बुधवार, 30 दिसंबर 2009

आज पान दुकान में आई है साली

हमारा यह पान दुकान निठल्ले लोगों का नहीं बल्कि साहित्य तथा काव्य प्रेमियों का है। यहाँ चर्चा भी उन्हीं लोगों की रुचि के अनुसार होनी चाहिये। आज ललित शर्मा जी का आदेश हुआ पान दुकान में पोस्ट के लिये। बस याद आ गई हमें साली। अरे भाई श्री गोपाल प्रसाद 'व्यास' जी की साली पर लिखी हास्य कविता "साली क्या है रसगुल्ला है"। तो लीजिये आप भी रसगुल्ले का स्वाद!

साली क्या है रसगुल्ला है

गोपाल प्रसाद व्यास

तुम श्लील कहो, अश्लील कहो
चाहो तो खुलकर गाली दो !
तुम भले मुझे कवि मत मानो
मत वाह-वाह की ताली दो !
पर मैं तो अपने मालिक से
हर बार यही वर मांगूंगा-
तुम गोरी दो या काली दो
भगवान मुझे एक साली दो !

सीधी दो, नखरों वाली दो
साधारण या कि निराली दो,
चाहे बबूल की टहनी दो
चाहे चंपे की डाली दो।
पर मुझे जन्म देने वाले
यह मांग नहीं ठुकरा देना-
असली दो, चाहे जाली दो
भगवान मुझे एक साली दो।

वह यौवन भी क्या यौवन है
जिसमें मुख पर लाली न हुई,
अलकें घूंघरवाली न हुईं
आंखें रस की प्याली न हुईं।
वह जीवन भी क्या जीवन है
जिसमें मनुष्य जीजा न बना,
वह जीजा भी क्या जीजा है
जिसके छोटी साली न हुई।

तुम खा लो भले पलेटों में
लेकिन थाली की और बात,
तुम रहो फेंकते भरे दांव
लेकिन खाली की और बात।
तुम मटके पर मटके पी लो
लेकिन प्याली का और मजा,
पत्नी को हरदम रखो साथ,
लेकिन साली की और बात।

पत्नी केवल अर्द्धांगिन है
साली सर्वांगिन होती है,
पत्नी तो रोती ही रहती
साली बिखेरती मोती है।
साला भी गहरे में जाकर
अक्सर पतवार फेंक देता
साली जीजा जी की नैया
खेती है, नहीं डुबोती है।

विरहिन पत्नी को साली ही
पी का संदेश सुनाती है,
भोंदू पत्नी को साली ही
करना शिकार सिखलाती है।
दम्पति में अगर तनाव
रूस-अमरीका जैसा हो जाए,
तो साली ही नेहरू बनकर
भटकों को राह दिखाती है।

साली है पायल की छम-छम
साली है चम-चम तारा-सी,
साली है बुलबुल-सी चुलबुल
साली है चंचल पारा-सी ।
यदि इन उपमाओं से भी कुछ
पहचान नहीं हो पाए तो,
हर रोग दूर करने वाली
साली है अमृतधारा-सी।

मुल्ला को जैसे दुःख देती
बुर्के की चौड़ी जाली है,
पीने वालों को ज्यों अखरी
टेबिल की बोतल खाली है।
चाऊ को जैसे च्यांग नहीं
सपने में कभी सुहाता है,
ऐसे में खूंसट लोगों को
यह कविता साली वाली है।

साली तो रस की प्याली है
साली क्या है रसगुल्ला है,
साली तो मधुर मलाई-सी
अथवा रबड़ी का कुल्ला है।
पत्नी तो सख्त छुहारा है
हरदम सिकुड़ी ही रहती है
साली है फांक संतरे की
जो कुछ है खुल्लमखुल्ला है।

साली चटनी पोदीने की
बातों की चाट जगाती है,
साली है दिल्ली का लड्डू
देखो तो भूख बढ़ाती है।
साली है मथुरा की खुरचन
रस में लिपटी ही आती है,
साली है आलू का पापड़
छूते ही शोर मचाती है।

कुछ पता तुम्हें है, हिटलर को
किसलिए अग्नि ने छार किया ?
या क्यों ब्रिटेन के लोगों ने
अपना प्रिय किंग उतार दिया ?
ये दोनों थे साली-विहीन
इसलिए लड़ाई हार गए,
वह मुल्क-ए-अदम सिधार गए
यह सात समुंदर पार गए।

किसलिए विनोबा गांव-गांव
यूं मारे-मारे फिरते थे ?
दो-दो बज जाते थे लेकिन
नेहरू के पलक न गिरते थे।
ये दोनों थे साली-विहीन
वह बाबा बाल बढ़ा निकला,
चाचा भी कलम घिसा करता
अपने घर में बैठा इकला।

मुझको ही देखो साली बिन
जीवन ठाली-सा लगता है,
सालों का जीजा जी कहना
मुझको गाली सा लगता है।
यदि प्रभु के परम पराक्रम से
कोई साली पा जाता मैं,
तो भला हास्य-रस में लिखकर
पत्नी को गीत बनाता मैं?

17 टिप्पणियाँ:

ललित शर्मा 30 दिसंबर 2009 को 12:34 pm  

अवधिया जी-बहुत बढिया साली वंदना पढवाने के लिए आभार,
आपके है कि नही? या आप भी कवि के मसले से ईत्फ़ाक रखते है।:)

अज्जु कसाई 30 दिसंबर 2009 को 12:43 pm  

nice post

RAJ SINH 30 दिसंबर 2009 को 2:20 pm  

वाह वाह अवधिया जी,
आपने तो मुझे जवानी के दिनों में पहुंचा दिया .तब कुंवारा भी था . व्यास जी से प्रेरित हो मैंने भी लिखा था कुछ उस वक्त .उसी की बस दो लाईना.

उस लडकी से बेकार है करना विवाह यार
जीजा न कहें कम से कम गर सात सालियाँ

ये बात और है की ............
मगर ये हो न सका ......!!

अजय कुमार झा 30 दिसंबर 2009 को 3:23 pm  

उफ़्फ़ आज जाना साली महात्म्य पढने के बाद कि क्या खो दिया
आज तो मजा आ गया ,

अजय कुमार 30 दिसंबर 2009 को 4:05 pm  

दिसंबर में मई-जून का एहसास हो गया

राज भाटिय़ा 30 दिसंबर 2009 को 4:56 pm  

जी.के. अवधिया जी आज तो आप का बनाया पान सच मै बहुत मिट्ठा लगा, हो भी ना क्यो अजी उस मै साली का प्यार जो मिला था, लेकिन ध्यान रखे आज कल लोगो कोर्ट की डिगरी ले कर चढ जाते है.
धन्यवाद इस प्यारी सी साली के लिये

निर्मला कपिला 30 दिसंबर 2009 को 5:04 pm  

बहुत बडिया साली पुराण है धन्यवाद्

डॉ टी एस दराल 30 दिसंबर 2009 को 5:28 pm  

बढ़िया ।
लेकिन अगर नहीं है, तो अब कहाँ से आएगी ?

मनोज कुमार 30 दिसंबर 2009 को 7:02 pm  

बहुत-बहुत धन्यवाद
आपको नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" 30 दिसंबर 2009 को 7:21 pm  

लजवाब साली पुराण्!!
:)

Udan Tashtari 30 दिसंबर 2009 को 8:19 pm  

व्यास जी का जबाब नहीं..यह पुराण तो सबको पढ़ना चाहिये.


--


मुझसे किसी ने पूछा
तुम सबको टिप्पणियाँ देते रहते हो,
तुम्हें क्या मिलता है..
मैंने हंस कर कहा:
देना लेना तो व्यापार है..
जो देकर कुछ न मांगे
वो ही तो प्यार हैं.


नव वर्ष की बहुत बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएँ.

ताऊ रामपुरिया 30 दिसंबर 2009 को 8:57 pm  

बहुत गजब का साली पुराण पढवाया, बहुत आभार.

नये साल की रामराम.

रामराम.

cmpershad 30 दिसंबर 2009 को 9:26 pm  

क्या रस के गुल खिलाए हैं :)

बी एस पाबला 30 दिसंबर 2009 को 11:58 pm  

साली पुराण!?
रस आ गया, टपकने भी लगा :-)

बी एस पाबला

खुशदीप सहगल 31 दिसंबर 2009 को 9:15 am  

साली महापुराण रचने के लिए हिंदी साहित्य और ब्लॉग जगत युगों युगों तक व्यास जी का ऋणी रहेगा...अवधिया जी आपको साधुवाद ये रचना पढ़ाने के लिए...

नया साल आप और आपके परिवार के लिए असीम खुशियां लाए...

जय हिंद...

Munda Sanichari 2 जनवरी 2010 को 1:12 pm  

साली का तो नहीं पर मथुरा की खुरचन का स्वाद बहुत बार चखा है .......सुन्दर रचना
wordpress से blogspot पर आया हूँ एक रचना के साथ...पढ़े और टिपण्णी दे !!

राजीव तनेजा 4 जनवरी 2010 को 8:26 am  

बहुत ही बढिया...मज़ेदार कविता पढवाने के लिए आभार