गुरुवार, 7 जनवरी 2010

बात महिमावान उंगली की ...

बड़ी जोरदार ठण्ड पड़ रही है . घूमते घूमते अपुन आज पान की दूकान पे पहुँच गए . देखा तो पान वाला भी ठण्ड से ठिठुर रहा था . तबई अचानक गिरीश जी की जा बात जेहन में कौंध गई की हमें हर मामले में उंगली करनें में महारत हासिल है और मैंने भी ठान लिया की इस वार्ता को मै आगे बढ़ा दूं.

मैंने सोचा की क्यों न पान वाले को उंगली बताई जाय ... जैसे मैंने उंगली उठाई तो पान वाला बोला - उंगली काय उठा रहे हो ...सीधे सीधे बताओ बाबू कैसा पान लगा दूं .

मैंने डकार लेते हुए कहा जरा पान में कतरी, पिपरमेंट और सौप डाल देना . फिर मैंने पान वाले से कहा तुम्हे मालूम है की मैंने तुम्हे काय उंगली बताई थी . आजकल उंगली की महिमा बढ़ गई है .उंगली है बड़ी काम की चीज . उंगली बताकर किसी को चिढाया जा सकता है .

उंगली बताकर चुनौती भी दी जाती है . श्री कृष्ण ने उंगली बताकर जरासंघ को दो फाड़ करवा दिया था . कोई अच्छा भला खा पी रहा हो तो उसकी गा... एंड में उंगली कर दो बस फिर उसका खूब धुआं देखो और खूब आंच सेको और खूब हा हा हा करो..

कुछ लोगो की बिना बात के उंगुली करने की आदत होती है जो बिना वजह किसी को भी उंगली करते रहते है . देखो जा बात नेट पे तो बहुतई देखी जा रही है....बड़े बड़े पुराने धुरंदर नामी गिरामी चिटठाकार किसी नये या पुराने ब्लागर की खिल्ली उड़ाने के लिए बेवजह उंगली कर देते है . यह बात भी भूलने लायक नहीं है की एक उंगली उठाकर एम्पायर खिलाडी को आउट करार दे देता है ..

विपाशा बासु कम कपडे पहिनकर जब हाथ उठाकर उठाकर उंगली बता कर जब नाचती है तो दीवाने थिरकने लगते है तो दूसरी और संस्कारी बूढ़े विपाशा को कम कपडे पहिनने पर उंगली उठा उठाकर कोसते है . पान वाले ने कहा - भैय्या बहुत तै हो गई...अब जा बताओ भाई ललितजी और बाबा लंगोतानद नहीं दिख रहे है ?

मैंने मुस्कुराकर पान वाले से कहा - भैय्ये ठण्ड ज्यादा पद रही है कही उंगली कर रहे होंगे.
इस बात पर पान वाले और मैंने जोर का ठहाका लगाया और मैंने वहां से हंसते हंसते बिदा ली .


चर्चा पान की दूकान पर - महेंद्र मिश्र जबलपुर वालो द्वारा

9 टिप्पणियाँ:

जी.के. अवधिया 7 जनवरी 2010 को 6:11 pm  

जोरदार उँगली पुराण है!

अजय कुमार 7 जनवरी 2010 को 6:15 pm  

उंगली से तंग आकर ’अंगुलिमाल ’ डाकू बना था

ललित शर्मा 7 जनवरी 2010 को 6:22 pm  

मिसिर जी, अब एक उंगली पुरान लिख ही डालो।
200साल हो गए कोई पुराण नही लिखा गया है।
बधाई हो।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक 7 जनवरी 2010 को 9:01 pm  

उँगली गाथा जोरदार रही!

मनोज कुमार 7 जनवरी 2010 को 10:03 pm  

यथार्थ लेखन।

माधव 8 जनवरी 2010 को 7:32 pm  

पान दूकान के पान काफी लाजबाब है पर पान खाना तो सेहत के लिए खराब है

cmpershad 9 जनवरी 2010 को 4:45 pm  

मिश्र जी, रिटायर होने के बाद अच्छा टाइमपास चुन लिया है :)

महेन्द्र मिश्र 9 जनवरी 2010 को 6:56 pm  

कंप्रेस्ड जी .
आप सभी से मिल रहे स्नेहिल भाव के कारण कुछ अधिक मन लग गया है .... आभार

Udan Tashtari 11 जनवरी 2010 को 7:28 pm  

बहुत सही गाथा!