मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

म्हारा ताऊ .......


या बात उन दिनों की सै जब म्हारा ताऊ बोम्बे मैं रहया करै था
एक दिन भाटिया जी का जी कर पडा अक ईबकै तो जरमनी जाता होया ताऊ नै मिल कै जाऊंगा सो आव देख्या ना ताव भाटिया जी म्हारी भाभी अर भतीज्जों नै लेकै ताऊ कै पहोंचगे
दिन तो आवभगत अर मजाकबाजी मैं कट ग्या
रात होगी

भाटिया जी का वहीं रहण का इरादा देख कै ताई बोली, रे बीजमरे, यो तेरा भाटिया जी तो न्यू लाग्गै अक कुणबे नै लेकै अड़ैई सोवेगा.......... अर म्हारै फालतू खाट कोनी.......... ईब के करैं..........
ताऊ बोल्या.......... ताई बणगी अर अकल रिवाड़ी छोड़ यायी........... इस म्हं चिंता के........... यहां पड़ौस मैं नीरज जी रहवैं सैं उनकै तै खाट मांग ल्यावांगें............ मैं ईब गया अर ईब आया

न्यू कहकै ताऊ नीरज जी कै चाल पडया
नीरज जी नै दरवज्जे की घंटी सुणी अर दरवाजा खोलते ही ताऊ नै देख कै खुसी तै चिल्लाया.............. वैलकम.. स्वागतम.. वैलकम.. स्वागतम..

ताऊ हंसते होए भीत्तर आग्या

नीरज जी बोल्ले, ताऊ इस टैम क्यूक्कर...?

ताऊ नै बगैर किसी भूमिका कै सारी बात बता दी....... अक भाई तेरे धौरै फालतू बैड पडया हो तो दे दे..

नीरज जी बोले
ताऊ तनै तो पता ई सै.... अक मैं झूठ नहीं बोलता.... अर साच्ची बात या सै.... अक म्हारे घर मैं दो बैड सैं... एक पै म्हारी घरआली अर म्हारी माता जी सोवैं.... अर दूसरे पै मैं अर मेरे पिता जी सोवैं...

ताई बोल्या, रै नीरज जी, मनै पता सै.... थम झूठ नहीं बोलते......... थमनै जिसा कहया सै उसा ही होगा........ पर भाई एक बात कहूं बैड देण कै तो मारो गोली पर सोया तो कम तै कम तरीकै तै करो..........
--योगेन्द्र मौदगिल

9 टिप्पणियाँ:

ललित शर्मा 22 दिसंबर 2009 को 10:24 pm  

वाह वाह वाह हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हो हो हो हो हो हो हो हो हो हो हो हो हो हो हो हो हो हो हो हो हो हो हो हो होहो हो हो हो हो हे हे हे हे हे हे हे हे हे हे हे हे हे हे हे हे हे हे हे हे हे हे हे हे हे हे हे हे हे हे हे हे हे हे हे हे, म्हारे भी नुए सोया करैं सै जद कोई खाट मांगण आजा तो।

विनोद कुमार पांडेय 22 दिसंबर 2009 को 11:32 pm  

बहुत खूब..मजेदार..

राज भाटिय़ा 22 दिसंबर 2009 को 11:52 pm  

अरे ताऊ की तो मत मारी गई, भाटिया जी तो फ़र्श मै ही सॊ जावेगे, युं नीरज ने तंग करने क्यो चला गया, ओर उन भोले मान्स की सारी पो पट्टी खोल दी हा हा हा हा, यू ललित जी ने भी मना कर दिया आगे आगे देखो कोन देवे इस ताऊ ने खाट

Udan Tashtari 23 दिसंबर 2009 को 4:20 am  

हा हा!!


चलो शायद आगे से ठीक से सोने लग जायें. :)

खुशदीप सहगल 23 दिसंबर 2009 को 9:35 am  

योगेंद्र भाई,
पंजाबी में ये किस्सा इस तरह मशहूर है...ओए मंझा (चारपाई) नहीं देना ते न सही, पया (लेटा) ते सही तरीके नाल (साथ) करेया करो....

जय हिंद...

डॉ टी एस दराल 23 दिसंबर 2009 को 9:46 am  

हा हा हा ! योगेन्द्र जी।
इब नीरज भाई तै खाट पै सोवना ए छोड़ देंगे।
वैसे भी कमर के लिए यही ठीक है।

नीरज गोस्वामी 23 दिसंबर 2009 को 11:28 am  

भाई मारा घर की बात बारा कर दी रे शैतान...इब तन्ने देख लेयुन्गा...
नीरज

ताऊ रामपुरिया 23 दिसंबर 2009 को 1:23 pm  

घणी जोरदार कही भाई.:)

रामराम.

राजीव तनेजा 23 दिसंबर 2009 को 11:16 pm  

हा...हा...हा....
मज़ेदार