सोमवार, 7 दिसंबर 2009

नये शहर में एक पुराने दोस्त से मुलाकात...

मुलाकात तो रेस्तरां में होना तय थी, मगर हुयी पान की दुकान पर, अनिल पुसदकर का दुर्ग आना हम सब के लिये एक बढ़िया मौका था, छ्त्तीसगढ़ के ब्लागर्स को एकजुट कर ब्लाग्स की दुनिया में कुछ नयापन लाने का.
रेस्तराँ में एक काफी लंबे लंच के बाद हम सब मालवीय नगर चौक के पास नाले के किनारे पान की दुकान पर जम गये. माफ कीजिये, ये हम सब मे जो शामिल हैं उनका जिक्र ना हो सका, ये थे पाब्लाजी, शरद कोकास, ललित शर्मा, संजीव तिवारी, राजकुमार ग्वालानी, गुप्ताजी जैसे धुरंधर ब्लागर् और मै, हमारी घोर अभौतिक ब्लाग की दुनिया का सबसे नया पंछी. खैर रायपुर से आने वाली सड़क पर नजरें जमायें हम सब अनिल के पहुंचने का इंतजार करते रहे. पाब्लाजी के कैमरे से लगातार चमकती फ्लैश ने वक्त का एहसास ही नहीं होने दिया, उनसे हुयी मुलाकातों से मै ये जान पाया की किसी भी माहौल को लगातार खुशनुमा कैसे बनाये रखा जा सकता है.
अचानक एक लंबी सी बड़ी चार चकिया सामने आकर रुकी और काली जैकेट पहने अनिल बाहर निकला. सबने आते ही उसे गले लगा लिया और देखते ही देखते माहौल  में गर्मजोशी आ गयी. तभी किसी ने पान की दुकान से लगी चाय की दुकान की ओर आवाज उछाली आठ अच्छी चाय बनाना और सारे लोग एक साथ ब्लाग की दुनिया में प्रवेश कर गये. मेरे लिये ब्लाग की दुनिया बहुत नयी है, और हर बार इसके भीतर प्रवेश करना एक ऐसी जानी पहचानी गुफा में रोज जाने जैसा है जो हर रोज बदल जाती है, मै कमोबेश हर बार यही महसूस करता हुं. पाब्लाजी के कैमरे से एक बार फिर फ्लैश चमकनी क्या शुरू हुयी हर चेहरा कुछ कहने लगा. तभी चाय आ गयी, शाम ढलने के साथ हवा भी ठंडी हो चली थी, चाय की चुस्कियों के बीच ब्लाग जगत पर गंभीर चर्चा होती रही.
ग्वालानीजी और ललित भाई को रायपुर निकलना था, वो भी इतनी ठंड में मोटर सायकिल से, हमने उन्हें रोकना मुनासिब नहीं समझा. सबने ग़ले लगकर विदाई दी, गुप्ताजी ने भी इजाजत मांगी, बाकी बचे लोग शरद भाई के घर की ओर चल पड़े.

अनिल और मैं बरसों पुराने दोस्त हैं, रायपुर शहर ने हमें अपनी आबो हवा मे अलग अलग अंदाज मे बड़ा किया है. आज अनिल पुसदकर एक खांटी और दिलेर पत्रकार के तौर पर दूर-दूर तक जाना जाता है, रंगकर्म और सामजिक दायरों में लंबे समय से जुड़े रहने के कारण मेरा कई पत्रकारों से मिलना जुलना रहा, मगर अनिल जैसी बेबाकी कहीं नहीं मिली. अपने शहर से बाहर उससे मिलना कुछ अलग तो लगा, मगर वो तो वही अनिल पुसद्कर था, सालों पहले मेरे साथ साईंस कालेज की बांउड्री वाल पर बैठ एक हाथ मे तिवारीजी के हाथ के बनाये समोसे थामे ठहाके लगाता हुआ.
आज ब्लागिंग की दुनिया में अनिल पुसदकर काफी चर्चित नाम है, यहां भी वो उतना ही सफल है और दुनिया भर में लोग उसे एक महत्वपूर्ण ब्लागर के तौर पर जाने ऐसी हमारी शुभकामना है.

हां एक बात और अनिल के पास उसका अपना एक अदभुत, जादुई यथार्थ से भरा विराट अनुभव संसार है. मुझे उम्मीद है ब्लाग जगत इस सबसे ज्यादा दिनों तक अछूता नहीं रहेगा.

एक पुराने दोस्त से एक नये शहर में मिलना... मैने महसूस किया, सिर्फ दोस्त नहीं आया था साथ मे शहर भी था...मै भी शायद् थोड़ा नोस्टाल्जिक हो गया हुं...
बालकृष्ण अय्यर 

8 टिप्पणियाँ:

ललित शर्मा 7 दिसंबर 2009 को 8:21 pm  

अय्यर भैया, अनिल भाई जैसा यारों का यार भी इस जमाने मे मिलना बहुत मुस्किल है, मुझे एक बात उनकी सबसे ज्यादा पसंद आती है वो है, अक्खड़पन और सीधी बात, कल रात को उनका फ़ोन करके मेरे घर पहुँचने की जानकारी लेना दिल को छु गया। हमारे "ब्लागर परिवार" के सारे ही "परिजन" एक से एक "रतन" हैं, नि:संदेह, आभार

अजय कुमार झा 7 दिसंबर 2009 को 8:37 pm  

वाह आपके साथ हम भी नोस्टेलजिक हो गये आपकी पोस्ट पढ के ...बहुत खूब ..यारों की महफ़िल की रौनक ही और होती है ...और पाबला जी का कैमरा साथ हो तो फ़िर सोने पे सुहागा ..
बढिया रहा ...आप लोगों का मिलन

Udan Tashtari 7 दिसंबर 2009 को 8:56 pm  

अनिल जी से मुलाकात की तमन्ना है. फोन पर जरुर बात है...इन्जार में एक जल्द मुलाकात है.

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari 7 दिसंबर 2009 को 8:58 pm  

बडे भाई आपकी पाठकीय रूचि और लेखन की गंभरता से वाकिफ हूं हिन्‍दी ब्‍लाग जगत शुरूआती दिनों में आपको कुछ अटपटी और कम्‍यूनिटी वेबसाईट के स्‍क्रैपों सी लग सकती है यही हम सब ब्‍लागरों को आपस में जोडे रखती है. इससे परे आप यकीन मानिये यहां आपकी रूचि अनुसार सामाग्री और पाठक दोनों मिलेंगें.

अनिल पुसदकर जी तो हमारे ब्‍लागजगत के नगीने हैं, आपकी पुरानी मित्रता के संबंध में पढकर अच्‍छा लगा. आभार आपका आपने कलम उठाया. हैप्‍पी ब्‍लागिंग.

शरद कोकास 7 दिसंबर 2009 को 9:12 pm  

अय्यर आज तेरी यह पोस्ट पढ़कर मै भी नॉस्टेल्जिक हो रहा हूँ ..और मुझे भी बार बार बचपन का शहर भंडारा याद आ रहा है .. और यह भी संयोग है कि आज बरसों बाद मेरे एक स्कूल लाइफ के दोस्त मोबीन का फोन आया ..। मुझे शरद बिल्लोरे की यह कविता याद आ रही है........ शहर आया अंत तक साथ और लौटा नहीं । अपने घर में अनिल भाई और तुम्हारी बातें सुन रहा था फिर अनिल भाई ने और बचपन के दोस्तों से बात की मुझे यह सब बहुत अच्छा लगा .. यह सिलसिला यूँही चलता रहे ...

बी एस पाबला 7 दिसंबर 2009 को 11:13 pm  

अनिल जी और आपकी बातचीत में शामिल नहीं हो पाया, शरद जी के घर पर

शरद जी के पीसी से दोस्ती कर रहा था मैं, वरना शरद जी आने नहीं देते मुझे वहाँ से :-)

कितना सच कहा है आपने कि ब्लाग की दुनिया बहुत नयी है, और हर बार इसके भीतर प्रवेश करना एक ऐसी जानी पहचानी गुफा में रोज जाने जैसा है जो हर रोज बदल जाती है।

आपकी लेखन शैली ने प्रभावित किया। आप जैसा संवेदनशील रंगकर्मी नियमित लेखन करे तो हम जैसे नादान भी कुछ सीख पाएँ

आशा करता हूँ कि अपनी व्यस्तता के बीच लेखन जारी रखेंगे ब्लॉग पर

बी एस पाबला

Anil Pusadkar 8 दिसंबर 2009 को 10:50 am  

तबियत अभी तक़ ठीक नही हुई।कल भी आधी रात को खांसी के मस्त वाले दौरे से टूटी नींद का फ़ायदा उठा कर मैने ब्लाग की दुनिया की सैर की थी मगर खूब लम्बा शायद पोस्ट से भी बडा कमेण्ट टेक्निकल प्राबल्म के कारण पब्लिश नही हो पाया।खैर अभी उठ रहा हूं और सबसे पहले वही काम रिपीट कर रहा हूं।अय्यर दरअसल मेरी दुर्ग आने की हिम्मत ही नही थी।तबियत भी खराब थी इसलिये ललित को पहले ही मना कर दिया था मगर जब तुम्हारा फ़ोन आया तो खुद को रोक नही पाया और अच्छा हुआ वंहा आ गया,नही तो बहुत कुछ खो देता।तुमसे मिले भी काफ़ी समय हो गया था सो तुमसे मिलने का लालच संवार नही पाया।हो सकता है ये बात बाकी ब्लागर भाईयों को बुरी भी लगे मगर सच यही है कि मैं तुमसे मिलने का मौका खोना नही चाहता था।और वंहा आकर तो ऐसा लगा जैसे कुछ किलोमीटर नही कई साल दूर चले आया हूं।अय्यर वैसा का वैसा ही सीधा-सपाट गंभीरता और ईमानदारी से अपनी बात रखने वाला और हम लोग भी वैसे ही हर बात को हवा मे उड़ा देने वाले।बेमेल स्वाभाव और विचाराधाराओं के बावज़ूद मित्रता का वो अटूट रिश्ता और उसमे साईंस कालेज के बाहर तिवारी कैंटिन की चाय और समोसे का शुद्ध प्यार वैसा का वैसा ही मिला।मैं थोड़ा बदला ज़रूर हूं पर उसे वक़्त की डिमांड या सीधे-सीधे कहे तो वक़्त की मार भी कह सकते हैं।राज्य बनने के बाद पत्रकारिता और भी कठिन हो गई है।सिद्धांत,ईमानदारी और अक्खड़पन देखने या दिखाने के लिये तुम्हारे जैसे लोगों को ढूंढना पड़ता है।बहुत कुछ बदला है,तुम रायपुर से दुर्ग आ गये हो,मुलाकात भी कम हो गई है।उस दुर्ग जंहा कालेज केसमय हर सप्ताह नई फ़िल्म देखने के लिये बिना टिकट रेल से जाया करते थे अब खुद की गाड़ियां होने के बाद आ नही पाते।जाने दो मैं भी साला ट्रेक से उतर रहा हूं।एक बात ज़रूर है अय्यर तुमसे मिलने के बाद जो बातों का सिलसिला शुरू हुआ और सभी ब्लागर्स का प्यार मिला,शरद भाई के घर जो अपनापन मिला उसने मुझे और कंही जाने ही नही दिया।रास्ते भर लौटते समय वही सब दिमाग मे घूमता रहा और एक सवाल भी,आखिर क्यों ब्लाग या नेट की दुनिया को आभासी कहते हैं?मुझे तो ये हक़ीक़त से अच्छी दुनिया लगी।हां एक बात और तुम जितना अच्छा नाटक,हा हा हा हा हा अरे वही तुम्हारा रंगकर्म कर लेते हो उतना ही अच्छा लिख भी लेते हो।मुझे विश्वास है तुम लगातार लिखते रहोगे तो हम जैसों को हवा मे बात उड़ाने का मौका नही मिलेगा,कुछ अच्छा भी पढने मिलेगा।ये साला फ़िर से लम्बा हो गया है कमेण्ट लगता है।बहुत कुछ बाकी है कहने को अब मिल्कर ही कहूंगा।

बी एस पाबला 8 दिसंबर 2009 को 10:58 am  

अनिल जी की निश्छल भावनात्मक टिप्पणी ने मेरी आंखे ही नम कर दीं

मैं भी पता नहीं कहाँ अतीत की भुलभुल्लैया में खो गया हूँ

बी एस पाबला