शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

सैंटा ज़रूर आएगा!!

***राजीव तनेजा***



क्रिसमस की छुट्टियाँ क्या आरम्भ हुई कि बच्चों का चहकना भी साथ ही साथ शुरू हो गया कि..."सैंटा क्लाज़ आएगा...सैंटा क्लाज़ आएगा...नए-नए तोहफे लाएगा"...उन बेचारों को क्या मालुम कि गिफ्ट तो हर साल उनके तकिए के नीचे उनका मामा याने के मेरा साला रख जाता है...जो इस बार भारत में नहीं बल्कि अमेरिका में है।बच्चे बेचारे तो हमेशा से यही समझते थे कि ये सब सैंटा करता है...सो!..उसी का गुणगान करते नहीं थक रहे थे और मैँ इसी उधेड़बुन में फंसा था कि कैसे समझाऊँ इन्हें कि इस बार कोई सैंटा  नहीं आने वाला है।समझ नहीं आ रहा था कि वजह पूछेंगे तो क्या जवाब दूंगा?..कैसे कहूँगा कि उनका मामा जो इस बार इंडिया में नहीं.. बल्कि 'अमेरिका' में है?..इसलिए 'गिफ़्ट्स' का तो सवाल ही नहीं पैदा होता।
मेरे हिसाब से तो उन्हें सच्चाई से रुबरू करवा ही देना ही बेहतर रहता,इसलिये मैने भी दो टूक जवाब दे दिया कि "कोई 'सैंटा-वैंटा' नहीं आने वाला है इस बार लेकिन बच्चे तो बच्चे ...विश्वास ही नहीं हो रहा था उन्हें मेरी इस बात का।उन्हें अपने विश्वास पे कायम देख मैँ भी पूरी तरह से ज़िद पे अड बैठा कि....मैँ तो दुअन्नी भी नहीं खर्च करूँगा अपने पल्ले से..रोते हैँ तो बेशक रोएँ जी भर के।अगर वो ज़िद पर अड़ सकते हैँ तो मैँ क्यों नहीं?आखिर!...बाप हूँ उनका..कोई ऐंवे ही का कोई आलतू-फालतू नहीं।अब!...कह दिया तो..बस...कह दिया...अब अपने कहे से पीछे हटने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता।
अपने टाईम पे हमने कौन सा ऐश कर ली जो इन निगोड़ों को मैँ करवाता फिरूँ? लेकिन दिल के किसी कोने में एक सवाल सा उठ रहा था बार-बार कि..क्या मेरी औलादें भी हर उस चीज़ के लिए तरसती रहेगी जिस-जिस चीज़ के लिए मै तरसा? ...क्या इन मासूमों ने पैदा होकर कोई गुनाह किया है? क्या इनकी कोई हसरतें...कोई अरमान नहीं हो सकते?...क्या इनको भी मेरी तरह ही घुट-घुट कर जीना पडेगा?..क्या इनकी सारी इच्छाएँ..मात्र इच्छाएँ बन कर रह जाएँगी?...क्या कभी पूरे नहीं होंगे इनके सपने?
ध्यान पुरानी यादों की तरफ जाता जा रहा था...हमारे बाप-दादा ने कभी हमें ऐश नहीं करवाई।वो खुद तो पूरी ज़िन्दगी नोट कमा-कमा के थक गये लेकिन जैसे दुअन्नी भी खर्चा करना हराम था उनके लिये।वो भला कैसे लुटाते फिरते अपनी दौलत किसी दूसरे पे?...शुरू से निन्यानवे के फेर में जो पड चुके थे...सो!...लगे रहे पूरी ज़िन्दगी उसी चक्कर में...कभी बाहर ही नहीं निकल पाए।...लेकिन मैँ पूछता हूँ कि क्या फायदा ऐसी दौलत का कि अपने...अपने ही ना रहें?...बाड़ ही खेत को खाने लगे?...जिन पर भरोसा किया...उन्होने ही बेडा गर्क करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जिसके हाथ जो लगा,उसने उसी को सम्भाल लिया।किसी ने गोदाम....तो किसी ने खेत...किसी ने प्लाट पे कब्ज़ा जमा ठेंगा दिखा दिया...कोई  नकदी पे नज़र गड़ाए बैठा था...तो कोई दूर का...अनजाना सा रिश्तेदार सेवा करने के नाम पे चिपका बैठा था...कोई दादा जी को उनके नाम का मन्दिर बनवा...स्वर्ग जाने का रास्ता सुझा रहा था। सुझाता भी क्यों ना?...आखिर!...मन्दिर का ट्रस्टी जो उसे ही बनना था।असल में...सबको अपनी-अपनी ही पड़ी थी...तगडा माल जो हाथ लगने की उम्मीद थी लेकिन ऊपरवाले के घर देर है पर अन्धेर नहीं..."जाको राखे साईयाँ...मार सके ना कोए"
ऐन मौके पर सब कुछ हाथ से निकलता देख हमारे पिताजी और चाचा जी में सुलह हो गयी।उनकी आपसी फूट का ही तो ये सब नतीज़ा था कि....घरवाले चुपचाप खडे तमाशा देखते रह गये और कुत्ते मलाई चाटते चले गये।इतना सब कुछ होने के बाद भी हालात कुछ खास बुरे नहीं थे हमारे...ऊपरवाले की दया से काफी कुछ अब भी बचा रह गया था लेकिन शायद....इतना सबक काफी नहीं था हमारे बुज़ुर्गों के लिये।...अब भी पैसे के पीर बने बैठे हैँ...छाती से लगाए बैठे हैँ दौलत को... ये भी भूले बैठे हैँ कि एक ना एक दिन तो सभी को ऊपर जाना है...फिर ये सब भला किस काम आएगा? कौन लूटेगा मज़े इसके? क्या फायदा ऐसी दौलत का जो किसी काम ना आए? खर्च ना कर सको जिस दौलत को...ऐसी दौलत बेमतलब की है...फिज़ूल की है।अभी जोड़ते रह जाओ ...बाद में पराए लूट ले जाएँ सब। ये क्या बात हुई कि बस..घडी-घडी टुकुर-टुकुर ताकते फिरो अपनी तिजोरी को?...बाद में पता चले कि बाहर तो ताला लटका रह गया और अन्दर ही अन्दर माल-पानी कोई और ले उडा। अरे!...समझो कुछ....पता है ना कि पैसा बना ही खर्च करने के लिए है? तो फिर खर्च क्यों नहीं करते हो यार?...किस शुभ घडी का इंतज़ार है आपको?
मेरा पूरा बचपन खिलौनों के लिए तरसता रहा लेकिन....नहीं मिले। जवान हुआ तो मोटर बाईक के लिये तरसता रहा लेकिन नहीं मिलनी थी,...सो!..नहीं मिली। उल्टा...जवाब मिला कि...पूरी दुनिया बसों में धक्के खाती फिरती है....
तुम भी खाओ। पढाई में भी तो इसी चक्कर में पिछड गया था मैँ....जब नई किताबों और ट्यूटर लगवाने की बात की तो जवाब मिला... सैकेंड हैंड मिलती हैँ बाज़ार में...वही ले आओ और  ये ट्यूटर-ट्यूटर की क्या टर्र-टर्र लगा रखी है?...अपने आप पढो...हमने भी अपने आप पढाई की है लैम्प पोस्ट के नीचे बैठे-बैठे। शुक्र मनाओ ऊपरवाले का कि तुम्हारे सर पे छत तो है।गनीमत समझो कि इतना भी नसीब हो रहा है तुम्हें...हमारे बाप ने तो हमें इतना भी नहीं दिया जितना तुम खा-पहन और ओढ रहे हो। खुद कमाने लगोगे तो आटे-दाल का भाव पता चलेगा। जैसे अपने बाप-दादा के राज में हम ऐश नहीं कर पाए....वैसे ही तुम भी नहीं कर पाओगे....हमारे जीते जी। समझे कुछ?...या दूँ कान के नीचे एक बजा के?
आखिर!...क्या नाजायज़ मांग लिया था मैने?...क्या मुझे खिलौनों से खेलने का शौक नहीं रखना चाहिये था? या फिर....सब दोस्तों को बाईक चलाते देख उसके बारे में सोचना भी नहीं चाहिये था?...'बाईक' ना होने की वजह से ही तो मेरी 'गर्ल फ्रैंड'...हाँ!..मेरी गर्ल फ्रैंड मेरी नहीं रही थी...छोड़ कर चली गयी मुझे किसी दूसरे की खातिर...उसके पास नई 'यामाहा RX 100' जो थी और मेरे पास पुराना 'प्रिया' स्कूटर...स्कूटर या बस में बैठना पसन्द जो नहीं था उसे और.... और मैँ 'बाईक' कहाँ से लाता?...चोरी करता या कहीं डाका डालता?
पता ही नहीं चला कब आँखो से झर-झर आँसुओं की धारा बह निकली...ये भला क्या बात हुई कि बेशक तिजोरी भरी की भरी पड़ी सड़ती फिरे लेकिन रहना फटेहाल ही है।बड़े-बूढे सोचते हैँ कि वो आने वाली नस्ल के लिए जोड रहे हैँ...
तो एक बात बताओ यार कि आने वाली नस्ल क्या आसमान से टपकेगी?.. जो सीधे तौर पर उनके वारिस हैँ....उनसे डाईरैक्टली जुड़े हैँ...वो तो तरसते फिरें ..और ये महाशय चले हैँ जोड़ने...आने वाली नस्लों के लिए"
"हुँह!...उनका ख्याल है इन्हें ...जिन्हें ना इनका नाम मालुम होगा और ना ही रिश्ता और ना ही होगी छोटे-बड़े की कोई कदर। अरे!...ये पुरानी कहावत भी तो इन्ही की ज़बानी सुनी थी कभी हमने कि...
"पूत कपूत तो क्यों धन संचय?...पूत सपूत तो क्यों धन संचय?"
मतलब कि..अगर औलाद नालायक निकली तो फिर जोड़ कर क्या फायदा?...वो तो सब उजाड़ ही देगी और अगर औलाद लायक निकली तो फिर जोड-जोड के फायदा ही क्या है?...वो तो खुद ही उस से कहीं ज़्यादा अपने आप खा-कमा लेगी।
बस!..ये ख्याल दिल में आते ही मैने मन ही मन ठान लिया कि अब ऐसा नहीं होगा।...मैँ अपने बच्चों की हर जायज़ फरमाईश को पूरा करूंगा...अपने जीते जी उनको किसी चीज़ के लिये तरसने नहीं दूंगा...और मैँ बच्चों को बुला कह रहा था कि ... सैंटा ज़रूर आएगा...हाँ!..ज़रूर आएगा

***राजीव तनेजा***
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7 टिप्पणियाँ:

ललित शर्मा 25 दिसंबर 2009 को 10:18 am  

मैँ अपने बच्चों की हर जायज़ फरमाईश को पूरा करूंगा...अपने जीते जी उनको किसी चीज़ के लिये तरसने नहीं दूंगा...और मैँ बच्चों को बुला कह रहा था कि ... सैंटा ज़रूर आएगा...हाँ!..ज़रूर आएगा बहुत ही गंभी्र बात कही राजीव भाई आपने, यह होना भी चाहिए-लेकिन फ़िर भी ये बच्चे बड़े होकर यही कहेंगे हमारे बाप ने क्या किया? ये समय चक्र है, समय के साथ आवश्यक्ताएं बदल जाती हैं। बधाई हैप्पी क्रिसमस्।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi 25 दिसंबर 2009 को 10:33 am  

कृपणता पर अच्छी कथा है। बच्चों के लिए कृपण होना बहुत बुरी बात है। फिर आप बचाते किस लिए हैं?

महफूज़ अली 25 दिसंबर 2009 को 1:11 pm  

एक सन्देश..... के साथ.... बहुत अच्छी लगी यह पोस्ट....

ताऊ रामपुरिया 25 दिसंबर 2009 को 3:25 pm  

बहुत सुंदर विचार.

रामराम.

राज भाटिय़ा 25 दिसंबर 2009 को 8:54 pm  

राजीव जी , मै तो शुरु से यही करता आय हुं, ओर सब को यही कहता हुं, आज अपने दिल की बात आप के लेख पर पढ कर दिल खुश हो गया.... लेकिन बच्चो को बताना चाहिये कि यह सेंटा कोन है, ३ से ५ साल के बच्चो को वेसे ही पता चल जाता है

cmpershad 25 दिसंबर 2009 को 10:14 pm  

"ध्यान पुरानी यादों की तरफ जाता जा रहा था...हमारे बाप-दादा ने कभी हमें ऐश नहीं करवाई।"

हमारे बच्चे आज भी याद करते हैं कि किस तरह चार जोड कपडों में कालेज का जीवन पार किया :)

अर्कजेश 25 दिसंबर 2009 को 11:31 pm  

हॉं अब समय के साथ अभिभावकों को भी अपना नजरिया बदलना पड रहा है । पहले के अभिभावक ज्‍यादा हावी रहते थें ।