बुधवार, 25 नवंबर 2009

कैसे भूलूँ

"कैसे भूलूं "

तुमको याद करुँ मैं इतना,
ख़ुद को ही भूल जाऊँ।
मैं तो भूली ही कब तुमको,
और किया कब याद।


इस हृदय की सारी बातें,
एक तुम्हीं ने जाना।
अब क्या धरा हुआ इस जग में,
कैसे तुम्हें बताऊँ


मेरी सारी खुशियाँ तुम थे,
मैं तो बस इतना जानूँ
रोम- रोम में तुम हो, तुम हो,
मैं क्यों कर भूल पाऊं।


तुम तो सदा कहा करते थे,
तुम तो बस मेरी हो।
पर तुम कभी यह सोचे कि,
तुम भी तो बस मेरे हो।


बिना तुम्हारे इस दुनिया में,
मैं कैसे रह पाऊं।
इतना तो बस सोचे होते,
मैं फिर धन्य हो जाती।

-कुसुम ठाकुर-




4 टिप्पणियाँ:

पी.सी.गोदियाल 25 नवंबर 2009 को 9:55 am  

कविता में सुन्दर भाव !

Nirmla Kapila 25 नवंबर 2009 को 10:05 am  

बिना तुम्हारे इस दुनिया में,
मैं कैसे रह पाऊं।
इतना तो बस सोचे होते,
मैं फिर धन्य हो जाती।
बहुत सुन्दर कुसुम जी बस औरत को ही सोचने का अभिशाप मिला हुया है। शुभकामनायें

sada 25 नवंबर 2009 को 10:29 am  

तुम तो सदा कहा करते थे,
तुम तो बस मेरी हो।
पर तुम कभी न यह सोचे कि,
तुम भी तो बस मेरे हो।

बहुत ही गहराई लिये सुन्‍दर भाव ।

ललित शर्मा 25 नवंबर 2009 को 11:40 am  

बहुत सुदंर अभिव्यक्ति भावों की-आभार