मंगलवार, 29 दिसंबर 2009

सुन्दर टैम्प्लैट वाला पान ठेला और जर्दे वाली मीठी पत्ती

बहुत दिनों से पान ठेले पर हमारी अनुपस्थिति देखकर ललित शर्मा जी के साथ ही पान ठेले वाले भी चिंतित थे। दरअसल हम नगरीय निकाय के चुनाव में व्यस्त थे और पान ठेले की चर्चा में पान के पीक घुटकते और पिचकारी मारते हुए शामिल नहीं हो पा रहे थे। आज दिनभर छत्तीसगढ के सभी पान ठेलों पर नगरीय निकाय चुनाव परिणामों की चर्चा हो रही थी, सो हम आज अनमने से घर से निकले और अपने एक पान खाने के शौकीन टायपिस्टि टाईप मित्र के साथ टहलते हुए शहर के एक पान ठेले पर जाकर खडे हो गए।

पान का आर्डर देने के पहले हमने पान ठेले के टैम्पलैट का मुआयना किया, आजू बाजू के साईडबार में पाउच गुटकों के विजेट लटकते मुस्कुरा रहे थे। फोटोशाप से बना सुन्दर हैडर चमचमा रहा था। हैडर के नीचे झिलमिल कर रही चायनीज लाईटों की लडी स्क्रोल होते मरकी जैसी नजर आ रही थी, जैसे उसमें लिखा हो आईये मेरे ठेले पर आईये, गुटका मसाला खाईये और फ्री में कैंसर का रोग ले जाईये। एड सेंस जैसे सिगरेट के विज्ञापन चिपके थे .....

‘वाह ! ......... बडा सुन्दर पान ठेला है भाई आपका, दो पान बनाईये।’
‘कौन सी पत्ती बनाउ बाबू, एक्सप्लोरर, मोजिला, क्रोम, ओपेरा या सफारी.’ उसने मीठा-बंगला-कपुरी टाईप पूछा।

‘सफारी’ का नाम सुनते ही हम उत्साह से भर गए बोले वही बनाओ भाई, हमारे एक मित्र उसी पत्ती में मसाला पान खाते हैं। हमें भी एक बार चखाया था। हमारे साथ वाले मित्र को सफारी कुछ नये टाईप की पान पत्ती‍ लगी वह समझ ही नहीं पाया तो हमने फिर समझाया कि ये पत्ती बडे काम की पत्ती है इसके खाने से दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है। बिना पूछे चुपचाप पान खाओ तुम नही समझ पाओगे अभी तो तुम कवीता और टिप्पणी करना ही सीख पाये हो। मित्र हमारे कहने पर और मुफ्त मे मिलने पर संतुष्ट होकर पान ‘पगुराने’ लगा. उसके आंखों में रेमिंगटन आईएमई यूनिकोड टूल पाने के बाद वाली चमक मैं स्पष्ट देख पा रहा था। साथ में आया मित्र पान ठेले में ही खडे होकर ब्लागजगत की चिंतनकारी और विष्फोटक बातें करना चाह रहा था पर हम इस पर कोई चर्चा नहीं करना चाह रहे थे, क्योंकि हम जानते थे कि जैसे ही हम बात करना शुरू करेंगे मित्र अपने ब्लाग का क्या नाम रखूं यह पूछेगा। और आखरी में भावविभोर हो जाने पर विवश करते हुए भाव लिये कहेगा मेरे ब्लाग के लिए एक झकास नाम तो सुझा मित्र।

मित्र नया-नया कम्यूटर व इंटरनेट प्रयोग्ता बना है, बार-बार बातें ब्लाग तक ले आता था और अपनी बातों पर हमारी टिप्पणी भी चाहता था। मैं हां-हूं कर उसे टरका रहा था।  अचानक हमारी नजर पान ठेले में लगी प्रसिद्ध अभिनेत्री मीनाकुमारी के चित्र पर पडी और हमनें मित्र से पूछा जानते हो मीनाकुमारी के छ:-छ: नाम थे। मित्र के बातों में रस लेते देख हमने मीनाकुमारी के संबंध में पढी जानकारी मित्र पर ठेल दिया। आप भी पढें -

फिल्मी कलाकार अक्सर पर्दे पर आकर अपने असली नाम बदल लेते हैं। इसके जीते-जागते उदाहरण हैं फिल्म इंडस्ट्री के ये कलाकार। कुमुद कुमार गांगुली अशोक कुमार और यूसुफ खान दिलीप कुमार बन गए। मुमताज जहां बेगम मधुबाला बनकर चमकीं, तो रीमा लाम्बा आज मलिका शेरावत के नाम से तहलका मचा रही हैं। हालांकि एक हीरोइन ऐसी भी थीं, जिनके एक-दो नाम नहीं, आधा दर्जन नाम थे। वे थीं मीना कुमारी। थिएटर की नर्तकी इकबाल बानो और हारमोनियम बजाने वाले मास्टर अली बख्श की तीसरी लड़की हुई, तो उन्होने  उसका नाम रखा महजबीं आरा। बहुत की कम लोगों को मालूम है कि मीना कुमारी की मां का संबंध रविन्द्रनाथ टैगोर परिवार से था। वे टैगोर परिवार की बहू थी, लेकिन बाद में उन्होने मुस्लिम धर्म अपनाकर मास्टर अली बख्श से निकाह कर लिया था। इकबाल बानो और मास्टर अली बख्श की तीसरी संतान महजबीं की आंखें छोटी थीं, इसलिए घरवालों ने प्यार से बाद के दिनों में उसे चीनी बुलाना शुरू कर दिया।

मां की बीमारी और पिता की बेकारी ने महजबीं को बचपन में बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट फिल्मों में काम करने पर मजबूर किया। उन्होने  प्रकाश पिक्चर्स की लेदर फेस में पहली बार काम किया। उस समय उनका नाम रखा गया बेबी मीना। इस नाम से उन्होने कई फिल्मों में काम भी किया। उल्लेखनीय यह है कि होमी वाडिया की फिल्म बच्चो का खेल में बेबी मीना ने पहली बार हीरोइन का रोल किया। वे इस फिल्म में मीना कुमारी बन गई और फिर इसी नाम से आखिरी फिल्म गोमती के किनारे तक लगातार काम करती रहीं। वैसे, मीना कुमारी का पांचवां नाम नाज भी था। उन्हे शायरी से गहरा लगाव था और खुद भी शायरी करती थीं। शायरी के लिए वे उपनाम नाज का इस्तेमाल करती थीं। मीना कुमारी को छठा नाम उनके पति कमाल अमरोही ने दिया था। वे मीना को यार से मंजू कहते थे। यहां तक कि मीना कुमारी से अनबन हो जाने के बाद भी कमाल अमरोही ने उन्हे जो खत लिखे, उनमें उन्हे मेरी मंजू ही लिखा। यानी एक अभिनेत्री मीना कुमारी के ही आधा दर्जन नाम थे- महजबीं आरा, चीनी, बेबी मीना, मीना कुमारी, नाज और मंजू। नाज के नाम से उन्होने गज़ल और शायरी की और कई को अपनी आवाज भी दीं। अपनी शायरी की अनमोल विरासत मीना कुमारी अपने मरने से पहले ही गुलजार के नाम कर गईं। मीना कुमारी ने अपनी वसीयत में अपनी कविताएं छपवाने का जिम्मा गुलजार को दिया, जिसे उन्होने नाज उपनाम से छपवाया।

मित्र अब तक काफी बोर हो चुका था सो हम दोनों पान ठेले पर और आने का वादा करते हुए अपने अपने रास्ते हो लिये.

संजीव तिवारी

11 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari 29 दिसंबर 2009 को 8:18 am  

पान का टःएला है दमदार.. :)


यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि आप हिंदी में सार्थक लेखन कर रहे हैं।

हिन्दी के प्रसार एवं प्रचार में आपका योगदान सराहनीय है.

मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.

नववर्ष में संकल्प लें कि आप नए लोगों को जोड़ेंगे एवं पुरानों को प्रोत्साहित करेंगे - यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

निवेदन है कि नए लोगों को जोड़ें एवं पुरानों को प्रोत्साहित करें - यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

वर्ष २०१० मे हर माह एक नया हिंदी चिट्ठा किसी नए व्यक्ति से भी शुरू करवाएँ और हिंदी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें।

आपका साधुवाद!!

नववर्ष की अनेक शुभकामनाएँ!

समीर लाल
उड़न तश्तरी

Udan Tashtari 29 दिसंबर 2009 को 8:18 am  

टःएला =ठेला

महफूज़ अली 29 दिसंबर 2009 को 10:04 am  

मीना कुमारी पर यह आलेख अच्छा लगा.... आपने इतना सुंदर लिखा है कि बाँध कर रखा अंत तक....

जी.के. अवधिया 29 दिसंबर 2009 को 10:12 am  

"मित्र नया-नया कम्यूटर व इंटरनेट प्रयोग्ता बना है, बार-बार बातें ब्लाग तक ले आता था और अपनी बातों पर हमारी टिप्पणी भी चाहता था।"

नया मुल्ला ज्यादा बांग देता है!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi 29 दिसंबर 2009 को 10:20 am  

बहुत दिनों के बाद आए, रोचक तरीके से नई जानकारियाँ लाए।
बधाई।

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" 29 दिसंबर 2009 को 4:19 pm  

क्या इत्तेफाक है! हम ये टिप्पणी भी पान खाते हुए ही कर रहे हैं :)

समयचक्र 29 दिसंबर 2009 को 6:16 pm  

बहुत सुन्दर भाव वाह वाह गजब के सस्मरण है . ... अब हमको पान भी पगुराना पड़ेगा ....

बालकृष्ण अय्य्रर 29 दिसंबर 2009 को 7:36 pm  

वाह् क्या बात है संजीव, तुम लिखते कभी-कभी हो और हर बार कमाल कर देते हो. बहुत ही बढ़िया जानकारी दी है तुमने और मेरा हमेशा से मानना है अच्छी रचना वही है जो अनुदघाटित को उदघाटित करे.
ऐसी रचनाओं से तुम लोगों की उम्मीद बढ़ा रहे हो याद रखना.

काजल कुमार Kajal Kumar 29 दिसंबर 2009 को 8:34 pm  

:)

राज भाटिय़ा 30 दिसंबर 2009 को 12:07 am  

संजीव तिवारी जी आप का लेख पढते पढते हम पान खाना ही भुल गये, यानि आप का लेख बहुत सुंदर लगा.
धन्यवाद

ललित शर्मा 30 दिसंबर 2009 को 12:23 am  

हलवई कस हाल मोर होगे हवे,पोस्ट ला मिही ठेले हंव पढे घला हंव फ़ेर टिपियाए नई हंव, हलवई हां मिठाई ला टुकुर-टुकुर बैठ के देखत रहिथे फ़ेर खाए नई सकय्। माछी मन तक मजा मार डारथे। अब का बताबे संगी, टिप्पणी के जगा मा एक ठीक पोस्ट हो जाही। बधई होय, पान ठेला मा अतेक गियान के चर्चा कौउनो मेर नई होवत हो ही। बधइ