रविवार, 6 दिसंबर 2009

गाँधी के वेश में भीख?

गिरीश पंकज  
एक युवक गाँधीजी का वेश धर कर चौराहे पर भीख माँग रहा था। लेकिन उसे कोई भीख नहीं दे रहा था। युवक दुखी था। पान ठेले पर खड़े  भूतपूर्व नेता प्यारेलाल 'आवारा' भी दुखी थे. पान वाले ने उनकी उधारी पर रोक लगा दी थी.
मैंने कहा-''पार्टनर, ये क्या हाल बना रखा है. भूतपूर्व हुए और ये हाल है कि पान वाला तक चूना लगा रहा है?''
आवारा जी दुःख भरी हंसी के साथ बोले-''ऐसा है भोले,  सब दिन हॉट न एक सामान. हमारा दिन फिर आएगा. जब हम अभूतपूर्व हो जायेंगे. पार्टी टिकट तो दे. कमाई का रास्ता तो बने.''
बात चल ही रही थी कि देखा एक आदमी गाँधी जी के नाम पर भीख मांग रहा है-
'' कुछ मिले माई-बाप, गांधी  के नाम पर कुछ दे दो''.
मैंने उसे पास बुलाया, और अपनी हैसियत के अनुसार एक रुपईया थमाते हुए कहा- ''तुमने ग़लत आदमी का चुनाव कर लिया। गाँधी के नाम पर भीख नहीं, गोली मिलती है। भीख चाहिए तो तू किसी माफिया डॉन के नाम पर भीख माँग। किसी महाखुराफ़ाती नेता के नाम पर भीख माँग। बस, गाँधी का सहारा मत ले, वरना भूखों मर जाएगा।''
मेरी बात सुनकर भिखारी चौंका। वह बोला- ''मैं तो समझ रहा था कि भीख माँगने का है ये अच्छा तरीका होगा। यह गाँधी का देश है। हर सरकारी दफ्तर में गाँधीजी की तस्वीर लटकी नजऱ आती है। कहीं न कहीं गाँधी जी की मूर्ति भी खड़ी नजऱ आती है। नेता लोग गाँधी जी के नाम पर शपथ भी लेते हैं। भारत आने वाला हर विदेशी नेता राजघाट पर जाकर मत्था टेकता है। हर नोट पर गाँधी की तस्वीर रहती है। ऐसे गाँधीजी के नाम पर भीख तो मिलनी ही चाहिए। यही सोचकर मैंने गाँधीजी का हुलिया बना डाला था। मुझे क्या पता था कि गाँधी एक पिटा हुआ नाम बन चुका है।''
मैंने कहा- ''गाँधीजी पिटा हुआ नाम नहीं है। वह आज भी विश्व को दिशा देने वाला नाम है, लेकिन आजकल गाँधी बनने में कोई सुविधा नहीं है, इसलिए लोग गाँधी और उसकी छाया से भी दूर भागते हैं।''
पान ठेले वाला और खुद  भिखारी मेरी ओर नासमझी वाले अंदाज़ में देख रहा था, सो मैंने उसे समझाना शुरू किया- ''देखो, गाँधी बनने से क्या-क्या नुकसान है। एक तो तुम्हें लंगोटी पर आना होगा। सच बोलना होगा। खूब पढऩा होगा। अन्याय के खि़लाफ़ लडऩे के लिए तैयार होना होगा और अब ऐसे लोग लुप्तप्राय जीव हो चुके हैं। भूले-फटके कोई कहीं मिल जाए तो समझो नीलकंठ देख लिए। तो भैया, गाँधी बनना जिं़दगी को बर्बाद करना है, इसलिए कोई भी गाँधी नहीं बनना चाहता है। हाँ, दाऊद इब्राहीम या छोटा राजन-फाजन जरूर बनना चाहता है। मीडिया वाले इन सबको हीरो की तरह छापते हैं और गाँधी जैसा काम करने वाले को कचरे के डिब्बे में फेंक देते हैं। गाँधी का मार्केट ठंडा है। इसलिए जब लोग तुम्हें गाँधी के वेश में देखते हैं, तो उन्हें गुस्सा आ जाता है, कि जिसे हम भूलना चाहते हैं, ये शख्स उसी विचारधारा की याद दिला रहा है। इसीलिए वे लोग तुम्हें भीख न देकर हतोत्साहित करना चाहते हैं, ताकि तुम गाँधी का वेश धर कर भीख माँगने की हिम्मत न करो। कल को तुम किसी हीरो या विलेन का भेष धर लो, डकैत का मेकअप करके निकल जाओ। देखो, कैसे मालामाल हो जाओगे, एक बार ट्राई तो करो पार्टनर।''
मेरी बात सुन कर भिखारी वहा से चला गया. बात आयी-गयी हो गयी. एक साल बाद मै फिर खड़ा था पान ठेले पर. तभी एक रईस अपनी लम्बी कार से नीचे उतरा. हम लोग किनारे हो गए. उसने कहा-''सबको पान खिलाओ''. और मेरी ओर देखते हुए कहा-''इन भाई साहब के लिए अलग से बाँध भी देना.''
मैंने कहा-''आप को पहचाना नहीं.''  भिखमंगे ने मुस्कराते हुए कहा- ''मै वहीच्च  भिखमंगा हूँ, जिसे आपने नसीहत दी थी. आपकी मेरी बात मुझे और मेरी डौकी को भी समझ में आ गई। अब मैंने डकैत का हुलिया बना कर भीख माँगना शुरू कर दिया और देखते ही देखते मंदा पड़ चुका धंधा चल पड़ा।मै  मालामाल हो गया। मौका पड़ने पर चोरी-चकारी भी करता हूँ, डकैती जैसे पावन कार्य भी कार लेता हूँ.''
फिर एक दिन वह मुझे एक दूसरी नयी कार में दिखा। उसकी आँखों पर काला चश्मा चढा हुआ था. पहले मैं उसे पहचान नहीं पाया। उसी ने बताया कि 'मैं वहीच्च  भिखारी हूँ, जिसे आपने सही दिशा दिखाई थी। फार योर काइंड इंफर्मेशन, आज मैं करोड़पति हूँ।''
मैंने चौंक पड़ा- ''वाह, क्या कर रहे हो आजकल?''
''वही पुराना काम, यानी भीख माँग रहा हूँ।''
''कार में बैठकर?''
''नहीं, भेष बदल कर।''
आजकल पत्रकारिता भी कर रहा हूँ.. आपने कहा था न, कि डकैत का मेकअप कर लो या विलेन का अथवा किसी माफिया डॉन का। सो मैंने आल इन वन कर लिया है। मेरे एक मित्र ने समझाया, कि बेटा, पत्रकार  बन जा। इस हुलिये में हर तरह की संभावना है। भीख माँगने का तरीका बदल गया है। लेकिन माँग भीख ही रहा हूँ। आत्मा को बेचकर हर महत्वपूर्ण नेता, अफसरो  के सामने बिछ जाता हूँ। किसी को गरियाता हूँ, किसी की गलियाँ खाता हूँ. खैर...अब तो पैसा ही पैसा है।
थोड़ी देर के बाद वह पुराना भिखमंगा आगे बढ़ गया। उसकी कार की धूल से मेरा चेहरा ढँक गया।
मैंने पान वाले से कहा- ''भैये, हमको तो एक बीडी पिला दो. कडकी चल रही है. पान कल खायेंगे.''
पान वाला बोला-''अरे, हम आपको पान खिलाएंगे, वो भी फ़ोकट में. आप ने भिखारी को ज्ञान बांटा, वह करोडपति हो गया. हमें भी ज्ञान बांटिये, कम से कम किसी का पति तो बन ही जाउ. काहे कि जिगर मा बड़ी आग है.''
मैंने सर पीट लिया, लेकिन खुश भी हो रहा था कि सलाहकार वाला धंधा भी बुरा नहीं है.

2 टिप्पणियाँ:

मनोज कुमार 6 दिसंबर 2009 को 11:44 pm  

विचारोत्तेजक!

Udan Tashtari 7 दिसंबर 2009 को 6:41 am  

बहुत सटीक गिरीश भाई...शानदार. कुछ गुर यहाँ भी बढ़ाते.