गुरुवार, 21 जनवरी 2010

इंग्रेजी भाषा, लपटन जी और हमारी दुविधा


ओईसे तो हम बहुते अंग्रेजी पढे , और फ़िर काहे नहीं पढें , ई सोच के पढ लेते हैं कि हम लोग तो खाली अंग्रेजी को झेल रहे हैं , अपने पूर्वज़ लोग तो बेचारे पूरे के पूरे अंग्रेजन राज को और अंग्रेज सब को झेले थे ,बस यही सोच के झेले जा रहे हैं और ठेले जा रहे हैं ।यही परमदुविधा की स्थिति में हम पान के गुमटी पर पहुंच गए । अईसन घोर घडी में हम बचपने से पान के गुमटी पर धरना देते रहे हैं , अरे पान बीडी गुट्खा के लिए नहीं जी बल्कि , वहां लपटन जी से सार्थक विमर्श करने के लिए । लपटन जी की पान की गुमटी पर उपलब्धता की गुंजाईश कम से कम इससे तो जरूर ही ज्यादा रहती थी जितनी कि शरद पवार को चीनी के दाम कम होने की है । सो हम चल दिए लपटन जी से विमर्शियाने ।

लपटन जी , ई अंग्रेजी को लेकर हमरे मन में बहुते दुविधा रहती है कुछ मार्गदर्शन करिए । अच्छा ये बताईए कि , नैसर्गिक उष्मावर्धक पेय पदार्थ (अरे ,दारू यार )के दुकान पर लिखा होता है , यहां अंग्रेजी भी मिलती है ........जबकि नीचे लिखा होता है देसी ठेका । बडा ही धर्म संकट है भाई , लपटन जी कुछ प्रकाश डालिए न ।

यार तुम लोग भी न एकदम अनाडी ही रहे । अब इसमें तुम्हारा कोई कसूर भी नहीं है लगाते तो हो नहीं तो दुविधा तो बनी ही रहेगी न । देखो उस देसी ठेके से जब कोई वो लेता है न ,,,अरे दारू यार ...तो कुछ पैग मारने के बाद किस भाषा में बात करने लगता है ......अंग्रेजी में । ....फ़िश फ़्लैट ,,दिस दैट, ढिंग टिलुम , ट्विंग टैंग ......और भी । अंग्रेजी भी ऐसी कि अंग्रेजों के बाप भी न समझ पाएं । समझे कि नहीं ,..इसलिए देसी ठेके पर मिलने वाली से अंग्रेजी ........मिल जाती है ।

अच्छा लपटन जी ये मान लिया , है तो मेरे घर की बात , मगर फ़िर भी आपसे पूछ लेता हूं । घर पे श्रीमती जी पढती हिंदी का अखबार भी नहीं , मगर जोर देती हैं कि अंग्रेजी वाला भी चालू कर लो, काहे ...हम समझ नहीं पाते हैं ।

हा हा हा लो ई कौन भारी बात है , अरे झा जी , दु रुपैय्या में एतना रद्दी इकट्ठा हो जाता है , ई फ़ैसिलिटी अंग्रेजी अखबार में ही तो होता है , समझे कि नाहीं ॥

अच्छा छोडिए ई सब और नयका खबर सुनिए ,विंडोस का नया एक दम फ़्रेश पंजाबी वर्जन आया है

उसका शब्दावली देखिए आप झाजी

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पूरा कोर्स करते ही बताएंगे, आना आप भी , सुने झाजी , अरे ई लोगों को भी कह दीजिए न , सुन रहे हैं न

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सोमवार, 18 जनवरी 2010

सर्दी की लहर में एक चर्चा मदक कलि और मंहगाई

नसों को हिला देने वाली सर्द हवाएं चल रही थी . करीब एक हफ्ते से पान नहीं खाया था ....यह फ़िल्मी गाना ओ मदकक्ली ओ मदककली गुनगुनाते हुए पान की दुकान पर पहुँच गया . तो पानवाला बड़ा खुश हो गया जैसे कोई मुर्गा हलाल होने पहुँच गया हो .

बनियो की आदत के मुताबिक मुस्कुराकर बोला - बाबू आज बड़ी मस्ती में दिख रहा हो ..आज का बात है .....

मैंने कहा ख़ाक मस्ती कर रहा हूँ . ठण्ड इतनी पड़ रही है की मुंह अपने आप फड़कने लगता है और तुम समझ रहे हो की मै गाना गुनगुना रहा हूँ . अरे उस मंहगाई रूपी मदक कलि की बात करो जो सबको मटक मटक कर हलाकान कर रही है . तुम्हें मालूम है इस फिल्म के डायरेक्टर केन्द्रीय मंत्री पावर साब है . अरे पान वाले एक ज्योतिष ने इनके बारे में यहाँ तक कह दिया है की पवार जी को ये वाला मंत्री नहीं होना था . ये वाले का अर्थ है दाल रोटी वाला विभाग का मंत्री . हर तरफ से ओले पड़ रहे है बस वे फ़िल्मी डायरेक्टर की तरह कह देते है की अभी मंहगाई की फिल्म और चलेगी.

पानवाले ने टोककर कहा - अरे इन बुढऊ को कोई भी विभाग दे दो इनके बस में अब कुछ नहीं है अब इन्हें इस उम्र में अपने घर के नाती पोतो को खिलाना चाहिए .

मैंने कहा - यार पानवाले तुम भी बड़ी मीठी मीठी बात करत हो जिससे तुम्हारी पान की दुकान खूब चलें . पान तो मीठा खिलाते हो पर पान में चूना बहुत डाल देते हो तो पान खाने की इच्छा नहीं होती है .

पान वाला था बनिया प्रवृति का ताड़ गया की ये ग्राहक महाराज खिसक लेंगे फिर कभी न आएंगे इसीलिए चेप्टर को फ़ौरन बदल कर बोला - महाराज वो लंगोटा नन्द महाराज नहीं दिख रहे है . कभी उनसे मुलाकात होती है की नहीं ?

मैंने कहा - हाँ पिछले सप्ताह हिमालय पर थे अकेले एक लंगोट पर थे अधिक ठण्ड खा रहे थे . शायद लंगोटी में सिगड़ी बांध कर बैठे होंगें और यह कहते हुए मुश्कुराते हुए मैंने पान की दुकान से अंतिम बिदा ली...

आलेख व्यंग्य - महेंद्र मिश्र
जबलपुर वाले की कलम से

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शनिवार, 16 जनवरी 2010

कौनऊ टाइप के हो तुम यार....

एक सप्ताह से ठंडी हवाओ का लम्बा सिलसिला चल रहा है . अच्छे अच्छो की सीटी बजने लगती है . इस कड़कती ठण्ड में अच्छे अच्छो के नल्ले पसले ढीले पड़ जाते है . कांपते कांपते अपुन फिर पहुँच गए पान की दुकान पर .

पानवाला बोला - भैय्या आज ग्राहकी कम है अच्छा है कै तुम आ गए . कम से कम अच्छे भले के समाचार तो मिल जाएँ .

मैंने कहा - भीषण कुहरा पड़ रहा है .. कुहरे में आँखों में टिपत नहीं है सो अपने घर से वे कहाँ निकलने वाले है.. घर में पल्ली तनके सो रहे है ... हमने उन्हें समाचार जानने के लिए चिट्ठी पतरी लिखने को कै बार कहा और कहा की आप आमंत्रित हमारे ब्लॉग में चिट्ठी लिख देवे करो पर पता नहीं भाई लोग कौन टाइप के है ....कै चुपचाप कथरी ओड़ के बैठे है .

पानवाला - तो भैया है तो सही बात पर नाराज काय हो रहे हो लेव एक नागपुरी पान खाओ और सुनाओ कैसे गुजर रही है ....

मैंने कहा - भाई पान वाले तुम्ही बताओ जब जुड़े हो तो कछु अपने वचन का पालन करो पता नहीं कौनऊ टाइप के है यार लोग बाग़ .

पानवाले ने कहा - हाँ है तो सौ टके की बात सटीक है और ऐसो सब जगह हो भी रहो है भैय्या .. हाँ कछु अपनी भी तो रखनी चाहिए ... कै नहीं ....

और मैंने चिट्ठी की उम्मीद की आशा करते हुए पान की दूकान से बिदा ली .

चर्चा - महेंद्र मिश्र
जबलपुर वालो द्वारा

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बुधवार, 13 जनवरी 2010

हाल क्या था दिलो का हमसे पूछो न सनम ...उनका पतंग उड़ाना गजब हो गया ....

आज अनमने से से पहुँच गए पान की दूकान पे ... पानवाला बोला - के आज चेहरा बड़ा उदास सा दिख रहा है का बात है जो बड़े परेशान से दिख रहे हो . मैंने कहा - मुझे मकर संक्रांति पर बचपन की यादे सता रही है . पान वाले ने कहा तनिक हमखो सो तो बताई ... बताने से जी हल्का हो जाता है तो मैंने अपनी दास्तान कुछ इस तरह से बयां की -----

ओह जब जब मकर संक्रांति आती है तब अपना बचपना भी याद आ जाता है और उन सुखद दिनों की स्मृतियाँ दिलो दिमाग में छा जाती है . वाकया उन दिनों का है जब मै करीब पन्द्रह साल का था . कहते है की जवानी दीवानी होती है . इश्क विश्क का चक्कर भी उस दौरान मेरे सर पर चढ़कर बोल रहा था .









मकरसंक्रांति के दिन हम सभी मित्र पतंग धागे की चरखी और मंजा लेकर अपनी अपनी छतो पर सुबह से ही पहुँच जाते थे और जो पतंगे उड़ाने का सिलसिला शुरू करते थे वह शाम होने के बाद ही ख़त्म होता था . मेरे घर के चार पांच मकान आगे एक गुजराती फेमिली उन दिनों रहती थी . उस परिवार के लोग मकर संक्रांति के दिन अपने मकान की छत पर खूब पतंग उड़ाया करते थे . उस परिवार की महिलाए लड़कियाँ भी खूब पतंगबाजी करने की शौकीन थी .








उस परिवार की एक मेरे हम उम्र की एक लड़की खूब पतंग उड़ा रही थी मैंने उसकी पतंग खूब काटने की कोशिश की पर उसने हर बार मेरी पतंग काट दी . पेंच लड़ाने के लिए बार बार नए मंजे का उपयोग करता .हर बार वह मेरी पतंग काटने के बाद हुर्रे वो काट दी कहते हुए अपनी छत पर बड़े जोर जोर से उछलते हुए कूदती थी और विजयी मुस्कान से मेरी और हंसकर देखती तो मेरे दिल में सांप लोट जाता था .





एक दिन मैंने अपनी पतंग की छुरैया में एक छोटी सी चिट्ठी बांध दी और उसमे अपने प्यार का इजहार का सन्देश लिख दिया और उसमे ये भी लिख दिया की तुमने मेरी खूब पतंगे काटी है इसीलिए तुम्हे मै अपना गुरु मानता हूँ . छत पर वो खड़ी थी उस समय मैंने अपनी वह पतंग उड़ाकर धीरे से उसकी छत पर उतार दी . पतंग अपनी छत पर देखकर लपकी और उसने मेरी पतंग को पकड़ लिया और पतंग की छुर्रैया में मेरा बंधा संदेशा पढ़ लिया और मुस्कुराते हुए काफी देर तक मुझे देखती रही और मुझे हवा में हाथ हिलाते हुए एक फ़्लाइंग किस दी . उस दौरान मेरे दिमाग की सारी बत्तियां अचानक गुल हो गई थी .





मकर संक्रांति के बाद एक दो बार उससे लुक छिपकर मिलना हुआ था . वह शायद मेरा पहला पहला प्यार था शायद उसका नाम न लूं तो भारती था . अचानक कुछ दिनों के बाद बिजनिस के सिलसिले में उनका परिवार गुजरात चला गया और वो भी चली गई उसके बाद उससे कभी मिलना नहीं हुआ . जब जब मकर संक्रांति का पर्व आता है तो उसके चेहरे की मुस्कराहट और और उसका पतंकबाजी करना और ये कह चिल्लाना वो काट दी है बरबस जेहन में घूमने लगता है .

....

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सोमवार, 11 जनवरी 2010

आ...बताएँ तुझे की कैसे होता है बच्चा

राजीव तनेजा


 
बड़े दिन हो गए थे खाली बैठे बैठे... कोई काम-धाम तो था नहीं अपने पास.. बस कभी-कभार कंप्यूटर खोला और थोडी-बहुत 'चैट-वैट' ही कर ली। सच पूछो तो यार बेरोज़गार था मैं और इसमें अपनी सरकार का कोई दोष नहीं, दरअसल!...अपनी पूरी जेनरेशन ही ऐसी है। अब कोई छोटी-मोटी नोकरी तो हम करने से रहे क्योंकि हर किसी ऐरे-गैरे...नत्थू-खैरे को घड़ी-घड़ी कौन सलाम बजाता फिरे ? और फिर कोई छोटा- मोटा धंधा करना तो अपने बस की बात नहीं इसलिए बाप-दादा जो थोडी-बहुत पूंजी छोड गए थे...वो भी आहिस्ता-आहिस्ता खत्म होने को आ रही थी। आखिर!...वो भी भला कब तक साथ देती ? बीवी के तानों का तो शुरू से ही मुझ पर कोई असर होता नहीं था। उसकी हर बात को मैं एक कान से सुनता और दूसरे से बाहर निकाल देता। कई बार तो कान में घुसने तक ही ना देता।
पहले नकदी खत्म हुई फिर  गहने-लत्तों का नंबर भी आ गया। एक-एक करके चीज़ें खत्म होती जा रही थीं लेकिन मेरी अकड़ ढीली होने का नाम ही नहीं ले रही थी। एक दिन मज़े से टीवी पर ' नो-एंट्री ' फिल्म देखते-देखते अचानक मैं खुशी के मारे उछल पडा। इसलिए नहीं कि फिल्म अच्छी थी बल्कि...अपुन के भेजे मे आइडिया आ गया था नोट कमाने का। अरे नोट कमाने का क्या,?...वो तो नोट छापने का आइडिया था। जैसे ही बीवी को बताया कि...
"एक आइडिया मिला है नोट छापने का"...तो वह गश खा कर धड़ाम करती हुए ऐसे गिरी कि वहीं के वहीं बेहोश हो गई। होश मे आने के बाद बोली....
 "बस जेल जाने की कसर ही बाकी रह गई थी .... नोट छाप कर वह भी पूरी करने का इरादा है जनाब का? " 
मेरी हंसी रोके ना रुकी। बोला,...
"अरी भागवान!...नोट छापने का असली मतलब सचमुच में नोट छापना नहीं है".. 
"तो फिर?" 
"देखा नहीं, फिल्म में उस ज्योतिषी को?.... कितनी सफाई से 'सलमान' से पैसे ऐंठ लेता है और अनिल कपूर को बेवकूफ बनाता है"
"तो क्या हुआ?" 
" अपुन का भी बस यही आइडिया है" ...
" तुम्हारे पूरे खानदान में भी कोई ज्योतिषी हुआ है जो तुम बनोगे?"..
" हुआ तो नहीं लेकिन हमारी आनेवाली नस्लें ज़रूर 'राज ज्योतिषी' कहलाएगी"... 
"पर ये सब करोगे कैसे?"... 
"अरे!...कुछ खास मुश्किल नहीं है ये सब...बस...थोड़ा-बहुत त्याग मुझे करना होगा" ...
"तो क्या दारू छोड़ दोगे?"बीवी के चेहरे पे खुशी के बादल आने को थे... 
"पागल हो गई है क्या?...वो भी कोई छोड्ने की चीज़ है?"...
"तो फिर?" बीवी कुछ मायूस सी होती हुई बोली 
"अरे!...ये हीरो-कट बाल छोड़ सीधे-सीधे लम्बे बाल रखूंगा" 
"अरे वाह!..उसमें तो नाई का खर्चा भी बचेगा" बीवी चहक उठी  
"कर दी ना तुमने दो कौड़ी वाली बात?.... अरे!...मैं लाखों में खेलने की सोच रहा हूं और तुम इन छोटी-छोटी बातों पर नज़र गड़ाए बैठी हो"मैं आगबबूला होने का नाटक सा करता हुआ बोला  
"लेकिन आता-जाता तो तुम्हें कुछ है नहीं...खाली वेष बदलने से क्या होगा?" बीवी फिर बोल पड़ी 
"अरे यार!..पहले पूरी प्लानिंग तो सुन ले...बाद मे अपनी बकबक करती रहिओ" 
"जी!...बताऒ" बीवी आतुर नज़रों से मेरी तरफ ताकते हुए बोली 
"हां!...तो मैं त्याग करने की बात कह रहा था...तो दूसरा त्याग ये करना पडेगा कि....ये गोविंदा-छाप चटक-मटक वाले कपड़े छोड़ सिम्पल धोती-कुरता पहनना पड़ेगा" 
"वो तो शादी का पड़ा-पड़ा अभी तक सड़ रहा है अलमारी में" बीवी चहकते हुए फिर बोल पड़ी 
"चलो!...ये काम तो आसान हुआ...अब कोने वाले कबाड़ी की दुकान से रद्दी छांटनी पड़ेगी"  
"आय-हाय।...अब क्या रद्दी भी बेचोगे?" बीवी हैरान हो परेशान होती हुई बोली  
"जब पता नहीं होता ...तो बीच में चोंच मत लड़ाया कर" मैं आँखे तरेर गुस्से से लाल-पीला होता हुआ बोला 
"बेवाकूफ!..पुराने अखबारों में जो भविष्यफल आता है... उन्ही की कतरनों को सम्भालकर रखूंगा, वक्त-बेवक्त काम आएंगी और अगर एस्ट्रॉलजी से रिलेटेड कोई किताब मिल गई तो...अपनी पौ-बारह समझो" 
"पौ-बारह मतलब?"... 
"अरी बेवकूफ!... पौ-बारह मतलब...लॉटरी लग गई समझो"... 
"लेकिन ये 'जन्तर-मन्तर' वगैरा कहां से सीखोगे भला?" 
"कोई खास मुश्किल नहीं है ये सब भी...बस!...'बल्ली सागू' या फिर 'बाबा सहगल' के किसी भी पुराने रैप सॉन्ग को कुछ इस अन्दाज़ से तेज़ी से...होंठो ही होंठो मे बुदबुदाना होगा कि किसी के पल्ले कुछ ना पड़े"...
?...?....?...?....बीवी कि समझ मे कुछ नहीं आ रहा था
"बस!...हो गया.... ' जन्तर-मन्तर काली कलन्तर"...  
"ऒह!...समझ गई...समझ गई"..बीवी का ट्यूबलाईटी अचनक फक्क  से रौशन हो उठा  
बस!..फिर क्या था?...मोटी कमाई के चक्कर में बीवी के बटुए का मुंह खुल चुका था। इसलिए ज़रूरी सामान इकट्ठा करने के बहाने उससे पैसे ले मैं चल पड़ा बाज़ार। पहले ठेके से दारू की बोतल खरीदी और फिर जा पहुंचा बाज़ू वाले कबाड़ी की दुकान पर। एक-दो पेग मरवाए उसे और अपने मतलब की रद्दी छांट लाया। अब दिन-रात एक करके हम मियां-बीवी उन कतरनो का एक-एक अक्षर चाट गए और इस नतीजे पर पहुंचे कि...पूरी दुनिया में इससे आसान काम तो कोई और हो ही नहीं सकता।

अब आप पूछोगे कि...."वो भला कैसे?" 
तो ये भाला मैं आपको क्यों बताऊं और अपने पैरों पे ख़ुद ही कुलहाड़ी मार लूं?....कहीं मुझसे ही कॉम्पिटीशन करने का इरादा तो नहीं है ना आपका?".. 

"क्या कहा?.... चिंता ना करूँ?
"ठीक है!...जब बीवी पर विश्वास करते हुए उसे सब कुछ सच बता दिया था तो आपसे क्या छिपाना?...आपको भी उसी टोन...उसी लैंगवेज़ मे सब कुछ वैसे ही समझा देता हूँ जैसे बीवी को समझाया था"..
"आप भी तो अपने ही हैं...कौन सा पराए हैं?".
"कुछ ख़ास मुश्किल नहीं है ये सब.... बस!...सिम्पल-सी कुछ बातें गांठ बांध लो कि...
  • हर बंदा अपने को अच्छा और बाक़ी सबको बुरा समझता है...  
  • हर-एक को यही लगता है कि वह सही है और बाक़ी सब ग़लत...
  • कोई उसे सही ढंग से समझ ही नहीं पाया आज तक...
  • वह अपनी तरफ़ से कड़ी मेहनत करता है लेकिन उसे उसका पूरा फल नहीं मिलता...
  • सब के सब उसकी कामयाबी से जलते हैं...
  • कोई उसका भला नहीं चाहता...
  • दोस्त-यार...रिश्तेदार...भाई-बहन...पड़ोसी...सब के सब मतलबी हैं...कोई उसकी ख़ुशी से ख़ुश नहीं हैं...
  • वह सब पर तरस ख़ाता है, लेकिन कोई उस पर नहीं...
  • किसी ने उस पर कोई जादू-टोना किया हुआ है... या फ़िर...
  • उसकी दुकान या मकान को बांध दिया है...
"सामने वाले का चौख़टा देख कर अंदाज़ा लगाओ कि उस पर कौन-कौन से डायलॉग फ़िट बैठेंगे?..बस!...चौखटा देखो और मार दो हथौड़ा"...
"यहाँ मेरी इस बात से कहीं ये मतलब ना निकाल लेना कि सामने वाले का चौखटा देखते ही उस पर ज़ोर से हथौड़ा धर देना है...ऐसा करने कि कभी सोचना भी मत...हमेशा के लिए अंदर हो जाओगे"...
"समझ गए ना कि चौखटा देख के सिर्फ डायलाग ही मारने हैं..ईंट-पत्थर या हथौड़े नहीं?"...
"ओ.के!...मुझे आपसे यही उम्मीद भी थी"..
"अगर तीर सही निशाने पर लगा तो समझो कि अपनी तो निकल पड़ी".. 
"अब आप पूछेंगे कि ...अगर निशाना ग़लत लगा तो?" 
"तो उसके लिए...फिकर नॉट... घुमा-फिरा कर 2-4 डायलॉग और मार दो बस...कोई ना कोई तो अटकेगा ज़रूर"..
"और हाँ!... अगर ऊंचे लैवल का गेम खेलना है...तो दो-चार चेले-चपाटे भी साथ रख लो...एक-आध चेली भी मिल जाए तो कहना ही क्या?"...
"अगर कोई ना मिले तो?"..
"चौक से ही दिहाड़ी पर पकड़ लाओ...बड़े बे-रोज़गार हैं अपने देश मे...कोई ना कोई अपने मतलब का मिल ही जाएगा पर हाँ!...इतना ज़रूर ध्यान रखना कि....चेला रखना है...गुरु नहीं"... 
?...?...?..?..
"कहीं ऐसा ना हो कि अगले दिन ही वो तुम्हारे सामने तेल की शीशी और चटाई लिए बैठा...तुम्हारा ही बंटाधार करता नज़र आए"...
"एक ज़रूरी बात...चौक पर बिकने वाला तोता अगर मिल जाए, तो धंधे में और रौनक आ जाएगी"...
"वो कैसे?"...
"कुछ खास नहीं..बस!..तोते को भूखा रखना है और... भविष्य की पर्चियों पर अनाज का दाना चिपका देना है।पंछी बेचारा तो भूख के मारे अनाज के दाने वाली पर्ची उठाएगा और बकरा बेचारा बस यही समझेगा कि मिट्ठू महाराज ने उसका नसीब बांच दिया है"..
"और उस पर्ची के अंदर लिखा क्या होगा?" ...
" हे भगवान!...आप तो हूबहू मेरी बीवी के ही अंदाज़ मे पूछ रहे हैं...इरादा तो ठीक एव नेक है न आपका?...
"कमाल है!...जैसे पूरी रामायण खत्म होने के बाद वो पूछ रही थी कि ..." सीता...राम की कौन थी?" 
"आप भी उसी टोन ...उसी लय मे पूछ रहे हैं कि पर्ची के अंडा क्या लिखा होगा?"...
"मेरा सर लिखा होगा"..
"चढ़ा दिया न बिना बात के गुस्सा?....अब खुश?"....
"ठंडक मिल गई न आपके कलेजे को?"..
"क्या कहा?...खामख्वाह नाराज़ हो रहा हूँ मैं?...गुस्से को थूक दूँ?"...
"ठीक है!...जब कभी मैं अपनी बीवी कि बात नहीं टाल सका तो आपकी कैसे टाल दूँ?"...
"ओ.के!..जैसे मैंने उसे टुट्टा सा जवाब दिया था...आपको भी वैसे ही दे देता हूँ"....
"अरी भागवान!...अभी ऊपर इतने सारे मन्तर तो बताता आया हूँ...उन्ही मे से कोई ना कोई तो ज़रूर फ़िट बैठेगा" मैं दाँत किटकिटा का उन्हे गुस्से से पीसता हुआ बोला
"हम्म!...
"लगता है कि आपकी भी समझ मे बात आ चुकी है"...
"जी"...
"तो फिर आगे कि कथा बांचू?"...
"जी"..
कैसे लोगों का फुददु खींचना है?...ये सब तरीका तो अब तक समझ आ ही चुका था इसलिए बिना किसी प्रकार के देरी किए एक दिन ऊपरवाले का नाम ले बीच बाज़ार पहुँच...ऊँचे वाले बरगद के पेड़ के नीचे अपना डेरा जा जमाया।  कोई न कोई कोई असामी रोज़ टकराने लगी। किसी को कुछ , तो किसी को कुछ इलाज बताता उसकी हर तक़लीफ़ या बीमारी का। एक से तो मैने एक ही झटके में पूरे बारह हज़ार ठग डाले थे। बड़ी आई थी मज़े से कि...
"महाराज!...बच्चा नहीं होता है...कोई उपाय बताओ"
मैंने सोचा कि..."अगर नहीं होता है तो कुछ 'ओवर-टाइम' लगाओ....'माल-शाल' खाओ और अगर फिर भी बात नहीं बनती है तो किसी अच्छे डॉक्टर-शॉक्टर के पास जाओ। ये क्या कि सीधे मुंह उठाया और ज्योतिषी के पास चली आई?"
"अब यार!..अपने घर की ड्यूटी तो ढंग से बजाई नहीं जाती अपुन से,...ऊपर से ओवरटाइम कौन कमबख्त करता फिरे??"...
"लेकिन मंदा है...फिर भी...धंधा तो धंधा है"...
"सो!...उस बेचारी को कुछ उलटी-पुलटी चीज़ें बताई लाने के लिए जैसे...
  •  काली शेरनी का दूध...
  •  जंगली भैंसे का सींग ...
  •  शुतुर्मुर्ग का कलेजा और न जाने क्या-क्या...
 मुँह उतर आया उस बेचारी का कि..."मैं अबला नारी...ये सब लाना मुझे पड़ेगा बहुत भारी"... 

"कहाँ से लाऊंगी ये सब?"... 
"मौके कि नज़ाकत को भाँप मैंने उसे ढांढस बंधाते हुए कहा..." आप चिंता ना करें...परसों...मेरा शागिर्द नेपाल कि तराई के जंगलो से आनेवाला है...उसे ही संदेशा भिजवा देता हूँ...वही लेता आएगा"...

उसने हामी भर दी...और चारा भी क्या था उसके पास? नकद गिन के पूरे बारह हज़ार धरवा लिए...फिर जाने दिया उसे। मोटी-कमाई तो हो ही चुकी थी...सो!...मैंने भी वक्त गँवाना ठीक नहीं समझा और झट से अपना झुल्ली- बिस्तरा संभाल चल पड़ा घर की ओर। रस्ते में विलायती की पेटी ले जाना नहीं भूला। ख़ुश बहुत था मैं उस दिन, बस!...पीता गया, पीता गया। कुछ होश नहीं कि कितनी पी और कितनी नहीं पी?...जब होश आया तो बीवी ने बताया कि...
" पूरे तीन दिन तक टुल्ली रहे आप...ख़ूब उठाने की कोशिश की लेकिन कोई फ़ायदा नहीं...इधर से उठाऊँ तो उधर जा के पसर जाओ...उधर से उठाऊँ तो इधर आ के लंबलेट हो जाओ" 
"तो क्या?...पूरे तीन दिन दुकान बन्द रही?" 
"और नहीं तो क्या?"...
"ओह!...मैं एक झटके से खुद को झटक कर उठ खड़ा हुआ और भाग लिया सीधा दुकान की ओर। पूरे रास्ते यही सोचे जा रहा था कि तीन दिन में पता नहीं कितने का नुक़सान हो गया होगा? कुछ दिनो कि जीतोड़ मेहनत के बाद हाथ कुछ जमने सा लगा था। नतीजन!...गलती से या पता नहीं कैसे मेरे तुक्के सही निशाने पे लगने लगे थे"...
मैंने भी सोच जो लिया था कि....
"लग गया तो तीर...नहीं तो तुक्का सही...बीड़ी नहीं...तो हुक्का सही"..
"मेरे अजीबोगरीब इलाजों से किसी-किसी को थोड़ा-बहुत फ़ायदा भी होने लगा लेकिन 8-10 बार शिकायत भी आई कि...
"महाराज!...आपकी तरकीब तो काम न आई...कोई और जुगाड बताओ"...
ऐसे बकरों का तो मुझे बेसब्री से इंतज़ार रहता था। एक ही पार्टी को दो-दो दफा जो शैंटी-फ्लैट करने का मज़ा कुछ और होता है। उनके द्वारा किए गये इलाज में कोई न कोई कमी ज़रूर निकालता और नये सिरे से बकरा हलाल होने को तैयार। पुरानी कहावत भी तो है कि...
"खरबूजा चाहे छुरी पर गिरे या फ़िर छुरी खरबूजे पर... कटना तो खरबूजे को ही पड़ता है"... 

अपुन का कॉन्फिडेंस 'टॉप-ओ-टॉप' बढता ही जा रहा था कि एक दिन अचानक एक 'जाट-मोलढ' टकरा गया.... 
पूरी राम कहानी सुनने के बाद मैंने उससे...उसकी परेशानी का इलाज बताने के नाम पर 2 हज़ार माँग लिए। जाट ठहरा जाट...पट्ठा..सौदेबाज़ी पर उतर आया। खूब हील-हुज्जत के बाद आख़िर में सौदा 450 रुपये में पटा। उसने धोती ढीली करते हुए जो नोट निकाले, तो जनाब...मेरी आंखें तो फटी की फटी ही रह गईं। नज़र धोती में बंधी नोटों की गड्डी पर जो जा अटकी थी लेकिन अब क्या फ़ायदा?...जब चिड़िया चुग गयी खेत। मैं तो यही सोचे बैठा था कि बेचारा ग़रीब मानुस है...इसे तो कम से कम बख्श ही दूं"...

"आख़िर!...ऊपर जाने के बाद वहाँ भी तो अपने हर अच्छे-बुरे कर्म का हिसाब देना पड़ेगालेकिन यह बांगड़ू तो मोटी आसामी निकला"...

"उफ़!...यहीं तो मार खा गया इंडिया"... 
साढ़े चार सौ जेब के हवाले करते हुए मुंह से बस यही निकला..."ताऊ!...काम तो करवा रहे हो पूरे अढाई हज़ार का और नोट दिखा रहे हो टट्टू?" 

"बेटा!...टट्टू तो तुमने अभी देखा ही कहाँ है?..वो तो अब मैं तुम्हें दिखाऊंगा" कहते हुए उसने किसी को इशारा किया और तुरंत ही मेरे चारों तरफ़ पुलिस ही पुलिस थी...
"स्साले हरामखोर!...पब्लिक का फुद्दू खींचता है?....अब बताएंगे तुझे...चल थाने"...
"बड़ी शिकायतें मिली हैं तेरे खिलाफ़"...
"स्साले!...वो S.H.O साहेब की मैडम थीं, जिससे तूने बारह हज़ार ठगे थे"...
"चल!...चल अब थाने...हम तुझे बताएंगे कि ....
"बच्चा कैसे होता है?"...
राजीव तनेजा

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शनिवार, 9 जनवरी 2010

साली के बाद अब पत्नी भी आईं पान दुकान में

पत्नी जी मीठा मसाला पान खाने की शौकीन तो हैं पर कभी पान दुकान में आकर नहीं खातीं, अक्सर हम ही ले जाते हैं उनके लिये ताकि वे खुश हो जायें। जब बहुत अधिक खुश करना होता हैं उन्हें तो चांदी के वर्क में लिपटी पान ले कर जाते हैं। पर आज वे पान दुकान में कैसे आ गईं? शायद हमारी साली याने कि अपनी बहन को खोजते खोजते आई होंगी।

हम तो भई, पत्नी को परमेश्वर मानते हैं क्योंकि हम तो वही करते हैं जो हमारे आदरणीय श्री गोपाल प्रसाद व्यास जी कहते हैं, और वे कहते हैं:

पत्नी को परमेश्वर मानो

गोपाल प्रसाद व्यास

यदि ईश्वर में विश्वास न हो,
उससे कुछ फल की आस न हो,
तो अरे नास्तिको! घर बैठे,
साकार ब्रह्‌म को पहचानो!
पत्नी को परमेश्वर मानो!

वे अन्नपूर्णा जग-जननी,
माया हैं, उनको अपनाओ।
वे शिवा, भवानी, चंडी हैं,
तुम भक्ति करो, कुछ भय खाओ।
सीखो पत्नी-पूजन पद्धति,
पत्नी-अर्चन, पत्नीचर्या
पत्नी-व्रत पालन करो और
पत्नीवत्‌ शास्त्र पढ़े जाओ।
अब कृष्णचंद्र के दिन बीते,
राधा के दिन बढ़ती के हैं।
यह सदी बीसवीं है, भाई!
नारी के ग्रह चढ़ती के हैं।
तुम उनका छाता, कोट, बैग,
ले पीछे-पीछे चला करो,
संध्या को उनकी शय्‌या पर
नियमित मच्छरदानी तानो!!
पत्नी को परमेश्वर मानो!

तुम उनसे पहले उठा करो,
उठते ही चाय तयार करो।
उनके कमरे के कभी अचानक,
खोला नहीं किवाड़ करो।
उनकी पसंद के कार्य करो,
उनकी रुचियों को पहचानो,
तुम उनके प्यारे कुत्ते को,
बस चूमो-चाटो, प्यार करो।
तुम उनको नाविल पढ़ने दो
आओ कुछ घर का काम करो।
वे अगर इधर आ जाएं कहीं ,
तो कहो-प्रिये, आराम करो!
उनकी भौंहें सिगनल समझो,
वे चढ़ीं कहीं तो खैर नहीं,
तुम उन्हें नहीं डिस्टर्ब करो,
ए हटो, बजाने दो प्यानो!
पत्नी को परमेश्वर मानो!

तुम दफ्तर से आ गए, बैठिए!
उनको क्लब में जाने दो।
वे अगर देर से आती हैं,
तो मत शंका को आने दो।
तुम समझो वह हैं फूल,
कहीं मुरझा न जाएं घर में रहकर!
तुम उन्हें हवा खा आने दो,
तुम उन्हें रोशनी पाने दो,
तुम समझो ‘ऐटीकेट’ सदा,
उनके मित्रों से प्रेम करो।
वे कहाँ, किसलिए जाती हैं-
कुछ मत पूछो, ऐ ‘शेम’ करो!
यदि जग में सुख से जीना है,
कुछ रस की बूँदें पीना है,
तो ऐ विवाहितो, आँख मूँद,
मेरे कहने को सच मानो!
पत्नी को परमेश्वर मानो ।

मित्रों से जब वह बात करें,
बेहतर है तब मत सुना करो।
तुम दूर अकेले खड़े-खड़े,
बिजली के खंबे गिना करो।

तुम उनकी किसी सहेली को
मत देखो, कभी न बात करो।
उनके पीछे उनके दराज से
कभी नहीं उत्पात करो।
तुम समझ उन्हें स्टीम गैस,
अपने डिब्बे को जोड़ चलो।
जो छोटे स्टेशन आएं तुम,
उन सबको पीछे छोड़ चलो।
जो सँभल कदम तुम चले-चले,
तो हिन्दू-सदगति पाओगे,
मरते ही हूरें घेरेंगी,
तुम चूको नहीं, मुसलमानो!
पत्नी को परमेश्वर मानो!

तुम उनके फौजी शासन में,
चुपके राशन ले लिया करो।
उनके चेकों पर सही-सही
अपने हस्ताक्षर किया करो।
तुम समझो उन्हें ‘डिफेंस एक्ट’,
कब पता नहीं क्या कर बैठें ?
वे भारत की सरकार, नहीं
उनसे सत्याग्रह किया करो।
छह बजने के पहले से ही,
उनका करफ्यू लग जाता है।
बस हुई जरा-सी चूक कि
झट ही ‘आर्डिनेंस’ बन जाता है।
वे ‘अल्टीमेटम’ दिए बिना ही
युद्ध शुरू कर देती हैं,
उनको अपनी हिटलर समझो,
चर्चिल-सा डिक्टेटर जानो!
पत्नी को परमेश्वर मानो।

व्यास जी की यह रचना मुझे मेरे स्कूल के दिनों से ही पसंद है। आपको कैसी लगी यह लंबी कविता?

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गुरुवार, 7 जनवरी 2010

बात महिमावान उंगली की ...

बड़ी जोरदार ठण्ड पड़ रही है . घूमते घूमते अपुन आज पान की दूकान पे पहुँच गए . देखा तो पान वाला भी ठण्ड से ठिठुर रहा था . तबई अचानक गिरीश जी की जा बात जेहन में कौंध गई की हमें हर मामले में उंगली करनें में महारत हासिल है और मैंने भी ठान लिया की इस वार्ता को मै आगे बढ़ा दूं.

मैंने सोचा की क्यों न पान वाले को उंगली बताई जाय ... जैसे मैंने उंगली उठाई तो पान वाला बोला - उंगली काय उठा रहे हो ...सीधे सीधे बताओ बाबू कैसा पान लगा दूं .

मैंने डकार लेते हुए कहा जरा पान में कतरी, पिपरमेंट और सौप डाल देना . फिर मैंने पान वाले से कहा तुम्हे मालूम है की मैंने तुम्हे काय उंगली बताई थी . आजकल उंगली की महिमा बढ़ गई है .उंगली है बड़ी काम की चीज . उंगली बताकर किसी को चिढाया जा सकता है .

उंगली बताकर चुनौती भी दी जाती है . श्री कृष्ण ने उंगली बताकर जरासंघ को दो फाड़ करवा दिया था . कोई अच्छा भला खा पी रहा हो तो उसकी गा... एंड में उंगली कर दो बस फिर उसका खूब धुआं देखो और खूब आंच सेको और खूब हा हा हा करो..

कुछ लोगो की बिना बात के उंगुली करने की आदत होती है जो बिना वजह किसी को भी उंगली करते रहते है . देखो जा बात नेट पे तो बहुतई देखी जा रही है....बड़े बड़े पुराने धुरंदर नामी गिरामी चिटठाकार किसी नये या पुराने ब्लागर की खिल्ली उड़ाने के लिए बेवजह उंगली कर देते है . यह बात भी भूलने लायक नहीं है की एक उंगली उठाकर एम्पायर खिलाडी को आउट करार दे देता है ..

विपाशा बासु कम कपडे पहिनकर जब हाथ उठाकर उठाकर उंगली बता कर जब नाचती है तो दीवाने थिरकने लगते है तो दूसरी और संस्कारी बूढ़े विपाशा को कम कपडे पहिनने पर उंगली उठा उठाकर कोसते है . पान वाले ने कहा - भैय्या बहुत तै हो गई...अब जा बताओ भाई ललितजी और बाबा लंगोतानद नहीं दिख रहे है ?

मैंने मुस्कुराकर पान वाले से कहा - भैय्ये ठण्ड ज्यादा पद रही है कही उंगली कर रहे होंगे.
इस बात पर पान वाले और मैंने जोर का ठहाका लगाया और मैंने वहां से हंसते हंसते बिदा ली .


चर्चा पान की दूकान पर - महेंद्र मिश्र जबलपुर वालो द्वारा

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