शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2009

बदले-बदले मेरे सरकार...

गिरीश  पंकज 
पान ठेले पर छदामीरामजी मुझसे टकरा गए और देखते ही  बोल पड़े, 'हे-हे..अरे, आप तो आजकल दिखते ही नहीं!'' मुझे हंसी आ गई, उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे।
वे फौरन बोल पड़े, 'आपकी ये हँसी ही मेरी ताकत है। मैं इस देश की जनता का सदैव हँसता हुअ नूरानी चेहरा देखना चाहता हूँ। इस बार भी आपका वोट हमें ही मिलेगा, ऐसा भरोसा है!
''आपने हमारे लिए किया ही क्या है ?'' मैंने पूछा
 'बहुत कुछ! लेकिन मेरे काम बड़े ही सूक्ष्म थे।'' वे हँसते हुए बोले,  'मैंने जो कुछ भी किया, उसका प्रचार नहीं किया।'' लेकिन लोग तो कहते हैं कि आपने डटकर भ्रष्ट+आचार किया है। आपके कारनामों को हर कोई जानता है। आपके रिश्तेदार तो लाल हो गए हैं। पूरे इलाके में चर्चा है। चर्चा क्या, बहुत कुछ तो सामने भी नज़र आ रहा है।शर्ट पर पान के नहीं भ्रष्टाचार के दाग दिख रहे है. ''
छदामीराम ने चेहरा लटका लिया। फिर बोले, 'ये बस विपक्ष की चाल है। मैं हमेशा शिष्टाचार की राह पर चलता रहा हूँ.''
अब तो भ्रष्टाचार ही शिष्टाचार हो गया है!'' मैंने कहा
छदामीराम थोड़ी देर के लिए चुप हो गए, फिर मुसकराते हुए बोले, 'राजनीति में बहुत सारे काम मन मार कर करने पड़ते हैं। भ्रष्टाचार भी इनमें से एक है . लेकिन कसम बापू की, मैं जो कुछ भी करता हूँ, देश के लिए ही करता हूँ! आप जिन्हें मेरा परिजन कह रहे हैं, उनसे मेरा कोई संबंध नहीं। वे सब देश के ही लोग है. सब अपने बलबूते आगे बढ़े हैं। अब बेचारे लोग कमाने-खाने के लिए मेरे नाम का इस्तेमाल करते रहे हों, तो मैं नहीं जानता।''
'इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ खुदा करते हैं भ्रष्टाचार और स्वीकारते नहीं।'' मैंने कहा, 'खैर, इस बार आपके खिलाफ जबर्दस्त माहौल है, नगर निकाय के चुनाव सामने है. सुना है आप फिर खड़े हो रहे है? कैसे मैनेज करेंगे?''
नेताजी पान चुचुवाते हुये हँस पड़े, 'भाई, इतने साल से चुनाव मैनेजमेंट तो सीखते रहे हैं। मार्केटिंग पर शुरू से ही पूरा ध्यान देते रहे हैं। अपने बारे में इतना प्रचार करवाते हैं कि जनता के दिलोदिमाग पर हमारा नाम एक प्रॉडक्ट की तरह दर्ज हो जाता है। जनता के दिलोदिमाग पर बस एक नाम अंकित रहेगा और वो है छदामीराम। फिर हम कपड़े बाँट रहे हैं, गद्दे वितरित कर रहे हैं। कहीं-कहीं नोट-फोट भी दे रहे हैं। इतना कुछ कर रहे हैं तो क्या हमें वोट भी नहीं मिलेगा?''
अचानक छदामीराम ने ट्रेलर दिखाना शुरू कर दिया। मेरे चरणों पर गिर कर, आवाज़ में कातरता लाकर बोले -
''आपका वोट मुझे ही मिलना चाहिए! बस।''
'ठीक है... ठीक है! देखेंगे!'' मैंने गिरे हुए नेता को ऊपर उठाते हुए सांत्वना दी।
नेताजी प्रसन्न हो गए और बोले -इनको भी मेरी ओर से एक पान खिलाओ.''
मैं देश का आम मतदाता, इसलिए मैं भी प्रसन्न हो गया कि देखो, इतना बड़ा आदमी मेरे सामने गिड़गिड़ा रह है। सोचता हूँ, कि भ्रष्टाचारी तो सब हैं। ये बेचारा कुछ कम है। और सबसे बड़ी बात, मेरे सामने गिड़गिड़ा रहा है और बाकी लोग ऐसे ही चले जाते हैं। अपने सामने कोई गिड़गिड़ाए,, और हम उसे कुछ न दें.. ये तो सरासर बेइंसाफी है। सो, दे देते हैं वोट। लेकिन मैंने कहा, वोट तो आपको ही दूंगा. चोर को दे या चंडाल को, क्या फर्क पड़ता है. फी आप चरणों पर गिर भी रहे है. गिरे लोगो को उठाना मेरा फ़र्ज़ है, लेकिन पान नहीं खाऊँगा. मै नेताओं से मुफ्त का पान नहीं खाता.पता नहीं किस तरह के पैसे का हो. सो, माफ़ करे. लेकिन वोट पक्का.
नेता जी शर्मिंदा हो गए, लेकिन  दो सेकेण्ड तक ही. फिर बोले-जैसी आपकी मर्ज़ी. फिर पान की पीक को बीच सड़क पर थूक कर आगे बढ़ गए. पान की लाल पीक देख लगा की ये जनता के अरमानो का लहू है, जो चौराहे पर बिखरा  पड़ा है.

15 टिप्पणियाँ:

ललित शर्मा 23 अक्तूबर 2009 को 10:23 pm  

गिरीश भैया बधाई हो, पान चुचवा रहा है और चर्चा भी हो रही है, बहुत बढिया बोहनी है, बधाई हो

Mishra Pankaj 23 अक्तूबर 2009 को 11:07 pm  

वाह जी वाह आपने तो एक नयी व्यंग बाण छोड़ दी आज

Anil Pusadkar 24 अक्तूबर 2009 को 1:28 am  

लाल पीक जैसे जनत्ता के अरमानो का लहू……………क्या बात है ललित बाबू ,जमा रहे हो चमड़े के जुते भीगो-भीगो के।

kamlesh sachdeva 24 अक्तूबर 2009 को 2:48 am  

Bahut achha vyangya hai. Yeh neta isi laayaq hain. Vyangya inki khabar le sakta hai aur janata ko adhik jagarook ker sakta hai- uske chehre per muskaan laate hue. Per political logon ki moti chamdi per to kisi bhi prahar ka koi asar nahin hota.

ललित शर्मा 24 अक्तूबर 2009 को 8:23 pm  

गिरीश भैया, बधाई हो,नया ब्लाग प्रारभ करने के लिए।

Amit K Sagar 24 अक्तूबर 2009 को 9:03 pm  

आप सभी को बहुत-बहुत वधाई व शुभकामनाएं.
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हिंदी ब्लोग्स में पहली बार Friends With Benefits - रिश्तों की एक नई तान (FWB) [बहस] [उल्टा तीर]

Udan Tashtari 24 अक्तूबर 2009 को 10:26 pm  

आपका हिन्दी चिट्ठाजगत में हार्दिक स्वागत है. आपके नियमित लेखन के लिए अनेक शुभकामनाऐं.

वन्दना अवस्थी दुबे 24 अक्तूबर 2009 को 11:16 pm  

बहुत बढिया ब्लॉग है. वैसे अधिकतर महत्वपूर्ण चर्चाएं पान की दुकान पर ही होती हैं.

Krishna Kumar Mishra 24 अक्तूबर 2009 को 11:38 pm  

भैया पान तो हमहू बहुत खाईत हन का कुछ कै सकित हन ईहा आप के धांसू ब्लाग पर

ओम आर्य 25 अक्तूबर 2009 को 12:00 am  

मै वन्दना जी के बातो से सहमत हूँ कि अधिकतर महत्व्पुर्ण चर्चाये पान की दुअकान अपही होते है .....आपके पहली बार मैने सिरकत करी है ....

शिवम् मिश्रा 25 अक्तूबर 2009 को 12:36 am  

आप सभी को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं !

"मैंने गिरे हुए नेता को ऊपर उठाते हुए सांत्वना दी।"

आज के माहौल में हम और कर भी क्या सकते है ?? बस सांत्वना दे सकते है इन नेताओ को सच में उठाना तो शायद अब संभव नहीं !
सांत्वना - ही वो हमे देते है तो हम भी उनको वही लौटा रहे है !

परमजीत बाली 25 अक्तूबर 2009 को 2:44 am  

बहुत बढिया पोस्ट लिखी है। बधाई।

राजीव तनेजा 26 अक्तूबर 2009 को 7:55 am  

धारदार व्यंग्य

अजय कुमार 26 अक्तूबर 2009 को 12:43 pm  

हिंदी लेखन के लिए स्वागत और शुभकामनायें

शशांक शुक्ला 26 अक्तूबर 2009 को 6:38 pm  

बात तो सही कही है, नेता एक ऐसी प्रजाति है जो गरीब जनता टाइप प्रजाति पर पैसा और गिफ्ट सिंद्धांत से राज करती है, औऱ भूखी नंगी जनता को क्या चाहिये एक कपड़ा और दो रोटी जो नेता जी के पैसो से आ जाती है। इसीलिये नेता पैसे वाले ही बनते है