रविवार, 6 दिसंबर 2009

ट्रेन में कवि सम्मलेन

ललित शर्मा

हमारा भ्रमण होता रहता है तो किसम-किसम लोग मिलते ही रहते हैं. कभी बस में, कभी रेल गाड़ी, में कभी उड़न खटोले पर, जैसे जो सुविधा मिल जाये, हम पहुँच जाते हैं तय समय पर निर्धारित कार्यक्रम में. ऐसे सफ़र में साहित्कार, कवि लेखक भी मिल जाते हैं. जो साहित्य सेवा में लगे हैं. और उनका कार्य अनुकरणीय भी होता है. एक बार के सफ़र की कथा हम सुनाते हैं. जो हमने देखा उसका सीधा टेलीकास्ट पान की दुकान से कर रहे हैं.
एक बार हम बिलासपुर से आ रहे थे रेल में. बड़ी भीड़ थी और हमारे पत्नी बच्चे भी थे साथ में. ट्रेन आते ही हमने पहले तो चढ़ने की व्यवस्था की, सामान रखा, उसके बाद बाल बच्चों को बैठने के लिए जगह की तलाश करने लगे, कुछ देर बाद जैसे-तैसे सबको एड जेस्ट किया, तभी चार छ: सीट के बाद हमें कुछ हल्ला सुना, लोग वाह-वाह कर रहे थे और ताली भी बजा रहे थे, मैंने सोचा कि क्या हो रहा है? ये देखने के लिए वहां पर चला गया, जाकर देखा कि एक खादी धारी श्रीमान हाथ में एक मोटी सी डायरी लेकर उसमे लिखी कविता पढ़ रहे थे. हमने भी उनकी कविता सुनी और वाह-वाह कहा. तो वहां बैठे लोगों हमारे को खड़े देखकर थोड़ी सी जगह हमारे बैठने के लिए भी बनाई. और बैठने का निमंत्रण दिया. हम बैठ गए. कवि महोदय अपनी कविता धारा प्रवाह सुना रहे थे और लोग वाह-वाह करके ताली बजा रहे थे. उसमे हम भी शामिल हो गए और आनंद लेने लगे. अगला स्टेशन आया तो दो सवारी उतर गई उनकी जगह नई सवारी आ गई, कवि महोदय का कविता पाठ शुरू ही रहा, नयी सवारी भी वाह-वाह करने लग गई. तो मैं कवि महोदय से पूछा " क्या बाबा ट्रेन में भी कविता पाठ चल रहा है? तो वो बोले " क्या करोगे भाई बड़ा ख़राब जमाना आ गया है. अब वो जमाना नहीं रहा जो हमको कोई कवि सम्मलेन में आमंत्रित करके हमारी तरह-तरह की कविता सुनेगा! जब किसी कवि सम्मलेन में चले भी जाते हैं तो लड़के लोग हुटिंग करते हैं, चिल्लाने लगते हैं "डोकरा को बैठाओ-डोकरा को बैठाओ" बड़ी समस्या हो गई है. अब हम तो पैदायशी कवि हैं. कविता लिखते हैं तो घर से बाहर निकल कर देखना पड़ता है कि कोई अपना आदमी आये तो उसको सुनाये, कोई सुनने को ही तैयार नहीं होता. जब तक  लिखी हुयी कविता को हम किसी को सुना नहीं लें तो पेट में गुडगुडी होती रहते है, अफारा आ जाता है, खाने की इच्छा चली जाती है. बहुत परेशान जो जाती है. कई डाक्टरों को दिखाया बोल कोई बीमारी नहीं है. तब एक दिन हम ट्रेन में रायगढ़ जा रहे थे. साथ में कविता की डायरी भी थी, जैसे ही हमने डायरी बाहर निकली वैसे ही अगल बगल की सवारी बोली" कविता है क्या बाबा? जरा सुनाओ ना. तो भैया हमने उनको कविता सुनाई, उस दिन हमारी तबियत ठीक रही. अब  हमको इलाज मिल गया था. उस दिन से हम सप्ताह भर कविता लिखते हैं और एक दिन पंद्रह रूपये का लोकल ट्रेन का टिकिट ले कर ट्रेन में सवार हो जाते हैं. सप्ताह भर की लिखी हुयी कविता यहीं ट्रेन में सवारियों को सुना देते हैं, तो मुझे यहाँ श्रोता भी मिल जाते हैं और मेरी तबियत भी ठीक रहती है. अगर किसी को कविता पसंद नहीं आती वो अपनी सीट बदल लेता है.या अगले स्टेशन पर उतर जाता है. तो भाई मुझे तो यही मंच अच्छा लगता है. मैं सुनकर खुश हो गया कि चलो बिना दवाई के कवि महोदय की तबियत ठीक हो गई और इन्होने कविता पाठ के लिए इतना बड़ा मंच भी तलाश कर लिया. मैंने कहा "बाबा आपने तो बहुत बढ़िया काम किया है. आप धन्य हैं इतनी विपरीत परिस्थितियों में भी साहित्य की सेवा कर रहे है. आपको बारम्बार प्रणाम है. इसके बाद हमने उनकी एक कविता सुनी तब तक रायपुर आ चूका था और हमारी यात्रा यहीं तक थी. 

ललित शर्मा

9 टिप्पणियाँ:

Ratan Singh Shekhawat 6 दिसंबर 2009 को 8:02 am  

ये कवि सम्मलेन भी खूब रहा |

राजीव तनेजा 6 दिसंबर 2009 को 8:02 am  

दो साल तक मैँ दिल्ली से पानीपत के लिए डेली पसैंजर था...ट्रेन में जब तक अपनी कहानियाँ दूसरों से पढवा ना लूँ...चैन ही नहीं पड़ता था...

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi 6 दिसंबर 2009 को 9:55 am  

कविता के लिए ट्रेन भला माध्यम है।

अजय कुमार झा 6 दिसंबर 2009 को 10:36 am  

इन्हीं खतरों को देख कर ही ट्रेन यात्रियों के बीमे की योजना बनाई गई थी .....
वर्ना बेचारों को दुर्घटना के बाद कहां कुछ मिलता है .....कम से कम कवि सम्मेलन के बाद तो मिल ही जाए...
हम उसी ट्रेन से ....आ रहे हैं ....

जी.के. अवधिया 6 दिसंबर 2009 को 4:13 pm  

ललित जी, कविता सुनने के एवज में चाय वाय पिलवाई कि नहीं कवि महोदय ने आपको?

Udan Tashtari 6 दिसंबर 2009 को 5:53 pm  

चलो, बुढोति के लिए हमें भी एक रास्ता सूझा. :)

विनोद कुमार पांडेय 6 दिसंबर 2009 को 10:21 pm  

कवियों के भी जूनून होते है अपनी कविता को लेकर बढ़िया ही है ना कहीं तो भीड़ इकठ्ठा किया...अच्छा विचार है अपनी रचनाएँ ठेलने का बहुत सही जगह है....बढ़िया संस्मरण..धन्यवाद

रश्मि प्रभा... 7 दिसंबर 2009 को 2:44 pm  

वाह......मज़ा आ गया......ऐसा मौका हमें भी मिले

suryakant gupta 15 दिसंबर 2009 को 12:51 am  

सबले पहिली यात्रा संस्मरण के रूप माँ कवी मन के चाहे एला व्यथा कहो या व्यंग्य के रूप माँ लव बड़ सुग्घर लिखे हौ. एखर बर बधाई. भाई ललित जी अब्बड सुनना लगत हे कहाँ चल दे हौ आप. अब आप सोचत होहौ के आज बनिया कहाँ चल दिस. तौ आज बहुत अच्छा दिन रहिसे. मोर नोनी के कॉलेज माँ वार्षिकोत्सव रहिसे.उहें हमन चल दे रहें. ४ ठन इनाम मिलिस ओला. नाचे कूदे अउ गीत गाये बर. एक ठन ला छोड़ के सब माँ फर्स्ट आये हे.