शनिवार, 26 दिसंबर 2009

गइया को कचरा, तू दूध डकार!!!

गिरीश पंकज 
हमारे मुहल्ले में एक गौ-सेवक रहते हैं। अक्सर पान ठेले पर आते है, और गुटखा खा कर पूरे शहर में चित्रकारी करते घूमते है . पिच..पिच..करके थूकने की  प्रतिभा का प्रदर्शन भी करते है.  उनकी गायों की हड्डियों और गो-सेवक जी की तंदरुस्ती देख कर मैं समझ जाता हूँ, कि पट्ठा गो माता की सेवा करते-करते इतना बलिष्ठ हो गया है लेकिन गो-माता इतनी दुबली-पतली क्यों है? बहुत देर तक कारण सोचता रहा। फिर ख्याल आया, कि माँ तो माँ होती है न। बेटे को अपना खून सुखा कर भी दूध पिलाती है। यह गउ माता भी इसी कोटि की माँ है।
एक दिन मैंने देखा पान ठेले के पास ही पड़े कचरे में उनकी गैया मुंह मार रही थी.
एक दिन मैं गो-सेवक जी के घर पहुँचा। दूर से देखा, वह गाय का दूध दुहने के बाद उसमें पानी मिलाने का पवित्र-कर्म कर रहे थे। मुझे देख कर थोड़ा-सा सकुचाए। कहने लगे- 'आजकल लोगों को प्योर दूध हजम नहीं होता इसलिए सबके स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए थोड़ा बहुत पानी मिलाना पड़ता है। न चाहते हुए भी कई बार कुछ गलत-सलत काम तो करने ही पड़ते हैं साहब।Ó
 ''ये गलत नहीं, बिल्कुल सही काम है।Ó मैंने मुसकराते हुए कहा,  'दूध पचाने के लिए आप पानी मिला रहे हैं। पैसा कमाने के लिए थोड़े न ऐसा कर रहे हैं ?ÓÓ
 वह समझ नहीं सके, कि हाँ बोलूं या ना। मौन रहे। फिर अपनी गायों को सहलाने लगे। मैं गायों की हड्डिïयाँ गिनने लगा। थोड़ी देर बाद उन्होंने गायों को तिलक लगाया और प्रणाम किया। फिर उनके गले में बंधी रस्सी खोल कर ढील दी और मुझे देख कर मुसकराने लगे।
 ''यह मेरा रोज का क्रम है। गऊ माताओं को प्रणाम कर के ढील देता हूँ शहर की सड़कों पर।ÓÓ
''उस दिन गली में कुछ गऊ माताएं पॉलीथिन के बैग्स में भरे हुए जूठन को खा रही थीं।Ó मैंने कहा, 'कुछ गाएँ नुक्कड़ में मुँह मार रही थीं, क्या वे आपके यहाँ की गौ माताएं थीं ?ÓÓ
गो-सेवक अचकचा गए। बोले- ''अरे नहीं साब, हम अपनी गायों को कचरा-जूठन नहीं, अच्छा चारा खिलाते हैं, चारा। पौष्टिïक चीजें देते हैं। आखिर गाय हमारी माता है। इससे वर्षों पुराना नाता है।ÓÓ
बातचीत हो रही थी। तभी एक सज्जन गुस्से में फनफनाते हुए आ टपके। गो-सेवकजी पर बरसते हुए बोले- ''ये क्या तमाशा है पंडित जी, कितनी बार समझाया, लेकिन आपको तो कुछ समझ में ही नहीं आता। अरे, गाय का दूध तो आप पी रहे हैं और मुँह मारने के लिए हमारे बगीचे में भेज देते हो? शर्म नहीं आती ? तुम्हारी गाय और फलाने की बेटी, दोनों आजकल आवारा होती जा रही हैं। कहीं कुछ ऊँच-नीच हो गया, तो लेने के देने पड़ जाएंगे। अरे, गाय अंट-शंट खाते-खाते पॉलीथिन जैसे ज़हर को कब तक पचाएगी? कुछ तो गऊ माता की इज्ज़त करो। भविष्य में तुम्हारी गायें अगर मेरे बगीचे को चरती मिलीं, तो सीधे कांजी हाउस में भेज दूँगा, हाँ।ÓÓ
सज्जन के आक्रामक तेवर के चलते गो-सेवक जी सन्न-सट्ट रह गए। हकलाते हुए कहने लगे- ''अरे साब, आप तो जबरन कुछ की कुछ बके जा रहे हैं। मेरी गाएं इधर-उधर मुँह नहीं मारतीं। चरवाहा आता है और खेत ले जाता है।ÓÓ
 ''हमें उल्लू मत बनाइएÓ, सज्जन बोले, 'यहाँ कहाँ खेत आ गए  कांक्रीट के जंगल में ? ढंग से गायों की सेवा नहीं करते और खुद को गो-सेवक बोलते हो?ÓÓ
सज्जन आँधी की तरह आए और तूफान की तरह लौट गए। गो-सेवक की हालत उस नाले की तरह हो गई जिसका सीमेंटेड ढक्कन खुल गया हो और बदबू फैलती जा रही हो। फिर भी अपने को शुद्ध नदी प्रमाणित करते हुए गो-सेवक जी बोले- 'देखा साहब, क्या ज़माना आ गया है। गो-माता की सेवा करने का यह सिला मिला।Ó
मुझे लगा, अब मुझे भी इस महान गो-सेवी के पास ज्यादा देर नहीं रुकना चाहिए, वरना मेरी आत्मा में भी उस सज्जन की तरह नैतिक बल जोर मारेगा तो मैं भी गरियाने लगूँगा। सो, मैंने लौटना ही मुनासिब समझा। तब तक मन में एक दोहा आकार ले चुका था। आप भी देंखें -
गो सेवक जी धन्य हो, धन्य तेरा उपकार।
गाय  को  कचरा खिला,  तू तो दूध डकार।

7 टिप्पणियाँ:

श्याम कोरी 'उदय' 26 दिसंबर 2009 को 8:13 am  

... कुछ नया पढने मिला !!!!

RAJ SINH 26 दिसंबर 2009 को 12:35 pm  

भैय्ये वो गोसेव़क नहीं या तो पुराने साम्यवादी रहे होंगे या नए समाजवादी .दूध डकारों खुद और मॉल चारा दूसरों का .
या आधुनिक राष्ट्रवादी जनवादी , लालू की तरह . चारा भी खुद खा जाओ दूध भी डकार जाओ ,जनता गोबर लीद तक से महरूम .
क्या कम खुशी की बात है की वे आपके गोसेव़क व्यक्तिगत और मोहल्ले के स्तर पर ही सक्रीय हैं .
नेहरू ने तो इसी के सहारे पूरे राष्ट्र को गाय बना डाला और उनकी कई पीढ़ियों का राजनैतिक व्यक्तिगत स्वास्थ्य आज तक मजबूत है .
.........और आप हैं की सिर्फ एक गोसेव़क ,एक गाय और एक मोहल्ले से ही परेशां हैं :)
बहरहाल ,पान तो नहीं खाता पर आप वाली पान की दूकान पर हमेशा मजे लेता हूँ .
( आभाशी जगत का फायदा की किसी की पीक पिचकारी से भी सुरक्छित )

महेन्द्र मिश्र 26 दिसंबर 2009 को 5:08 pm  

बिंदास भाई आनंद आ गया पान की दूकान पे........

महेन्द्र मिश्र 26 दिसंबर 2009 को 5:09 pm  

बिंदास भाई आनंद आ गया पान की दूकान पे........

महेन्द्र मिश्र 26 दिसंबर 2009 को 5:09 pm  

बिंदास भाई आनंद आ गया पान की दूकान पे.कुछ नया पढने मिला...

डॉ टी एस दराल 26 दिसंबर 2009 को 8:09 pm  

हा हा हा ! रेडीमेड टोन्ड दूध, या डबल टोन्ड !
बढ़िया संस्मरण ।

राज भाटिय़ा 26 दिसंबर 2009 को 9:52 pm  

अजी यह तो गॊ माता है, लोग अपनी सगी मां को नही देते खाने को, लेकिन उस की ज्यादाद पर नजर गढाये रहते है.
धन्यवाद