंखों पर बिठाया था। यहां से शुरू हुए मेरे राजनीति के सफर के बाद मैंने छह बार चुनाव जीता। पांच बार कांग्रेस की टिकिट पर और एक बार निर्दलीय। लेकिन इधर राजनीति में जिस तरह से हालात बदले और आज राजनीति जिस तरह से व्यापार में बदल गई है उसके कारण ही मुझे सक्रिय राजनीति से किनारा करना पड़ा। राजनीति से भले मैंने संन्यास ले लिया है, लेकिन जब भी विकास की बात आती है तो मैं चाहे छत्तीसगढ़ हो या मप्र या फिर मेरा पुराना राज्य बंगाल, मैं सबके लिए लड़ने हमेशा तैयार रहता हूं। राजनीति में आने का पहला मकसद होता है अपने क्षेत्र और राज्य के विकास के लिए काम करना। मैंने अपने राजनीतिक जीवन में यही प्रयास किया, लेकिन जब मुझे लगने लगा कि अब राजनीति ऐसी नहीं रह गई जिसमें रहकर कुछ किया जा सके तो मैंने संन्यास लेने का फैसला कर लिया। आज का मतदाता वोट डालने के एवज में पैसा चाहता है। वैसे मैं आज भी कांग्रेस में हूं, लेकिन सक्रिय राजनीति से मेरा कोई नाता नहीं रह गया है। मैं वर्तमान में राजनीतिक हालात की बात करूं तो आज कांग्रेस हो या भाजपा दोनों पार्टियों में अस्थिरता का दौर चल रहा है। छत्तीसगढ़ राज्य के 11 सालों की यात्रा की बात करें तो कांग्रेस शासन काल के तीन साल तो राज्य की बुनियाद रखने में ही निकल गए। भाजपा सरकार के आठ सालों की बात करें तो इन सालों में भाजपा सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया है जिसको महत्वपूर्ण माना जा सके। छत्तीसगढ़ बना तो इसकी आबादी दो करोड़ 5 लाख थी। छत्तीसगढ़ खनिज संपदा से परिपूर्ण राज्य है। यहां कोयला, लोहा, बाक्साइड, चूना, पत्थर भारी मात्रा में हैं। राज्य में इंद्रावती नदी से लेकर महानदी के कारण पानी की कमी नहीं है। इतना सब होने के बाद जिस तरह से राज्य का विकास होना था वह नहीं हो सका है। राज्य की 75 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती है, लेकिन जहां तक विकास का सवाल है तो राज्य में दस प्रतिशत ही विकास किया गया है और वह भी शहरी क्षेत्रों में। राज्य में 35 लाख परिवार गरीबी रेखा के नीचे हैं। राज्य में उद्योग तो लगे लेकिन ये उद्योग प्राथमिक उद्योग ही रहे। प्राथमिक उद्योग से मेरा तात्पर्य यह है कि कच्चे माल को सांचे में ढालने का ही काम किया गया है। उच्च तकनीक का कोई उद्योग राज्य में स्थापित नहीं किया जा सका है। अपने राज्य की तुलना में हरियाणा और पंजाब में कोई खनिज संपदा नहीं है, फिर भी इन राज्यों में उद्योगों की स्थिति छत्तीसगढ़ से ज्यादा अच्छी है। छत्तीसगढ़ का कच्चा माल बाहर जा रहा है, यह स्थिति राज्य के लिए हानिकारक है। छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है पर कृषि के लिए कुछ नहीं किया गया है। मैं इंडिया टूडे के एक सर्वे का उल्लेख करना चाहूंगा जिसमें देश के राज्यों में छत्तीसगढ़ को कृषि में 19वें स्थान पर रखा गया है। इसी तरह से अधोसंरचना में 19वां, निवेश में छठा, स्वास्थ्य में तीसरा सुक्ष्म अर्थव्यवस्था में 19वां और संपूर्ण विकास के मामले में देश में 16वें स्थान में रखा गया है। यह सर्वे भी साबित करता है कि राज्य में विकास नहीं हो सका है। जो 10 प्रतिशत विकास हुआ है, वह अमीरों का हुआ है। मेरा ऐसा मानना है कि भाजपा विकास के सही मायने समझ ही नहीं सकी। भाजपा को कृषि, लघु उद्योग, हस्तशिल्प पर जोर देना था ताकि गांवों में रहने वाली 75 प्रतिशत आबादी का विकास होता। ऐसा क्यूं नहीं हुआ यह एक चिंता का विषय है। जिस तरह से राज्य में उद्योग आ रहे हैं और खनिज संपदा का दोहन कर रहे हैं उससे राज्य आने वाले 40-50 सालों में खोखला हो जाएगा। सरकार ने दो रुपए किलो चावल दिया, यह अच्छी बात है, लेकिन इससे आर्थिक विकास कहां हुआ? सरकार को गरीबी रेखा में जीवन यापन करने वालों को इस रेखा से बाहर करने की दिशा में काम करना था। मैं अंत में अक्टूबर 2000 में मप्र के मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को लिए गए अपने एक पत्र का उल्लेख करना चाहूंगा जिसमें मैंने उन्हें लिखा था कि आपके पास तो बालाघाट का एक लांजी ही नक्सल प्रभावित क्षेत्र है, लेकिन छत्तीसगढ़ में बहुत ज्यादा क्षेत्र नक्सल प्रभावित है, अगर नक्सली क्षेत्र में सही विकास नहीं हुआ तो छत्तीसगढ़ नक्सलगढ़ हो जाएगा, आज लगता है कि मेरी यह भविष्यवाणी सच साबित हो गई है।
( चौथी दुनिया में प्रकाशित यह आलेख राज भाटिया के ब्लॉग पर था ,जो उन्हें किसी ने ई-मेल से भेजा था . यह खोजपूर्ण रिपोर्ट वाकई हमारे देश की आज़ादी और हमारे लोकतंत्र पर गंभीर खतरे का संकेत देकर जनता को सचेत करती है . राष्ट्र-हित और जन-हित में इसकी 'चर्चा पान की दुकान ' पर भी होनी चाहिए .इसलिए इसे यहाँ जस का तस प्रस्तुत किया जा रहा है. केवल मूल-आलेख के शीर्षक में परिवर्तन किया गया है. शेष यथावत है. हम 'चौथी दुनिया' को इस गंभीर राष्ट्रीय समस्या पर रिपोर्ट प्रकाशन के लिए बधाई और भाई राज भाटिया को अपने ब्लॉग पर इसकी प्रस्तुति के लिए धन्यवाद देते हुए 'पान की दुकान' के हमारे आदरणीय ग्राहकों के बीच चर्चा के लिए भी इसे पेश कर रहे हैं )
नकली नोट पर अब तक का सबसे बडा ख़ुलासा
रिजर्व बैंक के ख़जाने में नकली नोट कैसे पहुँचे
सीबीआई ने रिजर्व बैंक में क्यों छापा मारा
नकली नोट के खुलासे से यूरोप में भुचाल क्यों आया
देश के रिज़र्व बैंक के वाल्ट पर सीबीआई ने छापा डाला. उसे वहां पांच सौ और हज़ार रुपये के नक़ली नोट मिले. वरिष्ठ अधिकारियों से सीबीआई ने पूछताछ भी की. दरअसल सीबीआई ने नेपाल-भारत सीमा के साठ से सत्तर विभिन्न बैंकों की शाखाओं पर छापा डाला था, जहां से नक़ली नोटों का कारोबार चल रहा था. इन बैंकों के अधिकारियों ने सीबीआई से कहा कि उन्हें ये नक़ली नोट भारत के रिजर्व बैंक से मिल रहे हैं. इस पूरी घटना को भारत सरकार ने देश से और देश की संसद से छुपा लिया. या शायद सीबीआई ने भारत सरकार को इस घटना के बारे में कुछ बताया ही नहीं. देश अंधेरे में और देश को तबाह करने वाले रोशनी में हैं. आइए, आपको आज़ाद भारत के सबसे बड़े आपराधिक षड्यंत्र के बारे में बताते हैं, जिसे हमने पांच महीने की तलाश के बाद आपके सामने रखने का फ़ैसला किया है. कहानी है रिज़र्व बैंक के माध्यम से देश के अपराधियों द्वारा नक़ली नोटों का कारोबार करने की.
नक़ली नोटों के कारोबार ने देश की अर्थव्यवस्था को पूरी तरह अपने जाल में जकड़ लिया है. आम जनता के हाथों में नक़ली नोट हैं, पर उसे ख़बर तक नहीं है. बैंक में नक़ली नोट मिल रहे हैं, एटीएम नक़ली नोट उगल रहे हैं. असली-नक़ली नोट पहचानने वाली मशीन नक़ली नोट को असली बता रही है. इस देश में क्या हो रहा है, यह समझ के बाहर है. चौथी दुनिया की तहक़ीक़ात से यह पता चला है कि जो कंपनी भारत के लिए करेंसी छापती रही, वही 500 और 1000 के नक़ली नोट भी छाप रही है. हमारी तहक़ीक़ात से यह अंदेशा होता है कि देश की सरकार और रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया जाने-अनजाने में नोट छापने वाली विदेशी कंपनी के पार्टनर बन चुके हैं. अब सवाल यही है कि इस ख़तरनाक साज़िश पर देश की सरकार और एजेंसियां क्यों चुप हैं?
एक जानकारी जो पूरे देश से छुपा ली गई, अगस्त 2010 में सीबीआई की टीम ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के वाल्ट में छापा मारा. सीबीआई के अधिकारियों का दिमाग़ उस समय सन्न रह गया, जब उन्हें पता चला कि रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के ख़ज़ाने में नक़ली नोट हैं. रिज़र्व बैंक से मिले नक़ली नोट वही नोट थे, जिसे पाकिस्तान की खु़फिया एजेंसी नेपाल के रास्ते भारत भेज रही है. सवाल यह है कि भारत के रिजर्व बैंक में नक़ली नोट कहां से आए? क्या आईएसआई की पहुंच रिज़र्व बैंक की तिजोरी तक है या फिर कोई बहुत ही भयंकर साज़िश है, जो हिंदुस्तान की अर्थव्यवस्था को खोखला कर चुकी है. सीबीआई इस सनसनीखेज मामले की तहक़ीक़ात कर रही है. छह बैंक कर्मचारियों से सीबीआई ने पूछताछ भी की है. इतने महीने बीत जाने के बावजूद किसी को यह पता नहीं है कि जांच में क्या निकला? सीबीआई और वित्त मंत्रालय को देश को बताना चाहिए कि बैंक अधिकारियों ने जांच के दौरान क्या कहा? नक़ली नोटों के इस ख़तरनाक खेल पर सरकार, संसद और जांच एजेंसियां क्यों चुप है तथा संसद अंधेरे में क्यों है?
अब सवाल यह है कि सीबीआई को मुंबई के रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया में छापा मारने की ज़रूरत क्यों पड़ी? रिजर्व बैंक से पहले नेपाल बॉर्डर से सटे बिहार और उत्तर प्रदेश के क़रीब 70-80 बैंकों में छापा पड़ा. इन बैंकों में इसलिए छापा पड़ा, क्योंकि जांच एजेंसियों को ख़बर मिली है कि पाकिस्तान की खु़फ़िया एजेंसी आईएसआई नेपाल के रास्ते भारत में नक़ली नोट भेज रही है. बॉर्डर के इलाक़े के बैंकों में नक़ली नोटों का लेन-देन हो रहा है. आईएसआई के रैकेट के ज़रिए 500 रुपये के नोट 250 रुपये में बेचे जा रहे हैं. छापे के दौरान इन बैंकों में असली नोट भी मिले और नक़ली नोट भी. जांच एजेंसियों को लगा कि नक़ली नोट नेपाल के ज़रिए बैंक तक पहुंचे हैं, लेकिन जब पूछताछ हुई तो सीबीआई के होश उड़ गए. कुछ बैंक अधिकारियों की पकड़-धकड़ हुई. ये बैंक अधिकारी रोने लगे, अपने बच्चों की कसमें खाने लगे. उन लोगों ने बताया कि उन्हें नक़ली नोटों के बारे में कोई जानकारी नहीं, क्योंकि ये नोट रिजर्व बैंक से आए हैं. यह किसी एक बैंक की कहानी होती तो इसे नकारा भी जा सकता था, लेकिन हर जगह यही पैटर्न मिला. यहां से मिली जानकारी के बाद ही सीबीआई ने फ़ैसला लिया कि अगर नक़ली नोट रिजर्व बैंक से आ रहे हैं तो वहीं जाकर देखा जाए कि मामला क्या है. सीबीआई ऱिजर्व बैंक ऑफ इंडिया पहुंची, यहां उसे नक़ली नोट मिले. हैरानी की बात यह है कि रिज़र्व बैंक में मिले नक़ली नोट वही नोट थे, जिन्हें आईएसआई नेपाल के ज़रिए भारत भेजती है.
रिज़र्व बैंक आफ इंडिया में नक़ली नोट कहां से आए, इस गुत्थी को समझने के लिए बिहार और उत्तर प्रदेश में नक़ली नोटों के मामले को समझना ज़रूरी है. दरअसल हुआ यह कि आईएसआई की गतिविधियों की वजह से यहां आएदिन नक़ली नोट पकड़े जाते हैं. मामला अदालत पहुंचता है. बहुत सारे केसों में वकीलों ने अनजाने में जज के सामने यह दलील दी कि पहले यह तो तय हो जाए कि ये नोट नक़ली हैं. इन वकीलों को शायद जाली नोट के कारोबार के बारे में कोई अंदाज़ा नहीं था, स़िर्फ कोर्ट से व़क्त लेने के लिए उन्होंने यह दलील दी थी. कोर्ट ने जब्त हुए नोटों को जांच के लिए सरकारी लैब भेज दिया, ताकि यह तय हो सके कि ज़ब्त किए गए नोट नक़ली हैं. रिपोर्ट आती है कि नोट असली हैं. मतलब यह कि असली और नक़ली नोटों के कागज, इंक, छपाई और सुरक्षा चिन्ह सब एक जैसे हैं. जांच एजेंसियों के होश उड़ गए कि अगर ये नोट असली हैं तो फिर 500 का नोट 250 में क्यों बिक रहा है. उन्हें तसल्ली नहीं हुई. फिर इन्हीं नोटों को टोक्यो और हांगकांग की लैब में भेजा गया. वहां से भी रिपोर्ट आई कि ये नोट असली हैं. फिर इन्हें अमेरिका भेजा गया. नक़ली नोट कितने असली हैं, इसका पता तब चला, जब अमेरिका की एक लैब ने यह कहा कि ये नोट नक़ली हैं. लैब ने यह भी कहा कि दोनों में इतनी समानताएं हैं कि जिन्हें पकड़ना मुश्किल है और जो विषमताएं हैं, वे भी जानबूझ कर डाली गई हैं और नोट बनाने वाली कोई बेहतरीन कंपनी ही ऐसे नोट बना सकती है. अमेरिका की लैब ने जांच एजेंसियों को पूरा प्रूव दे दिया और तरीक़ा बताया कि कैसे नक़ली नोटों को पहचाना जा सकता है. इस लैब ने बताया कि इन नक़ली नोटों में एक छोटी सी जगह है, जहां छेड़छाड़ हुई है. इसके बाद ही नेपाल बॉर्डर से सटे बैंकों में छापेमारी का सिलसिला शुरू हुआ. नक़ली नोटों की पहचान हो गई, लेकिन एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया कि नेपाल से आने वाले 500 एवं 1000 के नोट और रिज़र्व बैंक में मिलने वाले नक़ली नोट एक ही तरह के कैसे हैं. जिस नक़ली नोट को आईएसआई भेज रही है, वही नोट रिजर्व बैंक में कैसे आया. दोनों जगह पकड़े गए नक़ली नोटों के काग़ज़, इंक और छपाई एक जैसी क्यों है. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि भारत के 500 और 1000 के जो नोट हैं, उनकी क्वालिटी ऐसी है, जिसे आसानी से नहीं बनाया जा सकता है और पाकिस्तान के पास वह टेक्नोलॉजी है ही नहीं. इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि जहां से ये नक़ली नोट आईएसआई को मिल रहे हैं, वहीं से रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया को भी सप्लाई हो रहे हैं. अब दो ही बातें हो सकती हैं. यह जांच एजेंसियों को तय करना है कि रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के अधिकारियों की मिलीभगत से नक़ली नोट आया या फिर हमारी अर्थव्यवस्था ही अंतरराष्ट्रीय मा़फ़िया गैंग की साज़िश का शिकार हो गई है. अब सवाल उठता है कि ये नक़ली नोट छापता कौन है.
हमारी तहक़ीक़ात डे ला रू नाम की कंपनी तक पहुंच गई. जो जानकारी हासिल हुई, उससे यह साबित होता है कि नक़ली नोटों के कारोबार की जड़ में यही कंपनी है. डे ला रू कंपनी का सबसे बड़ा करार रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के साथ था, जिसे यह स्पेशल वॉटरमार्क वाला बैंक नोट पेपर सप्लाई करती रही है. पिछले कुछ समय से इस कंपनी में भूचाल आया हुआ है. जब रिजर्व बैंक में छापा पड़ा तो डे ला रू के शेयर लुढ़क गए. यूरोप में ख़राब करेंसी नोटों की सप्लाई का मामला छा गया. इस कंपनी ने रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को कुछ ऐसे नोट दे दिए, जो असली नहीं थे. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की टीम इंग्लैंड गई, उसने डे ला रू कंपनी के अधिकारियों से बातचीत की. नतीजा यह हुआ कि कंपनी ने हम्प्शायर की अपनी यूनिट में उत्पादन और आगे की शिपमेंट बंद कर दी. डे ला रू कंपनी के अधिकारियों ने भरोसा दिलाने की बहुत कोशिश की, लेकिन रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने यह कहा कि कंपनी से जुड़ी कई गंभीर चिंताएं हैं. अंग्रेजी में कहें तो सीरियस कंसर्नस. टीम वापस भारत आ गई.
डे ला रू कंपनी की 25 फीसदी कमाई भारत से होती है. इस ख़बर के आते ही डे ला रू कंपनी के शेयर धराशायी हो गए. यूरोप में हंगामा मच गया, लेकिन हिंदुस्तान में न वित्त मंत्री ने कुछ कहा, न ही रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने कोई बयान दिया. रिज़र्व बैंक के प्रतिनिधियों ने जो चिंताएं बताईं, वे चिंताएं कैसी हैं. इन चिंताओं की गंभीरता कितनी है. रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के साथ डील बचाने के लिए कंपनी ने माना कि भारत के रिज़र्व बैंक को दिए जा रहे करेंसी पेपर के उत्पादन में जो ग़लतियां हुईं, वे गंभीर हैं. बाद में कंपनी के चीफ एक्जीक्यूटिव जेम्स हसी को 13 अगस्त, 2010 को इस्ती़फा देना पड़ा. ये ग़लतियां क्या हैं, सरकार चुप क्यों है, रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया क्यों ख़ामोश है. मज़ेदार बात यह है कि कंपनी के अंदर इस बात को लेकर जांच चल रही थी और एक हमारी संसद है, जिसे कुछ पता नहीं है.
5 जनवरी, 2011 को यह ख़बर आई कि भारत सरकार ने डे ला रू के साथ अपने संबंध ख़त्म कर लिए. पता यह चला कि 16,000 टन करेंसी पेपर के लिए रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने डे ला रू की चार प्रतियोगी कंपनियों को ठेका दे दिया. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने डे ला रू को इस टेंडर में हिस्सा लेने के लिए आमंत्रित भी नहीं किया. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और भारत सरकार ने इतना बड़ा फै़सला क्यों लिया. इस फै़सले के पीछे तर्क क्या है. सरकार ने संसद को भरोसे में क्यों नहीं लिया. 28 जनवरी को डे ला रू कंपनी के टिम कोबोल्ड ने यह भी कहा कि रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया के साथ उनकी बातचीत चल रही है, लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि डे ला रू का अब आगे रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के साथ कोई समझौता होगा या नहीं. इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी डे ला रू से कौन बात कर रहा है और क्यों बात कर रहा है. मज़ेदार बात यह है कि इस पूरे घटनाक्रम के दौरान रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ख़ामोश रहा.
इस तहक़ीक़ात के दौरान एक सनसनीखेज सच सामने आया. डे ला रू कैश सिस्टम इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को 2005 में सरकार ने दफ्तर खोलने की अनुमति दी. यह कंपनी करेंसी पेपर के अलावा पासपोर्ट, हाई सिक्योरिटी पेपर, सिक्योरिटी प्रिंट, होलोग्राम और कैश प्रोसेसिंग सोल्यूशन में डील करती है. यह भारत में असली और नक़ली नोटों की पहचान करने वाली मशीन भी बेचती है. मतलब यह है कि यही कंपनी नक़ली नोट भारत भेजती है और यही कंपनी नक़ली नोटों की जांच करने वाली मशीन भी लगाती है. शायद यही वजह है कि देश में नक़ली नोट भी मशीन में असली नज़र आते हैं. इस मशीन के सॉफ्टवेयर की अभी तक जांच नहीं की गई है, किसके इशारे पर और क्यों? जांच एजेंसियों को अविलंब ऐसी मशीनों को जब्त करना चाहिए, जो नक़ली नोटों को असली बताती हैं. सरकार को इस बात की जांच करनी चाहिए कि डे ला रू कंपनी के रिश्ते किन-किन आर्थिक संस्थानों से हैं. नोटों की जांच करने वाली मशीन की सप्लाई कहां-कहां हुई है.
हमारी जांच टीम को एक सूत्र ने बताया कि डे ला रू कंपनी का मालिक इटालियन मा़िफया के साथ मिलकर भारत के नक़ली नोटों का रैकेट चला रहा है. पाकिस्तान में आईएसआई या आतंकवादियों के पास जो नक़ली नोट आते हैं, वे सीधे यूरोप से आते हैं. भारत सरकार, रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया और देश की जांच एजेंसियां अब तक नक़ली नोटों पर नकेल इसलिए नहीं कस पाई हैं, क्योंकि जांच एजेंसियां अब तक इस मामले में पाकिस्तान, हांगकांग, नेपाल और मलेशिया से आगे नहीं देख पा रही हैं. जो कुछ यूरोप में हो रहा है, उस पर हिंदुस्तान की सरकार और रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया चुप है.
अब सवाल उठता है कि जब देश की सबसे अहम एजेंसी ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बताया, तब सरकार ने क्या किया. जब डे ला रू ने नक़ली नोट सप्लाई किए तो संसद को क्यों नहीं बताया गया. डे ला रू के साथ जब क़रार ़खत्म कर चार नई कंपनियों के साथ क़रार हुए तो विपक्ष को क्यों पता नहीं चला. क्या संसद में उन्हीं मामलों पर चर्चा होगी, जिनकी रिपोर्ट मीडिया में आती है. अगर जांच एजेंसियां ही कह रही हैं कि नक़ली नोट का काग़ज़ असली नोट के जैसा है तो फिर सप्लाई करने वाली कंपनी डे ला रू पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई. सरकार को किसके आदेश का इंतजार है. समझने वाली बात यह है कि एक हज़ार नोटों में से दस नोट अगर जाली हैं तो यह स्थिति देश की वित्तीय व्यवस्था को तबाह कर सकती है. हमारे देश में एक हज़ार नोटों में से कितने नोट जाली हैं, यह पता कर पाना भी मुश्किल है, क्योंकि जाली नोट अब हमारे बैंकों और एटीएम मशीनों से निकल रहे हैं.
डे ला रू का नेपाल और आई एस आई कनेक्शन
कंधार हाईजैक की कहानी बहुत पुरानी हो गई है, लेकिन इस अध्याय का एक ऐसा पहलू है, जो अब तक दुनिया की नज़र से छुपा हुआ है. इस खउ-814 में एक ऐसा शख्स बैठा था, जिसके बारे में सुनकर आप दंग रह जाएंगे. इस आदमी को दुनिया भर में करेंसी किंग के नाम से जाना जाता है. इसका असली नाम है रोबेर्टो ग्योरी. यह इस जहाज में दो महिलाओं के साथ स़फर कर रहा था. दोनों महिलाएं स्विट्जरलैंड की नागरिक थीं. रोबेर्टो़ खुद दो देशों की नागरिकता रखता है, जिसमें पहला है इटली और दूसरा स्विट्जरलैंड. रोबेर्टो को करेंसी किंग इसलिए कहा जाता है, क्योंकि यह डे ला रू नाम की कंपनी का मालिक है. रोबेर्टो ग्योरी को अपने पिता से यह कंपनी मिली. दुनिया की करेंसी छापने का 90 फी़सदी बिजनेस इस कंपनी के पास है. यह कंपनी दुनिया के कई देशों कें नोट छापती है. यही कंपनी पाकिस्तान की आईएसआई के लिए भी काम करती है. जैसे ही यह जहाज हाईजैक हुआ, स्विट्जरलैंड ने एक विशिष्ट दल को हाईजैकर्स से बातचीत करने कंधार भेजा. साथ ही उसने भारत सरकार पर यह दबाव बनाया कि वह किसी भी क़ीमत पर करेंसी किंग रोबेर्टो ग्योरी और उनके मित्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करे. ग्योरी बिजनेस क्लास में स़फर कर रहा था. आतंकियों ने उसे प्लेन के सबसे पीछे वाली सीट पर बैठा दिया. लोग परेशान हो रहे थे, लेकिन ग्योरी आराम से अपने लैपटॉप पर काम कर रहा था. उसके पास सैटेलाइट पेन ड्राइव और फोन थे.यह आदमी कंधार के हाईजैक जहाज में क्या कर रहा था, यह बात किसी की समझ में नहीं आई है. नेपाल में ऐसी क्या बात है, जिससे स्विट्जरलैंड के सबसे अमीर व्यक्ति और दुनिया भर के नोटों को छापने वाली कंपनी के मालिक को वहां आना पड़ा. क्या वह नेपाल जाने से पहले भारत आया था. ये स़िर्फ सवाल हैं, जिनका जवाब सरकार के पास होना चाहिए. संसद के सदस्यों को पता होना चाहिए, इसकी जांच होनी चाहिए थी. संसद में इस पर चर्चा होनी चाहिए थी. शायद हिंदुस्तान में फैले जाली नोटों का भेद खुल जाता.
नकली नोंटों का मायाजाल
सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि 2006 से 2009 के बीच 7.34 लाख सौ रुपये के नोट, 5.76 लाख पांच सौ रुपये के नोट और 1.09 लाख एक हज़ार रुपये के नोट बरामद किए गए. नायक कमेटी के मुताबिक़, देश में लगभग 1,69,000 करोड़ जाली नोट बाज़ार में हैं. नक़ली नोटों का कारोबार कितना ख़तरनाक रूप ले चुका है, यह जानने के लिए पिछले कुछ सालों में हुईं कुछ महत्वपूर्ण बैठकों के बारे में जानते हैं. इन बैठकों से यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि देश की एजेंसियां सब कुछ जानते हुए भी बेबस और लाचार हैं. इस धंधे की जड़ में क्या है, यह हमारे ख़ुफिया विभाग को पता है. नक़ली नोटों के लिए बनी ज्वाइंट इंटेलिजेंस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि भारत नक़ली नोट प्रिंट करने वालों के स्रोत तक नहीं पहुंच सका है. नोट छापने वाले प्रेस विदेशों में लगे हैं. इसलिए इस मुहिम में विदेश मंत्रालय की मदद लेनी होगी, ताकि उन देशों पर दबाव डाला जा सके. 13 अगस्त, 2009 को सीबीआई ने एक बयान दिया कि नक़ली नोट छापने वालों के पास भारतीय नोट बनाने वाला गुप्त सांचा है, नोट बनाने वाली स्पेशल इंक और पेपर की पूरी जानकारी है. इसी वजह से देश में असली दिखने वाले नक़ली नोट भेजे जा रहे हैं. सीबीआई के प्रवक्ता ने कहा कि नक़ली नोटों के मामलों की तहक़ीक़ात के लिए देश की कई एजेंसियों के सहयोग से एक स्पेशल टीम बनाई गई है. 13 सितंबर, 2009 को नॉर्थ ब्लॉक में स्थित इंटेलिजेंस ब्यूरो के हेड क्वार्टर में एक मीटिंग हुई थी, जिसमें इकोनोमिक इंटेलिजेंस की सारी अहम एजेंसियों ने हिस्सा लिया. इसमें डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस, इंटेलिजेंस ब्यूरो, आईबी, वित्त मंत्रालय, सीबीआई और सेंट्रल इकोनोमिक इंटेलिजेंस ब्यूरो के प्रतिनिधि मौजूद थे. इस मीटिंग का निष्कर्ष यह निकला कि जाली नोटों का कारोबार अब अपराध से बढ़कर राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बन गया है. इससे पहले कैबिनेट सेक्रेटरी ने एक उच्चस्तरीय बैठक बुलाई थी, जिसमें रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया, आईबी, डीआरआई, ईडी, सीबीआई, सीईआईबी, कस्टम और अर्धसैनिक बलों के प्रतिनिधि मौजूद थे. इस बैठक में यह तय हुआ कि ब्रिटेन के साथ यूरोप के दूसरे देशों से इस मामले में बातचीत होगी, जहां से नोट बनाने वाले पेपर और इंक की सप्लाई होती है. तो अब सवाल उठता है कि इतने दिनों बाद भी सरकार ने कोई कार्रवाई क्यों नहीं की, जांच एजेंसियों को किसके आदेश का इंतजार है?( यह आलेख 'चौथी दुनिया' से साभार )
देश के पहरेदार और समाज के ठेकेदार अब हमको और आपको 'जागते रहो' की पुकार लगा कर सावधान नहीं करते. आज-कल उनका जोशीला नारा हो गया है--'खेलते रहो, खेलते रहो '. इसी में उनकी भलाई है . क्यों और कैसे , यह जानना हो , तो पढ़िए यह लघु-कथा .
किसी देश के एक शहर में कुछ जागरूक युवाओं ने महंगाई , मिलावट ,मुनाफाखोरी, जमाखोरी, बेरोजगारी कल-कारखानों के बढ़ते प्रदूषण और सार्वजनिक जीवन में व्याप रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष के लिए प्रगतिशील युवा मंच का गठन किया था. काले कारोबारियों , उद्योगपतियों और अज़गर संस्कृति वाले भ्रष्ट अफसरों ने अपने कथित वी.आई .पी. क्लब में शराब की बहती नदी के बीच इस समाचार को छोटे परदे के लाफ्टर -शो वाले जोकरों का कोई लतीफा मान कर चटखारों के साथ इसका खूब मज़ा लिया.
एक दिन युवा मंच के कार्यकर्ताओं ने सेठ धरमचंद की दुकान पर मिर्च के पैकेट में लकड़ी के बुरादे की मिलावट पकड़ ली. दूसरे दिन इन्ही कार्यकर्ताओं ने एक मशहूर मिठाई की दुकान' मधुर मिष्ठान्न' में नकली खोवे का जखीरा बरामद किया . प्रमाण सहित दोनों मामलों की शिकायत स्थानीय खाद्य-निरीक्षक से की गयी. लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई . कलेक्टर को लिखा गया . कोई ज़वाब नहीं आया .शिकायत ने और भी आला -अफसरों के दफ्तरों तक दौड़ लगाई . फिर भी कोई नतीजा नहीं निकला . सेठ धरमचंद और मिठाई दुकानदार दोनों खूब हँस रहे थे ,लेकिन प्रगतिशील युवा मंच ने जब नाराज़ हो कर शहर बंद का आव्हान किया ,तो दोनों चिंतित हो गए .
सेठ जी ने मोबाईल फोन पर आरा -मिल के मालिक सत्यव्रत और मधुर-मिष्ठान्न के प्रोप्राइटर हरिश्चन्द्र को आपात बैठक के लिए बुलवाया . दरअसल जिस मामले को वे तीनों मामूली समझ रहे थे ,वह उतना ही गंभीर होता जा रहा था . मिलावट से परेशान जनता इन युवाओं को समर्थन दे रही थी . सत्यव्रत जी का चिंतित होना भी स्वाभाविक था.क्योंकि सेठ धरमचंद के 'देशभक्त ब्रांड ' मिर्च के लिए लकड़ी के बुरादे की पूर्ति उनके आरा-मिल से होती थी. हरिश्चन्द्र जी के माथे पर भी गहरी चिंता की लकीरें उभरने लगी थी .कारण यह कि नकली खोवे के राष्ट्रीय कारोबार में भी तीनों साझेदार थे.
अब तक तीनों को मिलावट के इस काले कारोबार में करोड़ों का मुनाफ़ा हो चुका था और वे पिछले कई वर्षों से ऐश-ओ-आराम की जिंदगी का मज़ा ले रहे थे .रहस्यों का पर्दाफ़ाश होने पर अब उन्हें यह फायदे का व्यापार डूबता दिखाई दे रहा था. तीनों साझेदारों की आपात बैठक सेठ धरमचंद के महलनुमा मकान में शुरू हुई . बैठक में सेठ धरमचंद ने धरम-करम का हवाला देते हुए कहा - जनता को बेवकूफ बना कर रूपए कमाने के दिन लगता है कि लद गए . क्या करें ,समझ में नहीं आ रहा . सत्यव्रत जी ने उन्हें दिलासा देते हुए कहा- '' निराश नहीं होना चाहिए . तुम तो अभी से हिम्मत हार रहे हो.'' धरमचंद ने मायूसी के साथ कहा -''अब उपाय ही क्या रह गया है सत्यव्रत भाई ? '' तभी सेठ धरमचंद का पैंतीस वर्षीय सुपुत्र वसूलीचंद ' 'उपाय है बाबूजी ,मै बताता हूं '' कहते हुए कमरे में आया . वह स्थानीय महाविद्यालय में पिछले दस वषों से समाज-शास्त्र में एम.ए. का छात्र था और छात्र-संघ का अध्यक्ष भी. ''क्या उपाय है बेटे ? ''--तीनों साझेदारों ने बहुत व्यग्र होकर उसकी तरफ देखा . इस पर मुस्कुराते हुए 'धर्म-पुत्र ' ने उन्हें जो उपाय बताया , उसे सुनकर तीनों मित्रों की बांछे खिल उठीं . सत्यव्रत जी ने धरमचंद की पीठ ठोंकी -वाह ! क्या होनहार बेटा पाया है तुमने !
'मिलावटखोरों के खिलाफ कल शहर बंद के आयोजन को सफल बनाएँ ' --प्रगतिशील युवा मंच के कार्यकर्ता एक सायकल रिक्शे पर घूम-घूम कर लाऊड स्पीकर से नागरिकों के नाम अपील प्रसारित कर रहे थे . जनता में मिलावटखोरों के खिलाफ काफी गुस्सा था. लिहाजा ,वह इस बंद को कामयाब बनाने के लिए मानसिक रूप से तैयार थी . बंद के दिन रास्ते वीरान हो गए थे . मिलावटखोरों ने भी डर के मारे अपनी दुकानें बंद रखी . नागरिकों का यह स्व-स्फूर्त बंद शत-प्रतिशत सफल होने के साफ़-साफ़ संकेत दे रहा था. सुबह के दस बजे ही थे .
तभी शहर की वीरान सडकों पर एक मोटर गाड़ी घूमने लगी , जिस पर लाऊड-स्पीकर से ऐलान किया जा रहा था --- ' आज सवेरे नेहरु-स्टेडियम में हमारे जिले और पड़ोसी जिले के प्रसिद्ध क्लबों की मशहूर टीमों के बीच बीस-बीस ओवरों का क्रिकेट मैच होगा. इसका शुभारंभ महेंद्र सिंह धोनी के ड्राय -क्लीनर सुरेन्द्र सिंह जी करेंगे . आप लोगों से निवेदन है कि मैच देख कर अपना मनोरंजन करें और खिलाड़ियों का भी हौसला बढाएं ! '' फिर क्या था ? स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थी अपने घरों से निकल कर परेड-मैदान की तरफ दौड़ने लगे ! मूंगफली . चाट-पकौड़े , टायलेट-क्लीनर (कोल्ड-ड्रिंक ), पान-गुटका और बीडी -सिगरेट बेचने के लिए खोमचे वाले और छोटे दुकानदार भी दौड़े ! शहर के रईसजादों की चमचमाती कारें भी मैदान की ओर दौड़ने लगी .मैदान खचाखच भर गया . विशेष अतिथियों के लिए आरक्षित सीटों पर बैठे सेठ धरमचंद , सत्यव्रत और हरिश्चन्द्र काफी खुश नजर आ रहे थे . उन्होंने देखा - शहर के नागरिक मिलावट की समस्या को भूल कर क्रिकेट मैच देखने में मगन हैं और नगर-बंद की अपील करने वाले प्रगतिशील युवा मंच के कार्यकर्ता अपना सिर धुन रहे हैं !
सत्यव्रत जी ने सेठ धरमचंद को बधाई दी और कहा --- '' वाह ! क्या आइडिया दिया था तुम्हारे लाडले बेटे ने ! अब हम 'देशभक्त' ब्रांड मिर्च पावडर का व्यापार खुलकर आसानी से कर सकेंगे ! मिर्च पावडर में बुरादे की मिलावट के लिए मेरी 'जंगल-प्रेमी' आरा मशीन भी खूब चलेगी !'' बधाई हो धरमचंद ! मेरी नकली खोवे की मिठाइयां भी खूब बिकेंगी !''--हरिश्चन्द्र ने चहकते हुए कहा . क्रिकेट मैच देखने के बाद तीनो साझेदार खुशी-खुशी एक सितारा होटल के बीयर-बार में गए,जहां उन्होंने जमकर जाम छलकाया .
लेखक - स्वराज्य करुण
केंद्र सरकार के कुछ नासमझ और लापरवाह अधिकारी देश के बेरोजगार युवाओं के भविष्य के साथ किस बेशर्मी और बेरहमी से खिलवाड़ कर रहे हैं , इसका ताजा उदाहरण बीते रविवार 27 मार्च को केन्द्रीय कर्मचारी चयन आयोग द्वारा जूनियर इंजीनियर भर्ती के लिए दिल्ली , जयपुर , देहरादून , कोलकाता , मुम्बई , नागपुर, रायपुर और भोपाल सहित भारत के 33 शहरों में आयोजित परीक्षा में देखा गया .
यह अखिल भारतीय खुली संयुक्त परीक्षा केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग , सैन्य अभियांत्रिकी सेवा आदि सरकारी एजेंसियों में सिविल और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरों की भर्ती के लिए थी . इसमें भारत सरकार के मान्यता प्राप्त संस्थानों से सिविल अथवा इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा या सम- कक्ष उपाधि प्राप्त आवेदक शामिल हो सकते थे , जैसा कि आयोग द्वारा एक जनवरी 2011 के साप्ताहिक 'रोजगार समाचार ' में प्रकाशित विज्ञापन में लिखा हुआ है .हालांकि इस विरोधाभासी विज्ञापन में यह भी लिखा हुआ है कि दोनों प्रश्न-पत्रों में सामान्य-अभियांत्रिकी के अंतर्गत इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल के सवाल भी पूछे जाएंगे , लेकिन वास्तव में ये दोनों ही विषय इंजीनियरिंग की अलग-अलग शाखाओं के हैं और दोनों में अलग-अलग डिग्री -डिप्लोमा का प्रावधान है. दोनों के पाठ्यक्रम भी अलग-अलग स्वरुप के होते हैं. हैरत की बात है कि जब कर्मचारी चयन आयोग द्वारा केवल सिविल और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरों की भर्ती होनी थी तो उसके लिए आयोजित लिखित परीक्षा में मैकेनिकल इंजीनियरिंग के प्रश्न देने का क्या औचित्य था ? प्रश्न पत्र तैयार करने वाले की बुद्धि पर तरस आता है. विज्ञापन तो सिर्फ सिविल और इलेक्ट्रिकल वालों के लिए जारी हुआ था . लेकिन देश के हज़ारों बेरोजगार अभ्यर्थियों ने इस विज्ञापन के आधार पर यह सोच कर आवेदन कर दिया था कि शायद परीक्षा की तारीख आते तक आयोग वालों को अपनी गलती का एहसास हो जाएगा और वे इस विरोधाभासी प्रावधान को सुधार लेंगे .लेकिन जब परीक्षा हुई तो उसमें इलेक्ट्रिकल वालों को मैकेनिकल के सवाल हल करना भी अनिवार्य था .
कुछ परीक्षार्थियों ने बताया कि यह तो वही बात हुई , जैसे एलोपैथिक(एम.बी.बी. एस. ) डॉक्टरों की भर्ती परीक्षा में आयुर्वेदिक (बी. ए. एम. एस. ) या नहीं तो होम्योपैथिक (बी.एच. एम.एस. ) पाठ्यक्रम के प्रश्न दे दिए जाएँ , या फिर वनस्पति-विज्ञान की परीक्षा में गणित के और संस्कृत भाषा के प्रश्न-पत्र में अंग्रेजी भाषा के सवाल पूछे जाएँ ! आयोग द्वारा इलेक्ट्रिकल इंजीनियरों की संयुक्त भर्ती परीक्षा के प्रथम प्रश्न-पत्र में कुल दो सौ ऑब्जेक्टिव -टाईप के सवाल दिए गए थे . कुल अंक दो सौ थे . यानी प्रत्येक प्रश्न पर एक अंक. इनमे सामान्य बुद्धि और तर्क के 50 और सामान्य जानकारी के 50 प्रश्नों पर तो परीक्षार्थियों को आपत्ति नहीं हुई , लेकिन प्रश्न-पत्र के भाग-ख में सामान्य इंजीनियरिंग के तहत इलेक्ट्रिकल और मेकेनिकल के कुल 100 प्रश्नों पर उन्होंने यह सवाल उठाया है कि आखिर इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में बी.ई. डिग्री अथवा पॉलीटेक्निक डिप्लोमा किया हुआ आवेदक मैकेनिकल इंजीनियरिंग के सवाल कैसे हल कर पाएगा ?
इसी तरह द्वितीय प्रश्न-पत्र केवल सामान्य-इंजीनियरिंग का दिया गया .इसमें कुल तीन सौ अंक थे और कुल एक दर्जन में से कोई दस सवाल हल करने थे. यह निबंधात्मक प्रश्न-पत्र था ,जिसमे अभ्यर्थियों को दो-दो उत्तर पुस्तिकाएं दी गयी. इनमें से एक उत्तर-पुस्तिका में इलेक्ट्रिकल और दूसरी पुस्तिका में मैकेनिकल के प्रश्नों को हल करना अनिवार्य था. मुश्किल यह हुई कि न तो इलेक्ट्रिकल वाले मैकेनिकल के सवाल हल कर पाए और न ही मैकेनिकल वाले इलेक्ट्रिकल के प्रश्नों को . कहने का आशय यह कि इलेक्ट्रिकल और मैकेनिकल इंजीनियरिंग के अलग- अलग स्वरुप के पाठ्यक्रमों में डिग्री अथवा डिप्लोमा लेकर आए आवेदकों को इस चयन-परीक्षा से काफी निराशा हुई . इसमें उन्हें केलकुलेटर का इस्तेमाल भी नहीं करने दिया गया ,जबकि इंजीनियरिंग स्नातकों के लिए होने वाली GATE की परीक्षा में केलकुलेटर रखने की सुविधा दी जाती है.
बहरहाल कुछ अयोग्य और अज्ञानी अधिकारियों द्वारा कर्मचारी चयन आयोग की जूनियर इंजीनियर चयन परीक्षा में गलत तरीके से तैयार प्रश्न-पत्रों के कारण हज़ारों बेरोजगार इंजीनियरों को रोजगार के एक बेहतर अवसर से वंचित होना पड़ा . उनका भविष्य चौपट हो गया . क्या इसके लिए कहीं कोई जिम्मेदारी तय होगी ? कुछ परीक्षार्थी इस अन्याय के खिलाफ अदालत जाने का मन बना रहे हैं.
स्वराज्य करुण
विज्ञान और टेक्नालॉजी जहाँ हमारे जीवन को सहज-सरल और सुविधाजनक बनाने के सबसे बड़े औजार हैं , वहीं उनके अनेक आविष्कारों ने आधुनिक समाज के सामने कई गंभीर चुनौतियां भी पैदा कर दी हैं . बहुत पहले वाष्प और बाद में डीजल और पेट्रोल से चलने और दौड़ने वाली गाड़ियों का आविष्कार इसलिए नहीं हुआ कि लोग उनसे कुचल कर या टकरा कर अपना बेशकीमती जीवन गँवा दें , लेकिन अगर हम अपने ही देश में देखें तो अखबारों में हर दिन सड़क हादसों की दिल दहला देने वाली ख़बरें कहीं सिंगल ,या कहीं डबल कॉलम में या फिर हादसे की विकरालता के अनुसार उससे भी ज्यादा आकार में छपती रहती हैं .कितने ही घरों के चिराग बुझ जाते हैं , सुहाग उजड़ जाते हैं और कितने ही लोग घायल होकर हमेशा के लिए विकलांग हो जाते है .सड़क हादसों की दिनों-दिन बढ़ती संख्या अब एक गंभीर राष्ट्रीय समस्या बनती जा रही है.आंकड़ों पर न जाकर अपने आस-पास नज़र डालें , तो भी हमें स्थिति की गंभीरता का आसानी से अंदाजा हो जाएगा .
तीव्र औद्योगिक-विकास , तेजी से बढ़ती जनसंख्या, तूफानी रफ्तार से हो रहे शहरीकरण और आधुनिक उपभोक्तावादी जीवन शैली की सुविधाभोगी मानसिकता से समाज में मोटर-चालित गाड़ियों की संख्या भी बेतहाशा बढ़ रही है . औद्योगिक-प्रगति से जैसे -जैसे व्यापार-व्यवसाय बढ़ रहा है , माल-परिवहन के लिए विशालकाय भारी वाहन भी सड़कों पर बढते जा रहे हैं. ट्रकें सोलह चक्कों से बढ़कर सौ-सौ चक्कों की आने लगी हैं. दो-पहिया ,चार-पहिया वाहनों के साथ-साथ यात्री-बसों और माल-वाहक ट्रकों की बेतहाशा दौड़ रोज सड़कों पर नज़र आती है. सड़कें भी इन गाड़ियों का वजन सम्हाल नहीं पाने के कारण आकस्मिक रूप से दम तोड़ने लगती हैं . त्योहारों , मेले-ठेलों , और जुलूस-जलसों के दौरान भी बेतरतीब यातायात के कारण हादसे हो जाते हैं .
शहरों में ट्राफिक-जाम और वाहनों की बेतरतीब हल-चल देख कर मुझे तो कभी-कभी यह भ्रम हो जाता है कि इंसानी आबादी से कहीं ज्यादा मोटर-वाहनों की जन-संख्या तो नहीं बढ़ रही है ? सरकारें जनता की सुविधा के लिए सड़कों की चौड़ाई बढ़ाने का कितना भी प्रयास क्यों न करे , लेकिन गाड़ियों की भीड़ या वाहनों की बेहिसाब रेलम-पेल से सरकारों की तमाम कोशिशें बेअसर साबित होने लगती हैं . वाहनों के बढ़ते दबाव की वजह से सरकार सिंगल-लेन की डामर की सड़कें डबल लेन ,में और डबल-लेन की सड़कों को फोर-लेन में बदलती हैं . फोर-लेन की सड़कें सिक्स -लेन में तब्दील की जाती हैं . इस प्रक्रिया में सड़कों के किनारे की कई बस्तियों को हटना या फिर हटाना पड़ता है . उन्हें मुआवजा भी दिया जाता है .सड़क-चौड़ीकरण और मुआवजा बांटने में ही सरकारों के अरबों -खरबों रूपए खर्च हो जाते हैं . यह जनता का ही धन है. लेकिन सरकारें भी आखिर करें भी तो क्या ? जिस रफ्तार से सड़कों पर वाहनों की आबादी बढ़ रही है , आने वाले वर्षों में अगर हमें सिक्स-लेन और आठ-लेन की सड़कों को बारह-लेन , बीस-लेन और पच्चीस -पच्चास लेन की सड़कों में बदलने के लिए मजबूर होना पड़ जाए , तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए. लेकिन क्या सड़क-दुर्घटनाओं का इकलौता कारण वाहनों की बढ़ती जन-संख्या है ? मेरे विचार से यह समस्या का सिर्फ एक पहलू है. इसके दूसरे पहलू के साथ और भी कई कारण हैं ,जिन पर संजीदगी से विचार करने की ज़रूरत है. आर्थिक-उदारीकरण के माहौल ने देश में धनवानों के एक नए आर्थिक समूह को भी जन्म दिया है. कारपोरेट-सेक्टर के अधिकारियों सहित सरकारी -कर्मचारियों और अधिकारियों की तनख्वाहें पिछले दस-पन्द्रह साल में कई गुना ज्यादा हो गई हैं. बड़ी-बड़ी निजी कंपनियों में इंजीनियर और अन्य तकनीकी स्टाफ अब मासिक वेतन पर नहीं , लाखों रूपयों के सालाना 'पैकेज' पर रखे जाते हैं .इससे समाज में उपभोक्तावादी मानसिकता लेकर एक नए किस्म का मध्य-वर्ग तैयार हो रहा है . जिसके बच्चे भी अब दो-पहिया वाहन नहीं , बल्कि चार-चक्के वाली कार को अपना 'स्टेटस' मानने लगे हैं . सरकारी -बैंकों के साथ अब निजी बैंक भी अपने ग्राहकों को वाहन खरीदने के लिए उदार-नियमों और आसान-किश्तों पर क़र्ज़ लेने की सुविधा दे रहे है . कई बैंक तो गली-मुहल्लों में लोन-मेले आयोजित करने लगे हैं .इन सबका एक नतीजा यह आया है कि जिसके घर में चार-चक्के वाली गाड़ी रखने की जगह नहीं है , वह भी उसे खरीद कर अपने घर के सामने वाली सार्वजनिक-सड़क .या फिर मोहल्ले की गली में खड़ी कर रहा है और सार्वजनिक रास्तों को सरे-आम बाधित कर रहा है . उधर आधुनिक-तकनीक से बनी गाड़ियों में 'पिक-अप ' और रात में आँखों को चौंधियाने वाली हेड-लाईट की एक अलग महिमा है .ट्राफिक-नियमों का ज्ञान नहीं होना , हेलमेट नहीं पहनना , नाबालिगों के हाथों में मोटर-बाईक के हैंडल और गाड़ियों की स्टेयरिंग थमा देना , शराब पीकर गाड़ी चलाना जैसे कई कारण भी इन हादसों के लिए जिम्मेदार होते होते हैं .अब तो गाँवों की गलियों में भी मोटर सायकलों का फर्राटे से दौड़ना कोई नयी बात नहीं है.
उत्तरप्रदेश के एक अखबार में वाराणसी से छपी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि हर साल जितनी मौतें आपराधिक घटनाओं में होती हैं , उनसे औसतन पांच गुना ज्यादा जानें सड़क हादसों में चली जाती हैं . रिपोर्ट में इसके जिलेवार आंकड़े भी दिए गए है और कहा गया है कि कहीं बदहाल सड़कों के कारण तो कहीं काफी अच्छी चिकनी सड़कों के कारण भी हादसे हो रहे हैं . इसमें यह भी कहा गया है कि अधिकतर हादसे ऐसी सड़कों पर हो रहे हैं , जिनकी हालत काफी अच्छी हैं .ऐसी सड़कों पर वाहन फर्राटे भरते निकलते हैं . फिर इन सड़कों पर यातायात संकेतक भी पर्याप्त संख्या में नहीं हैं . इससे वाहन चलाने वालों को खास तौर पर रात में अंधा-मोड़ या क्रासिंग का अंदाज नहीं हो पाता और हादसे हो जाते हैं . बहरहाल पूरे भारत में देखें तो सड़क -हादसों के प्रति-दिन के और सालाना आंकड़े निश्चित रूप से बहुत डराने वाले और चौंकाने वाले हो सकते हैं .इन दुर्घटनाओं को रोकने और सड़क-यातायात को सुगम और सुरक्षित बनाने के लिए मेरे विचार से तीन उपाय हो सकते हैं . इनमे से मेरा पहला सुझाव है कि देश में कम से कम पांच साल के लिए हल्के मोटर वाहनों का निर्माण बंद कर दिया जाए.यह सुझाव आज के माहौल के हिसाब से लोगों को हास्यास्पद लग सकता है ,लेकिन मुझे लगता है कि इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है ,क्योकि अब हमारे देश की सड़कों पर ऐसे वाहनों की भीड़ इतनी ज्यादा हो गयी है कि नए वाहनों के लिए जगह नहीं है .मेरा दूसरा सुझाव है कि मोटर-चालित वाहन खास तौर पर चौपाये वाहन खरीदने की अनुमति सिर्फ उन्हें दी जाए ,जो अदालत में यह शपथ-पत्र दें कि उनके घर में वाहन रखने के लिए गैरेज की सुविधा है और वे अपनी गाड़ी घर के सामने की सार्वजनिक गली अथवा सड़क पर खड़ी नहीं करेंगे . तीसरा सुझाव यह है कि बड़े लोग भी आम-जनता की तरह यातायात के सार्वजनिक साधनों का इस्तेमाल करने की आदत बनाएँ ,या फिर सायकलों का इस्तेमाल करें .सायकल एक पर्यावरण हितैषी वाहन है. इसके इस्तेमाल से हम धुंआ प्रदूषण को भी काफी हद तक कम कर सकते हैं . हर इंसान की जिंदगी अनमोल है .सड़क-हादसों से उसे बचाना भी इंसान होने के नाते हम सबका कर्तव्य है. अपने इस कर्तव्य को हम कैसे निभाएं ,इस पर गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है .
स्वराज्य करुण
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा की तीन दिवसीय भारत यात्रा के दूसरे दिन की सुबह एक निजी हिन्दी टेलीविजन समाचार चैनल ने अपने खास और लाइव कार्यक्रम में कुछ ऐसे शीर्षक भी दिए जो हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान को आहत कर गए .मुझसे रहा नहीं गया और कुछ मिनटों तक देखने के बाद मैंने टेलीवजन ऑफ कर दिया ,लेकिन यह तय है कि चैनल का कार्यक्रम तो ऐसे शीर्षकों के साथ आगे कई घंटों तक चलता और बजता रहा होगा और देश के मान-सम्मान को बार-बार चोट पहुंचाता रहा होगा . ओबामा की भारत यात्रा के महिमा -मंडन के लिए इस चैनल के द्वारा प्रसारित विशेष कार्यक्रम की कुछ सुर्खियाँ ,जो शायद किसी भी देशभक्त भारतीय को विचलित कर सकती हैं , इस प्रकार थीं -- भारत में दुनिया का दबंग दबंग की दीवाली
ओबामा के साथ राजस्थान के अजमेर जिले की ग्राम पंचायत कानपुरा के लोगों की वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग पर इस टेलीविजन चैनल की एक हेड-लाईन थी--'दबंग देखेगा गाँव'. महसूस करें तो वास्तव में 'दबंग' एक भय पैदा करने वाला शब्द है . .मानवता इस शब्द से भयभीत हो जाती है . वह दब कर रहती है , जिसे 'दलित' कहा जाता है . क्या अमेरिकी राष्ट्रपति को 'दबंग ' संज्ञा दे कर इस चैनल ने भारत को और हम भारतीयों को अप्रत्यक्ष रूप से 'दलित' साबित करने का प्रयास नहीं किया ? हिन्दी अखबारों में कई बार देश के कुछ राज्यों से ख़बरें छपती हैं- दबंगों ने दलितों को ज़िंदा जलाया . दबंगों ने दलितों को सरे-आम प्रताडित किया .ऐसे में क्या 'दबंग' शब्द का अर्थ किसी को अपने बाहुबल , धन-बल और आज के जमाने में शस्त्र -बल से दबाकर रखने वाले गुंडे-मवाली किस्म के लोगों से नहीं जुडता ? अमेरिकी राष्ट्रपति को 'दबंग' की संज्ञा देकर इस चैनल ने हमारे खास विदेशी मेहमान को जाने-अनजाने आखिर किस उपाधि से नवाजा है ,यह बताने की ज़रूरत नहीं है ,वहीं 'दबंग' के विपरीत शब्द 'दलित'को उसने अघोषित रूप से भारत की आम जनता पर थोप दिया है . इसमें दो राय नहीं कि लोकतंत्र के इस युग में , आज की आधुनिक दुनिया में अपने कई तरह के कारनामों के कारण अमेरिका की छवि 'दबंग ' जैसी ही बन गयी है , लेकिन चैनल की सुर्ख़ियों ने इस बदनाम शब्द को वहाँ के राष्ट्रपति के नाम से जोड़ कर जनता को क्या संदेश दिया , यह तो चैनल के कर्ता-धर्ता ही बता पाएंगे ,पर इतनी फुरसत किसे है कि जाकर उनसे यह पूछे .दबंग भले ही मुट्ठी भर होते हैं , लेकिन अपने साम-दाम ,दंड-भेद की नीतियों से समूची इंसानी आबादी को दबा कर रखते हैं. इंसानियत दबंगों की गुलाम बन जाती है .
इन दिनों एक फ़िल्मी कलाकार के 'दबंग ' शीर्षक हिन्दी फिल्म के किसी अपराधी चरित्र को प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया में इसी शीर्षक से काफी महिमा -मंडित किया जा रहा है . मानो ,यह किसी महान प्रेरणा दायक चरित्र का नाम हो . ध्यान देने लायक बात यह भी है कि 'दबंग' फिल्म में 'दबंग ' का किरदार निभाने वाले पर अपने वास्तविक जीवन में काले हिरणों के शिकार और फुटपाथ पर सोए गरीबों को मदहोशी में अपनी कार से कुचल कर मार डालने का संगीन आरोप लगा हुआ है .इन्ही आरोपों में वह जेल भी जा चुका है .यह आज के जमाने के विज्ञापन आधारित प्रचार-तंत्र का ही करिश्मा है कि इसके बावजूद लोग . खास तौर पर चालू-छाप मनोरंजन के दीवाने निठल्ले युवाओं को इस 'दबंग' पर फ़िदा होते देखा जा सकता है ,भले ही उन्हें इसके लिए उसके निजी सुरक्षा-गार्डों के हाथों मार खानी पड़े ,या फिर पुलिस की भी लाठियां खानी पड़ जाए. मानो 'दबंग' नामक इस फ़िल्मी किरदार ने देश के लिए कोई बहुत बड़ा काम किया हो, जिससे लाखों-करोड़ों लोगों का भला हुआ हो . ऐसा कुछ भी नहीं है .फिर भी उसके लाखों निठल्ले किस्म के दीवाने हैं .प्रचार-तन्त्र और उसके निजी विज्ञापन-तंत्र ने उसे हमारे समाज के एक 'रोल-मॉडल ' के रूप में स्थापित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है.
क्या यह आज की पढ़ी-लिखी ,साक्षर और शिक्षित कहलाने वाली आधुनिक दुनिया में नैतिक-मूल्यों के पतन और नैतिकता के प्रतिमानों में तेजी से आ रहे बदलाव का संकेत नहीं है ?आज़ादी के छह दशक बाद भी हम अपने लिए और अपनी नयी पीढ़ी के लिए महात्मा गांधी , स्वामी विवेकानंद और शहीद भगत सिंह जैसी महान विभूतियों को 'रोल मॉडल' नहीं बना पाए . न सिर्फ दबंग किस्म के लोग, बल्कि अघोषित चोरी ,अघोषित डकैती और अघोषित बेईमानी के धन से पूरी दबंगता के साथ अपना आर्थिक साम्राज्य फैला रहे लोग भी समाज का 'रोल-मॉडल ' बन रहे हैं . क्या यह हमारे दिल के किसी कोने में 'दबंगों' के भय से कांपती चुपचाप दुबक कर बैठी मानवता के अस्तित्व के लिए खतरे का संकेत नहीं है ?
स्वराज्य करुण