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मंगलवार, 23 मार्च 2010

तमीज से बात कर बे.....कस्टमर से ऐसे बात करते

टयूसन वाले सर बोले ----- अबे गधे होम वर्क क्यों नहीं करता तू?????
तो बच्चा बोला ------ तमीज से बात कर बे.....कस्टमर से ऐसे बात करते हैं 
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टीचर ने पुछा ---- बताओ जो लोग गंदे काम करते हैं वो कहाँ जातें हैं???
छात्र --- जी बुद्धा गार्डेन, लोधी गार्डेन, पुराना किला, जापानी पार्क.........
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मुर्गा बोला --- आइ लव यू मेरी जान......तेरे लिए कुछ भी करूँगा.....
मुर्गी बोली ---- हाय मैं मर जावा.....सच क्या ???
मुर्गा बोला --- हाँ मेरी जान 
मुर्गी बोली --- तो चल फिर अंडा दे आज से..............
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मैडम ने बोला ---- टुन्नू दस तक गिनो तो एक पप्पी दूंगी.....
टुन्नू ------ अगर १०० तक गिनू तो क्या मिलेगा???????
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संता अंडरवेअर लेने दुकान पर जाता हैं और एक अंडरवेअर चुन लेता हैं 
दुकानदार --- यह पांच सौ का हैं 
संता --- अबे  डेलीवेअर चाहिए पार्टी वेअर नहीं...........
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संता नहा रहा था!!!!!!!!!!
बंता ने आवाज लगाई..........संता ऐसे ही बाहर आ गया 
बंता बोला --- कुछ तो पहन लेता यार!!!!
संता अन्दर गया और हवाई चप्पल पहन कर आ गया

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सोमवार, 21 दिसंबर 2009

बोया पेड़ बबूल का

***राजीव तनेजा***
चेहरा उदास हो चला था और माथे से  पसीना रुकने का नाम नहीं ले रहा था…कंपकपाते हुए हाथों से फोन को वापिस रख मैँ निढाल हो वहीं सोफे पे धम्म जा गिरा|सोच-सोच के परेशान हुए जा रहा था कि क्या होगा?....कैसे होगा?...कैसे मैनेज करुंगा सब का सब? कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि क्या किया जाए? और कैसे किया जाए? बार-बार ऊपरवाले को याद कर यही प्रार्थना किए जा रहा था कि काश!…ये होनी टल जाए किसी तरह|उनका आना कैंसल करवा दे भगवान|इक्यावन!… पूरे इक्यावन रुपए का प्रसाद चढाउंगा|सच ही तो कहा है किसी नेक बन्दे ने कि …”जब आफत लगी टपकने...तो खैरात लगी बटने"
अन्दर ही अन्दर सोच रहा था कि पहले काम तो बने ...फिर देखुंगा कि 'इक्यावन' का चढाऊँ के 'इक्कीस' का?..या फिर 'ग्यारह' में भी क्या बुराई है आखिर? भोग ही तो लगाना है बस। बाकी पाड़ना तो उसे अपुन जैसे हाड-माँस के इनसानों ने ही है।सो!....कुछ कम या ज़्यादा से क्या फर्क पडने वाला है?वैसे  भी पत्थर की मूरत को क्या खबर कि 'देसी' की खुशबू क्या है और 'डाल्डा' कि क्या?
हाँ!...मुझ पागल को ही फोन उठाना था उनका...मति तो मेरी ही मारी गयी थी ना जो फ्री इनकमिंग के लालच में चार-चार फोन लगवा डाले और रौब झाडने के चक्कर में मामाजी को उन सभी के नम्बर थमा बैठा।अब एक पैसा प्रति सैकैंड का कॉल हो तो बंदा तो बेवाकूफी कर ही बैठेगा ना?सो!...मैँ भी कर बैठा।इसमें कौन सी बड़ी बात है?
क्या ज़रूरत पड़ गई थी मुझे इतनी जल्दी उनका एहसान उतारने की?अच्छे-भले मुम्बई में बैठे-बैठे 'राज ठाकरे' के आंतक का मज़ा ले रहे थे...लगने देता उनकी वाट...मेरा क्या जा रहा था?.. लेकिन नहीं...पागल कुत्ते ने काटा था ना मुझे जो मैँ उन्हें उसके ताप से बचने के लिए कुछ दिन दिल्ली में आ हमारे साथ...हमारे घर में बिताने की युक्ति सुझा बैठा।सुनते ही बांछे खिल उठी थी उनकी...उसके बाद तो लगे दे पे दे फोन करने लगे एक के बाद एक...मुझे तभी समझ जाना चाहिए था कि बेटा राजीव...तू तो गया काम से...अब भुगत...
अब अगर किसी बन्दे से अनजाने में कोई गलती हो भी गई तो बच्चा समझ के माफ कर दो उसे...ये क्या कि उसकी बात को गाँठ में बाँध..पत्थर की लकीर समझ लो और पड़ जाओ हाथ थो के उसके पीछे? अपने...खुद के..सगे वालों का ही तो बच्चा है... कोई पराई औलाद तो नहीं कि ले बेटा...तू ये भी और वो भी?...
उफ!..अब स्साला...एक फोन ना उठाओ तो मिनट से पहले दूजे की घंटी बज उठती है....दूजा ना उठाओ तो तीजे पे और  तीजा ना उठाओ तो  चौथा गला फाड़ चिंघाड़ने लगता है।मैँ तो तंग आ गया हूँ इन मुसीबत के मारे मोबाईल फोनों से।स्सालों!...ने एक पैसा पर सैकेंड का पंगा डाल पंगू बना डाला पूरी इनसानी जमात को।पहले कितना अच्छा था ना कि रीचार्ज ना करवाओ तो पट्ठे तुरंत ही लाईन कट कर  डालते थे कि..."ले बेटा!...हो जा आज़ाद... कोई तंग नहीं करेगा अब"
और अब?...अब भले ही जेब में इकलौती चवन्नी गुलाटियाँ मार कलाबाज़ियाँ खाने में शर्म महसूस कर रही हो लेकिन फोन वही ढीठ का ढीठ....सुसरा...चालू का चालू...बन्द होना तो जैसे भूल ही गया हो।अब इसे ...बैलैंस हो ना हो से कोई फर्क नहीं पड़ता।किसी को गोली देने लायक भी तो नहीं छोड़ा पट्ठों ने कि...."भैय्या मेरे...'फोन' में बैलैंस नहीं था....सो!..बन्द हो गया...कैसे बात करता आपसे?"
                                      अच्छा  झुनझुना थमाया है पट्ठों ने ये लाईफ टाईम वाला ...पता भी है इस संसार में हर चीज़ नश्वर है...हमारे...आपके ...सबके समूचे कुल ने नाश हो जाना है एक दिन... लेकिन इन्हें अकल हो तब ना...कोई जा के इनसे पूछे तो सही कि "क्या ज़रूरत थी इनको मोबाईल की लाईफ अनलिमिटिड करने की?"...."डॉक्टर ने ऐसा करने को कहा था या फिर कमाई हज़म नहीं हो रही थी?"...अगर नहीं हो रही थी तो मुझसे से कहते..मैँ काम आ जाता तुम्हारे...अपना चुपचाप आपस में मिल बाँट के खा लेते और किसी को कानोंकान खबर भी नहीं होती लेकिन वो कहते हैँ कि देवर को नहीं ....भले ही खूंटे से....
खैर!...लाईफ अनलिमिटिड कर दी..सो कर दी...जब चिड़िया चुग गई खेत तो अब किया ही क्या जा सकता है? लेकिन कोई मुझे बताएगा कि क्या ज़रूरत पड़ गई थी इन्हें कॉल रेट कम करने की?...बेवाकूफ के बच्चे!...इतना भी नहीं जानते कि कॉलें सस्ती करने से भी लोगों की नीयत में फर्क नहीं पड़ता।मिस्ड कॉल मारने वाले तो अभी भी मिस्ड कॉलें ही मार रहे हैँ ना? कि ले बेटा!..अपना काम तो कर दिया हमने...अब तू भी अपना कर्तव्य निभा" ...
"स्साले!...दुअन्नी छाप कहीं के"... 
"पैसे कौन भरेगा?...तुम्हारा बाप?"...
"कान खोल के सुन लो सब के सब...पैसे पेड़ पर नहीं उग रहे मेरे और ना ही मेरा बाप कोई चलता मिल छोड गया है कि... "ले बेटा ...तू उड़ा...मौज कर...मैँ हूँ ना"..
"अब अगर कोई लडकी मिस्ड काल करे तो बात समझ में भी आती है कि लिपिस्टिक-पाउडर के लिए पैसे बचा रही होगी और फिर उनका फोन हम उठाएँ भी तो किस मुँह से?...शर्म नहीं आएगी हमें?...
गर्ज़ जो अपनी है कि कहीं पट्ठी नाराज़ हो के किसी और के साथ ही चोंच लड़ाने में मस्त ना हो जाए।बड़ी ही कुत्ती शै है ये औरत ज़ात भी...इनकी 'हाँ' में भी कहीं ना कहीं 'ना' छुपी रहती है...कोई भरोसा नहीं इनका...हम इस मुगालते में भरी दोपहरी सड़क किनारे खड़े-खड़े काट देते हैँ कि अब आएगी...अब आएगी और बाद में पता खुफिया सूत्रों के जरिए चलता है कि महारानी साहिबा आज किसी नए पंछी के साथ  कम्पनी बाग के कोने वाले झुरमुट में कुछ गैर ज़रूरी मसलों पर गुटरगूं करते हुए ज़मीन पे बिछी हुई मखमली खास का बेरहमी से कत्लेआम कर रही थी।...
इसलिए भइय्या!...ये चाहे मिस्ड कॉल करें या फिर फिस्ड कॉल करें और चाहें तो कुछ भी ना करें...हम तो इन्हें ज़रूर फोन करेंगे...बिलकुल करेंगे...डंके की चोट पे करेंगे ..अब ऐतने बुरबक्क तो नहिए हैँ ना  हम कि रुपये दो रुपये बचाने की खातिर पूरा लड्डू ही हाथ से गवाँ बैठें?
                                      बस यही बुदबुदाते हुए पता ही नहीं चला कि कब आँख लग गयी।जाने कैसा शोर था? कि मैँ अचानक चौंक के उठ खडा हुआ।वही हुआ जिसका मुझे डर था...मोबाईल ही घनघना रहा था।'डेट'...'कन्फर्म हो चुकी थी उनके आने की।निर्दयी...निर्मोही ऊपरवाले ने एक ना सुनी और कर डाली अपनी मनमानी।लाख माथा फोड़ा उसके आगे लेकिन कोई फायदा नहीं...
"कर ली उसने अपने दिल की पूरी...निकाल ली अपनी भड़ास"...
मैँ तो ऐसे ही मज़ाक-मज़ाक में मज़ाक कर रहा था कि 'इक्यावन' या 'इक्कीस' और इन्होंने झट से बुरा भी मान लिया।भला!...'डाल्डा' का प्रसाद भी कोई चढाने लायक होता है?....जो मैँ चढाता?अब ये क्या बात हुई कि...वो खुद...पूरी ज़िन्दगी हमसे मज़ाक पे मज़ाक करता फिरे तो कोई बात नहीं?...हमने ज़रा सी ठिठोली क्या कर ली,...यूँ मुँह फुला के बैठ गये जनाब जैसे मैने कोई बहुत बड़ा गुनाह कर डाला हो...पाप कर डाला हो।अच्छी तरह!...अच्छी तरह मालुम है मुझे भी और उन्हें भी कि चलेगी तो उनकी ही....सर्वशक्तिमान जो ठहरे...इसीलिए चौड़े हो रहे हैँ।
हाँ-हाँ!...और चौड़े होओ...खूब चौड़े होओ।इस अदना से बन्दे की रज़ा पूछने की ज़रूरत ही क्या है?...वो लगता ही क्या है तुम्हारा?...और फिर इन्हें फर्क भी क्या पडता है कि इनके राज में कोई मरे या जिए?    
इनकी बला से मैँ कल का मरता आज मर जाऊँ...इन्हें कोई फिक्र नहीं...कोई परवाह नहीं।
"हुँह!..खुद तो ऊपर...मज़े से...गद्देदार सिंहासन पे विराजमान बैठे हैँ सबकी ज़िन्दगियों का फैसला करने के लिए और यहाँ?...यहाँ नीचे वालों की कोई चिंता ही नहीं...कोई सुध ही नहीं है जनाब को।
"अरे!...जो आपका काम है...उसे ही मस्त हो के करो ना भाई"..
"काहे को दूसरे के फटे तंबू में अपना बम्बू फँसाते हो?"...
"नेकी करते जाओ और कुँए में डालते जाओ"...बचपन से यही सुनते-सुनते कान पक गए हैँ हमारे।अपनी सीख हमें सिखाते हैँ और खुद ही भूले बैठे हैँ जनाब।पूरी ज़िन्दगी का ठेका इन्होंने ही ले लिया हो जैसे।हर बंदे का हिसाब-किताब ऐसे सम्भाल के रखते हैँ मानो गर्ल-फ्रैंड्ज़ के मोबाईल नम्बर कि...एक भी ना छूट जाए कहीं भूले से भी।
अब फलाने ने ये-ये अच्छा किया और ये-ये बुरा...तुम्हें इससे टट्टू लेना है? अगले की मर्ज़ी ...जो जी में आए...करे लेकिन नहीं!...तुम्हें चैन कहाँ?...बस हर एक के पीछे ही पड़े रहा करो हाथ धो के...और कोई काम-धाम तो है ही नहीं ना तुम्हें?
"ठीक है!...माना कि पैदा करने वाला 'वो'...और मारने वाला भी 'वो' लेकिन ये जो बीच का वक्त है 'ज़िन्दगी' और 'मौत' के...उसे तो अपनी मर्ज़ी से जी लेने दो हमें कम से कम"
"क्या ज़रूरत पड़ जाती है आपको जो ऐसे मुँह उठा के टांग अडाने चले आते हो हमारी निजी ज़िन्दगियों के बीच में?"..
"कोई और काम-धाम है कि नहीं?"मन ही मन 'उसे' कोसते हुए पता ही नहीं चला कि वक़्त कैसे तेज़ी से सरपट दौडे चला जा रहा था। रौंगटे खडे होने को आए थे कि वो भी एक-एक चीज़ का बदला ज़रूर लेंगे।
कोई कसर बाकी नहीं रहने देंगे।आज महसूस हो चला था कि एक ना एक दिन सेर को सवा सेर ज़रूर मिलता है।सही या गलत...सब का हिसाब यहीं...इसी धरती पर ही चुकाना पडता है।ये सब अगला जन्म- वन्म सब बेकार की...बेफिजूल की बातें हैँ।इनका कोई मतलब नहीं...असलियत से इनका कोई सरोकार नहीं।जिसका जैसा मौका लगता है वो वैसा दाव चले बगैर नहीं रहता।अन्दर ही अन्दर मेरा चोर दिल कह रहा था कि आखिर तुमने भी भला कौन सी कसर छोडी थी जो अब उसकी तरफ ऐसे कातर नज़रों से टुकुर-टुकुर ताक रहे हो?...
"क्या अपना खुद का माल होता तो इस बेदर्दी से उडाते?"... 
"नहीं ना?"...
"तो फिर?"...
"अब भुगतो"...
"जैसा करोगे...वैसा तो भरना ही होगा मित्र"... "
बोया पेड बबूल का तो फल कहाँ से होय?"..
"जैसी करनी वैसी भरनी"...
"खुद तो दूसरों के घर में 'नवाब सिराजुदौला' बने बैठे थे ना जनाब?...अब क्यों साँप सूँघ गया आपको?"..
"बाप का माल समझ के उड़ा रहे थे ना सब का सब?"...
"अरे!...अगर सचमुच बाप का समझा होता तो आज ये नौबत ही नहीं आती कि खुद अपनी ही करतूतों से मुँह छुपाते फिरते"
"उस वक्त अक्ल क्या घास चरने गयी थी जब फोकट का माल समझ...'राम नाम जपना...पराया माल अपना' की पालिसी पर चल रहे थे?.... हर चीज़ तो तोड-ताड के बन्ने मारी थी तुमने और तुम्हारी नालायक औलादों ने।कोई कंट्रोल-शंट्रोल भी होता है कि नहीं? या फिर बस...खुले साँड की तरह खोल डालो अपने नमूनों को कि....
"लो बच्चो!...सामने पराया खेत है....मनमर्ज़ी से रौंद डालो...कुचल डालो...तहस-नहस कर डालो"...
"क्या सोचा था उस वक्त कि...कौन सा अपने बाप का है?"...
"सैल्फ कंट्रोल भी कोई चीज़ होती है कि नहीं?...अब भुगतो"...
गलती से 'मुम्बई' आने का न्योता क्या दे बैठे मामा जी...खुद ही अपने पाँव पे कुल्हाडी चला डाली उन्होंने। उन्हें भी क्या पता था कि पक्के बेशर्मों से पाला पडा है?...न्योता मिला और पहुँच गये सीधा अगली ही ट्रेन से अपने सात बच्चों की पलटन लेकर लेकिन एक बात की तो दाद देनी ही पडेगी मित्र...माथे पे एक शिकन तक नहीं आई थी उनके और एक तुम हो कि अभी से साँसें फूलने लगी?
"बारिश के आने से पहले ही तंबू के छेद तक गिनने बैठ गये?"...
"कैसे मर्द हो तुम?"...
"किस सोच में डूबे हो?"..
"कहीं मेरी कही इन बातों का तुम पर उलटा असर तो नहीं हो रहा है ना मित्र?"...
"मेरी बातों में आ के कहीं तुम उनके स्वागत की तैयारी के बारे में तो नहीं सोचने लगे ना?"...
"क्या कहा?"...
"अक्ल कहीं घास चरने  तो नहीं चली गई तुम्हारी?...पता भी है कि कितने की वाट लगेगी?"...
"तो फिर तुम्हीं बताओ कि मैँ क्या करूँ?"...
"ये?...ये तुम मुझ से पूछ रहे हो?"...
"यूँ!...यूँ हाथ पे हाथ धरे रहने से कुछ नहीं होगा जनाब...कुछ सोचो"..
"सोचो कुछ...दिमाग के घोडे दौड़ाओ...कोई तो तरकीब होगी इस मुसीबत से निकलने की"...
"याद रखो...इस दुनिया में नामुमकिन कुछ भी नहीं है...कोई ना कोई हल तो निकलेगा इस मुसीबत का"...
"हाँ!...ज़रूर निकलेगा"..
"क्या करूँ?...कहाँ जाऊँ?..कुछ समझ नहीं आ रहा है"... 
"यैस्स!...यैस...यैस...एक आईडिया है"..
"हाँ!...
"हाँ-हाँ!...यही ठीक भी रहेगा..घर को ही 'ताला' लगा खिसक लेता हूँ कहीं बच्चों समेत...ना होगा बाँस और ना ही बजेगी मेरी बाँसुरी"...
"उफ!...ये स्साला...ऐन टाईम पे कुछ सूझ ही नहीं  रहा है कि कहाँ जाऊँ?...किसके घर जा के डेरा जमाऊँ?"...
"कम्बख्त!...किसी का न्योता भी तो नहीं आया इस बार कि वहाँ जा के लौट लगाऊँ"...
"हाँ-हाँ!..पिछले साल का भूला नहीं हूँ मैँ..बिना न्योते के ही जा पहुँचे थे चाचा जी के घर....आगे मुँह चिढाता ताला लटका मिला था। लेने के बजाए देने पड गए थे...आमदनी दुअन्नी भी नहीं और खर्चा चोखा...पूरे रास्ते बीवी के ताने सुनने पडे...सो अलग" ...
"या एक काम क्यों नहीं करता मैँ?...यहीं-कहीं...आस-पास ही जा के छुप जाता हूँ...कैसा रहेगा?"... "नहीं!...बिलकुल नहीं...ये ठीक ना होगा...अपने घर से ही मुँह छिपाता फिरूँ?"...
"लोग क्या कहेंगे?..और फिर इसमें समझदारी ही कहाँ की है कि मैँ अपने ही घर में छुप-छुपाई खेलता फिरूँ?"..
"तो फिर तुम्हीं बताओ कि मैँ क्या करूँ?"....

"क्या करूँ?...क्या करूँ?...करने से कुछ नहीं होगा...कोई ना कोई चक्कर तो ज़रूर चलाना पडेगा और वो तुम्हें ही चलाना पड़ेगा"...
"हाँ!...मैँ तुम्हारा लगता ही कौन हूँ?...तुम तो मेरी मदद करने से रहे"...

"मुझे ही कुछ करना पड़ेगा"...
"तो फिर सोच क्या रहे हो?...कुछ करते क्यों नहीं?"...
"इतनी देर से सोच ही तो रहा हूँ...झक्क थोड़े ही मार रहा हूँ"...
"ठीक है!...तो फिर सोचो...सोचो!...खूब सोचो"...
"हाँ!...एक आईडिया और है"...
"क्या?".. 
"हाँ!...यही ठीक है और...यही ठीक भी रहेगा"... 
"हमेशा के लिए ही रास्ता बन्द... नंगपना दिखा के एक ही बार में पक्का बेशर्म बन जाता हूँ"... 
"पैसे बचाने में कैसी शर्म?"
"अगर समझदार होंगे तो तुरंत ही अपना 'झुल्ली-बिस्तरा' सम्भाल 'मुम्बई' वापसी का टिकट कटवा लेंगे"...

"और अगर तुम्हारी तरह बेवाकूफ हुए तो?"...
"तो फिर किसी नई जगह पर...नए लोगों से ...नई तरह की रिश्तेदारी गांठने की कोशिश कर रहे होंगे...मेरे यहाँ तो शरण मिलने से रही"...
"गुड!...वैरी गुड लेकिन ऐसे सर्दी के मौसम में वो आखिर जाएँगे कहाँ?"...
"क्या बात?...तुम्हें बड़ी चिंता हो रही है"...
"म्मुझे?...मुझे भला क्यों चिंता होने लगी...रिश्तेदार तो तुम्हारे हैँ"...
"और तुम किसके हो?"..
"ये क्या बात हुई कि तुम किसके हो?"...पता भी है कि मैँ तुम्हारा अंतरमन हूँ...तुम्हारी आत्मा हूँ..जब तक तुम जीवित हो याने के परमात्मा से मिल नहीं जाते ..तब तक मैँ तुम्हारे साथ...साथ ही रहने वाला हूँ"...
"तो फिर मेरी मदद क्यों नहीं करते?"...
"कर ही तो रहा हूँ"...
"कैसे?"...
"ये जो तुम्हारे दिमागी भंवर में एक से एक बढकर चिंताएँ जो उमड़-घुमड़ कर उफान पैदा कर रही हैँ"....
"तो?"...
"इस उफान को उठाने वाला मैँ ही तो हूँ"...
"ओह!...मुझे लगा कि तुम मेरी साईड नहीं बल्कि मामा जी की तरफ हो?"...
"ऐसा तुमने सोच भी कैसे लिया वत्स?"...
"तुम्हें ही तो बड़ी चिंता सता रही थी कि...ऐसे सर्दी के मौसम में वो कहाँ जाएँगे?...क्या करेंगे?"....
"तो?...तुम्हारी तरह इतने निर्मोही भी नहीं हम...थोड़ी-बहुत इनसानियत तो हम आत्माओं में भी होती ही है...चाहे ऊपरी तौर पर ही सही"...
"ओ.के...ओ.के लेकिन इसे बस ऊपरी ही रहने देना....असलियत में इसका कोई वजूद नहीं होना चाहिए हमारी ज़िन्दगी में"...
"बिलकुल"...
"हाँ!...तो मामा जी से छुटकारा पाने का तुम कौन सा आईडिया सुझा रहे थे?"..
"मैँ तो ये कह रहा था कि रोज़-रोज़ के टंटे से मुक्त होने के लिए बेहतर यही होगा कि सारी शर्म औ हया त्याग हम एक बार में ही मुँहफट हो जाएँ"...
"गुड!...वैरी गुड...हमारी अच्छी सेहत के लिए मुँहफट हो जाना ही बेहतर होगा"... 
"तो फिर सीधे-सीधे फोन कर के ही कहे देता हूँ उनसे कि..."हम तो खुद ही जा रहे हैँ दो महीने के लिए 'बाबाजी' के आश्रम...बीवी की तबियत जो ठीक नहीं रहती...शायद!..'योगा-वोगा' से ही ठीक हो जाए"
"गुड!..वैरी गुड....समझदार को इशारा ही काफी रहेगा....नासमझ नहीं हैँ वो दोनों कि इतनी सी भी बात पल्ले ना पड़े..सब अपने आप समझ जाएंगे और आने से पहले ही चलते बनेंगे"...

"तो फिर मैँ चलूँ?"...
"हाँ!..बिलकुल"..
"ओ.के...बॉय"...
"बॉय"...
"अपना ध्यान रखना"...
"तुम भी"..
              अपनी मुश्किल का इतना आसान हल होता देख खुशी भरी मुस्कान अभी ठीक से चेहरे पे आयी भी नहीं थी कि मुय्या फोन फिर से घनघना उठा।मोबाईल वालों को सौ-सौ गाली बकते हुए फोन उठाया तो जो खबर मिली...सुन के...फीकी पडती मुस्कान चेहरे पे फिर से खिल उठी थी...
मामा जी का ही फोन था।खबर ही कुछ ऐसी थी कि मेरी बाँछो ने तो खिलना ही था...सो!...बिना किसी प्रकार की देरी किए वो खिल उठी। उनका आना कैंसिल जो हो गया था ....'बाबाजी' के आश्रम जा रहे थे वे दोनों...मामी की तबियत जो ठीक नहीं रहती थी आजकल
"सचमुच!...'बाबाजी' के 'योगा' में बड़ा चमत्कार है...बडी-बडी बिमारियाँ...भीषण से भीषण विकार भी जड़ से मुक्त हो जाते हैँ...कुछ ही महीनों में"... 

"अब मैँ 'मामाजी' को 'बाबा' के योगा के गुण बढ-चढ कर बता रहा था"
जय हिंद"...

***राजीव तनेजा***
rajivtaneja2004@gmail.com 
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गुरुवार, 10 दिसंबर 2009

ज़मीर जाग उठा

***राजीव तनेजा*** 
आज बीवी बडा उछल रही थी...पूछने पर खत हवा में लहराते हुए बोली..."मामा जी का खत आया है और छुट्टियों में मुम्बई बुलाया है"
"मैँ सोच में डूब गया कि 'क्या करें?....जाएं के ना जाएं?..मन तो कर रहा था कि मना कर दूँ...वजह?...खर्चा बहुत हो जाएगा।सात-सात बच्चों को लेकर मुम्बई जैसे महँगे शहर में जाना कौन सा आसान काम है?अभी सोच ही रहा था कि बीवी ने तसल्ली दी कि...."चिंता क्यों करते हो?"
"मैँ हूँ ना"...माननी पडी उसकी बात..आखिर!..घर में चलती तो उसी की ही थी ना।सो!...जाना पडा।मन ही मन सोचे जा रहा था कि बीवी वहाँ जा के पता नहीं क्या-क्या 'तमाशे' करेगी?...कौन-कौन से 'गुल' खिलाएगी?..लेकिन कुछ-कुछ बेफिक्र सा भी हो चला था मैँ..रग-रग से वाकिफ जो था उसकी।इसलिए गारैंटी तो थी ही कि किसी भी हालत में लेने के देने नहीं पडेंगे।फिर क्या था?...बस!...टिकट कटाई और चल दिये अपनी सात बच्चों की 'पलटन' ले आम्ची 'मुम्बई 'की ओर।पूरे रास्ते बीवी चहकती हुई मुझे सब समझाती जा रही थी कि..किस से?,...किस तरह? ...और कैसे पेश आना है?...वगैरा-वगैरा।प्लानिंग के मुताबिक स्टेशन पर उतरते ही उसकी तबियत ने बिगडना था ...सो!...अपने आप तबियत कुछ ना-साज़ हो चली थी उसकी।..."हाय!...मैँ मर गयी"...."हाय! मैँ मर गयी"...जो उसने कराहना शुरू किया तो फिर ना रुकी"
"मैँ आई ही क्यों?...पता होता कि सफर में इतनी दिक्कत होगी,तो हम आते ही ना"....हुकुम के गुलाम के माफिक मैँ चुप-चाप दीन चेहरा लिये उसकी 'हाँ में हाँ' मिलाता चला गया।"पूरे रास्ते उलटियाँ करते आए हैँ ये बेचारे"मेरी तरफ इशारा करते हुए बीवी बोली..."अब इनकी भी तबियत ठीक नहीं रहती न"..."लम्बा सफर सूट जो नहीं करता है इन्हे"..."लाख समझाया कि सेहत ठीक नहीं है ,सो!...इस बार रहने दें लेकिन ये माने तब ना"....कहने लगे "बहुत दिन हो गये मामा-मामी से मिले हुए...दिल उदास हो चला है"..."सुनते तो मेरी बिलकुल हैँ ही नहीं ना"... "उफ!...ऊपर से मैँ भी बिमार पड गयी"..."अब इनका ख्याल कौन रखेगा?"बीवी रुआँसी होती हुई बोली..."मामा जी!आप एक काम कर दें...
हमारा वापसी का टिकट कटवा दें"..."दिल्ली जाएंगे वापिस",...."किसी तरह इनकी तबियत ठीक हो जाए बस"बीवी ऊपरवाले को हाथ जोड विनती करती हुई बोली...."फिर कभी आ जाएंगे आपसे मिलने"..."यहाँ रहे तो आप भी नाहक परेशान होते रहेंगे हमारे लिए"...
"इतना काहे को सोच रही हो?....सब ठीक हो जायेगा"मामी बोली
"नहीं!..हम आपको परेशानी में नहीं डालना चाहते और फिर डाक्टर ने ताकीद जो की है कि जब तक ये पूरी तरह ठीक नहीं हो जाते...
तब तक इन्हें खालिस' केसर वाले दूध' और अनार के 'जूस' के अलावा कुछ नही"..."ये डाक्टर भी पता नहीं क्या-क्या परहेज़ बता डालते हैँ?...अब परदेस में भला अनार कहाँ से छीलती फिरूँगी?"
"हमारे होते हुए कैसी बातें करती हो?...चिंता ना करो...सब इंतज़ाम हो जायेगा"
"लेकिन...
"तुम बेकार में ही नाहक परेशान हो रही हो...सब चिंता छोडो और बस आराम करो"मामी बोली
"मुझे शर्म ना आएगी?...मैँ महारानी की तरह आराम से बिस्तर पे पड़ी रहूँ और आप नौकरानियों की तरह सारे काम करती फिरें"बीवी आहिस्ता से बोली....मानो अपना फर्ज़ भर अदा कर रही हो
"अब जब तबियत ठीक नहीं है तो आराम करना ही होगा ना?...तुम्हारी जगह अगर मेरी अपनी बेटी होती तो क्या उसे मैँ यूँ ही जाने देती?"
"जैसा आप उचित समझें"बीवी की छुपी हुई कुटिल मुस्कान को समझ पाना मामा-मामी के बस की बात कहाँ थी?...दिन भर तो बीवी ने कुछ खाया-पिया नहीं...बस!...सर पे पट्टी बाँधे 'हाय-हाय' कर कराहती रही और...रात को अन्धेरे में चुप-चाप ठूसे जा रही थी दबा के माल-पानी।
काम करने के नाम पे उसका सर...दर्द के मारे फटने को आता था लेकिन....खाते-पीते और घूमते-फिरते वक़्त एकदम टनाटन।अब इतने बावले भी नहीं थे हम...पता था कि कब तबियत ने ठीक होना है और कब 'नासाज़।खूब खातिरदारी हो रही थी हमारी...खाओ-पिओ और मौज करो के अलावा कोई काम नहीं था हमें।जूहू...चौपाटी...बान्द्रा...पाली हिल...फिल्मसिटी.. कोई जगह भी तो हमने नहीं छोड़ी थी।बीवी दिनभर पलंग तोडते हुए गप्पें मारती.... और मैँ सोफे पे लदा-लदा...उसकी ऐसी-तैसी करते हुए कभी ये खा....तो कभी वो पी।मामा-मामी दोनों बेचारे...दिन-रात हमारी ही तिमारदारी में लगे रहते।अपने घर में तो सब चीज़ ताले-चाबी के अन्दर थी...तो यहाँ खुला मैदान देख बच्चों का मन भी डोल गया..बाल-सुलभ जो ठहरा....रहा ना गया उनसे...टूट पडे एक-एक आईटम पर मानो ऐसा मौका फिर हाथ नहीं लगने वाला।कोई 'कप्यूटर' से पंगे ले रहा था तो...कोई 'डी.वी.डी' प्लेयर का ही बंटाधार करने पे तुला था ....कोई उनकी मँहगी किताबों के कागज़ का इस्तेमाल 'हवाई जहाज़' बना उन्हें उड़ाने में कर रहा था
तो कोई टीवी रिमोट के साथ 'टक-टक' किए जा रहा था..कभी कार्टून नैटवर्क...तो कभी 'आज तक' ...अपने बच्चे 'सबसे तेज़' जो थे...उनका महँगा वाला 'मोबाईल फोन 'तो पहल्रे ही दिन 'कण्डम' हो कूड़ेदान की राह तक चुका था और अपने छोटे वाले ने तो जैसे उनका कोई भी बिस्तर सूखा ना छोडने की कसम खाई हुई थी।इधर चद्दर बदली ...उधर फर्र से 'फौवारा' चालू।खरबूजे को देख खरबूजे ने भी रंग बदल डाला...अपने टॉमी ने भी आँखे मूंद जोश में आ जो टांग उठाई...नतीजन...उनका 'लैपटाप' अपनी अंतिम सांसे गिन रहा था।खूब 'चिल्लम-पों' हो रही थी...जिसके जो जी में आए वही कर रहा था।अब तक हम सब मिलकर साफ-सुथरे घर की 'वाट' लगा चुके थे।कोई 'रोकने-टोकने' वाला जो नहीं था।मामा बडा दिलदार था सो कुछ नही बोला लेकिन मामी के चेहरे पे कई रंग आ-जा रहे थे।परंतु अपुन को इस सब से क्या?
ये तो वो ही सोचें..जिन्होने बिना सोचे समझे न्योता भेजा था।हमारी खातिर चूल्हे पर हर वक़्त देगची चढी रहती थी...हरदम नये-नये पकवानों की फरमाईश जो आती रहती थी हमारी तरफ से..कभी 'पिज़्ज़ा' तो कभी 'गुलाब जामुन"...आवभगत तो हो रही थी अपनी...चाहे बुझे मन से ही सही।हमारे बढते हौसले देख एक दिन मामी के सब्र का बाँध टूटना था सो...टूट ही गया आखिर।
"बडे ही बेशर्म हैँ ये तो,...जाने का नाम ही नहीं ले रहे"..."हुँह!...बडे आए न्योता भेजने वाले...अब भुक्तो"
"बडा प्यार उमड रहा था ना अपने भांजे पर?"
"बाज़ुयेँ अकड गयी थी मिले बिना जनाब की"
"साँस अन्दर-बाहर नहीं हो रहा था ना?"
"करते रहो'सेवा-पानी'..मैँ तो चली मायके"
"तभी बुलाना वापिस...जब ये मुय्ये मुफ्तखोर दफा हो गए हों"
"मैँ दरवाज़े से कान लगाए चुप-चाप सुन रहा था सब।सर शर्म से पानी-पानी हुए जा रहा था...अब मामा-मामी से आँखे मिलाने की हिम्मत नहीं बची थी मुझमें।सर झुका आहिस्ता से बोला..."जी!...काफी दिन हो गये हैँ...अब छुट्टियाँ भी खत्म होने को हैँ...होमवर्क भी बाकी है बच्चों का"...
"सो!...अब चलेंगे"
"बीवी आँखे तरेरते हुए मुझे घूरे जा रही थी कि मैँ ये क्या बके चला जा रहा हूँ?"लेकिन मै बिना रुके बोलता चला गया।कमरे में घुसते ही बीवी दाँत पीसते हुए बोली..."ये क्या बके चले जा रहे थे?"
"दिमाग क्या घास चरने गया था जो ऐसी बेवाकूफी भरी बातें किये जा रहे थे?"
मेरे सब्र का बाँध टूट गया,बोला..."कुछ शर्म-वर्म भी है कि नहीं या वो भी बेच खायी?आखिर!...और कितना बे-इज़्ज़त करवाएगी?"
"समझदार को इशारा काफी था,बीवी चुप लगा के बैठ गयी।पता जो था कि अब अगर वो एक शब्द भी फालतू बोली तो आठ-दस तो पक्के ही समझो।ज़मीर जाग उठा था मेरा..
"उन्हें दिल्ली आने का न्योता दे हम चल पडे वापिस...पीछे मामा-मामी भी मंद-मंद मुस्काए चले जा रहे थे....आखिर!...उनका पिण्ड जो छूट गया था हम मुफ्तखोरों से"
*** राजीव तनेजा***
 
यहाँ भी पढ़िए "सुभीता खोली के नवा चिंतन"

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शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

हट ज्या...सुसरी...पाच्छे ने


***राजीव तनेजा***
                     
"बधाई हो"....
"किस बात की?"...
"अरे!...खुशियाँ मनाओ...खुशियाँ"....
"पहले बात का पता तो चले...फिर सोचता हूँ कि खुशी मनानी है या फिर मातम"....
"अरे!..मातम मनाएँ हमारे दुश्मन"....
"तो क्या लाला रौशनलाल के घर पाँचवी बार फिर लड़का पैदा हुआ है?"...
"वो दरअसल....
"लगता है....पिछले जन्म में मोती दान करे थे पट्ठे ने"....
"किस्मत ही बड़ी तेज़ है स्साले की"...
"यहाँ हम दिन-रात अपनी ऐसी की तैसी करवा..थक-हार के बुरी तरह टूट लिए लेकिन  नतीजा वही...ढाक के तीन पात"...
"एक के बाद एक...लगातार तीन लड़कियाँ"...
"उफ!...क्या किस्मत है मेरी?"......
"वहाँ....वो स्साला...हराम का जना...पता नहीं कौन से सन्यासी या वैद्य का घर में बना  शिलाजीत युक्त  च्यवनप्राश खाता है कि एक बार में ही सब कुछ फिट-फाट".....
"तुरंत...बिना किसी प्रकार की देरी के...अगले प्रोजैक्ट को अमली जामा पहनाने में जुट जाता है"...
"अरे नहीं!...वो तो आजकल इस सब काम से छुट्टी ले सियाचिन-वियाचिन जैसी किसी ठण्डी जगह पे आराम फरमा रहा है"...
"क्यों?"...
"क्या हुआ उसके जोश औ जुनून को"....
"निकल गई सारी हेकड़ी?"....
"पहले तो हमेशा ...बड़े मज़े से अफ्लातूनी साँड के माफिक एक के बाद एक  नए मिशन पे जुटा रहता था"... "हुँह!...बड़ा आया दानवीर बनने वाला"...
"अरे यार!....उसकी बात नहीं कर रही हूँ मैँ"...
"आजकल तो वो बिमार पड़ा हुआ है"..
"क्या बात?"....
"बड़ी खबर है तुम्हें उसकी?"....
"कहीं कुछ...?"...
"तुम तो हमेशा एक से एक पुट्ठा ही सोचा करो"....
"तो फिर तुम्हें कैसे....
"अरे!...अपनी  राम कटोरी बता रही थी"....
"कौन राम कटोरी?"....
"वही जो उनके घर का झाड़ू-पोंछा करती है?"....
"हाँ!...वही"....
"ओह!...अच्छा"....
"ये राम कटोरी भी आजकल कहीं पेट से तो नहीं है?"....
"क्यों?....तुम्हें कैसे खबर?"बीवी का शंकित स्वर
"बस!...ऐसे ही उड़ती-उड़ती सी नज़र पड़ी थी उस पर तो लगा कि शायद.....
"तुम ना..अपनी इस उड़ती-उड़ती सी नज़र को ज़रा काबू में रखा करो"...
"मैँ तो बस ऐसे ही....
"सब समझती हूँ मैँ कि...क्या ऐसे ही?...और क्या वैसे ही?".....
"जिस दिन मेरा दिमाग फिरना है.....
"अरे छोड़ो यार तुम भी ..क्या बात ले के बैठ गई?"...
"मुझे तो लगता है कि रौशनलाल ने ही अपने नूर की थोड़ी सी  रौशनाई बिखेर दी होगी उस अबला बेचारी पर"...
"हम्म!...वर्ना उसका पति 'राम आसरे' तो पिछले दो साल से बाहरले मुलुक गया हुआ है पैसा बनाने के वास्ते"...
"अच्छा है!...बेचारी के माथे से बांझ के नाम का ठप्पा तो हटेगा कम से कम"....
"लेकिन!...ये जो बदचलन का एक्स्ट्रा लेबल लग जाएगा...उसका क्या?"...
"और क्या करे बेचारी?"...
"पति तो पिछले छै महीने से एक दुअन्नी भी नहीं भेज रहा है खर्चे के वास्ते"...
"कहाँ से?....और कैसे गुज़ारा करे?".....
"हद है!...इस 'राम आसरे' को ना तो अपने बिमार माँ-बाप की कोई चिंता है और ना ही अपनी बीवी से किसी भी किस्म का कोई लगाव है"...
"सुना है!...कि वहीं कोई और रख ली है उसने"....
"छोड़ो!...हमें क्या?"...
"हाँ!..हमें क्या?"...
"तुम बताओ!...किस चीज़ के लिए खुशियाँ मनाने के लिए कह रही थी?"...
"वो दरअसल.....
"एक मिनट!...खुशी मनाने की बात है तो ज़रूर छुन्नी के पापा की फिर से लॉटरी लग गई होगी".....
"स्साला!...है ही बड़ा किस्मत का धनी"....
"बुरी नज़र करे भी तो आखिर क्या करे?"...
"ताश नई-पुरानी कैसी भी हो...अगला आँख बन्द करके भी अगर पत्ते फेंटता है तो भी बेगम उसी के धोरे खड़ी मिलती है"...
"खैर!...कभी ना कभी तो अपने दिन भी आएँगे"....
"आएँगे नहीं तो क्या...माँ.......
"बस...बस!....जब देखो ज़ुबान पे कोई ना कोई गाली चढी रहती है"....
"अरे!...कौन उल्लू का पट्ठा...किसकी माँ-बहन एक कर रहा है?"...
"अभी तुम ही तो.......
"अरे!...मेरे कहने का तो मतलब था कि कभी तो हम पर किस्मत मेहरबान होगी"....
"हाँ!...कभी ना कभी तो इस घूरे के दिन भी फिरेंगे"....
"बॉय दा वे!...तुम किसकी बात कर रही हो?"...
"अरे!...'जयहिन्द मीडिया' वालों ने तुम्हारे काम से खुश हो कर तुम्हारी लेखनी को सराहा है"...
"अच्छा?"....
"तो इसमें कौन सी नई बात है?"...
"सभी तो तारीफ पे तारीफ किए जा रहे हैँ आजकल"...
"हाँ!...ट्रेन में चना-दाल बेचने वाले से लेकर चूरन वालियों तक...सबको अपना मुरीद बना रखा है तुमने"...
"और नहीं तो क्या?".....
"तुम्हारे घरवाले की कलम में है ही ऐसा जादू कि जो पढे...पढता ही रह जाए".....
"बिलकुल"....
"तो क्या उनका फोन आया था?"....
"किनका?"...
"अरे!...'जयहिन्द' वालों का...और किनका?"....
"नहीं!....उनका तो कोई फोन नहीं आया".....
"तो इसका मतलब तुमने ज़रूर मेरी मेल चैक की है"....
"कितनी बार मना कर चुका हूँ कि मेरी पीठ पीछे मेरी किसी भी चीज़ को हाथ नहीं लगाया करो लेकिन तुम हो की...छेड़खानी किए बिना चैन ही नहीं पड़ता"...
"अरे!...ये सब तुम्हारे दिमाग का खलल है कि तुम्हारी पीठ पीछे तुम्हारी चीज़ों के साथ पंगे लेता है"....
"क्यो?...उस दिन वो जो मेरी  हॉफ पैंट पहन...बीच गली के इधर-उधर मटक रही थी"...
"वो क्या था?"...
"अरे वो?"...
"वो तो मैँ बस ऐसे ही पहन के ट्राई कर रही थी कि मुझ पर ये निक्कर-शिक्कर फबती भी है कि नहीं?"....
"हाँ!...बहुत फबती है".....
"क्या सच?"....
"और नहीं तो क्या?"....
"कैसी लग रही थी मैँ?"...
"ऐसे लग रहा था जैसे सांय-सांय करती तेज़ हवा में फर्र-फर्र करता एक विशालकाय दोमुँहा 'तंबू'......सिर्फ तुम्हारी 'बम्बू' समान सींकिया टाँगों के सहारे टिका खड़ा हो"...
"क्या?"...
"मुझे ये बात समझ नहीं आती कि तुम्हें मेरी चीज़ों के साथ छेड़-छाड़ कर के आखिर मिलता ही क्या है?".... "कसम ले लो मुझसे बेशक...काले पर्वत पे उड़ने वाले 'सफेद बाज़' की जो मैँने तुम्हारी किसी भी चीज़ को छेड़ा हो"...
"तो फिर क्या हकीकत का जामा पहने तुम्हें ये 'श्वेत-श्याम' सपना आया तुम्हें कि तुम्हारे पति...याने के मेरी...लेखनी बड़ी ही दमदार है?"... 
"पहली बात कि मैँ इतनी भोली या बुरबक्क भी नहीं हूँ कि तुम्हारी पोस्टस के बदले आने वाले इक्के-दुक्के कमैंटस के जरिए इतना भी ना जान  सकूँ और दूसरी बात ये कि ये 'श्वेत-श्याम' याने के ब्लैक एण्ड व्हाईट वाले थर्ड क्लास सपने आएँ तुम्हारी उस 'चम्पा' की बच्ची को...मुझे नहीं"...
"मुझे भला क्यों आने लगे?"...
"चम्पा?"...
"क्कौन चम्पा?"....
"हाँ!...हाँ  अब भला मेरे सामने क्यों याद आने लगी?"...
"अरे!...वही निगोड़ी 'चम्पा-चमेली'...जिसके लिए तुम रोज़-रोज़ कोई ना कोई बहाना बना के पानीपत से जल्दी फूट वक्त-बेवक्त घर आ धमकते हो"...
"तो इससे तुम्हें क्यों मिर्ची लगने लगी?"...
"मेरा घर है...जब मर्ज़ी आऊँ"...
"आऊँ!...ना आऊँ"....
"हाँ..हाँ....तो मैँने कब रोका है"...
"आना है आओ....नहीं तो ....उसी करम जली के दड़बे में बैठ अण्डे सेते रहो"...
"अण्डे?"....
"मर्द होने के नाते अण्डे देना मुझे गवारा नहीं"...
"कोई और काम हो तो बताओ"....
"फॉर यूअर काईंड इनफार्मेशन!...मैँ अण्डे देने के लिए नहीं बल्कि सेने के लिए कह रही थी"....
"ओफ्फो!...सुबह से क्या बकवास लगा रखी है?"....
"कभी अण्डा दो...कभी अण्डा सेओ"...
"शुरूआत तो तुमने ही की थी"...
"अच्छा!...चलो मैँ ही इसे खत्म भी करता हूँ"...
"सॉरी".....
"ओ.के....आई एम ऑलसो सॉरी"...
"हाँ!...अब बताओ!...क्या कह रही थी?"...
"यही कि 'जयहिन्द मीडिया' वालों ने चैक भेजा है"...
"अरे वाह!...पहले क्यूँ नहीं बताया?"...
"तुमने मौका ही कब दिया?"...
"आते ही तो शुरू हो गए थे"...
"ओ.के बाबा!...कह तो दिया सॉरी"......
"सब जानती हूँ तुम्हारी इस सॉरी-शॉरी के ड्रामे को"...
"अभी गीदड़ बन बकरी के माफिक मिमिया  रहे हो बाद में मौका लगते ही तुमने अपना असली रूप दिखाने से बाज़ नहीं आना है"....
"ओफ्फो!...अब क्या कान पकड़ के मुर्गा भी बनूँ?"...
"नहीं!...इसकी ज़रूरत नहीं है".....
"ओ.के"...
"वैसे एक बात कहूँ?"....
"क्या?"...
"यही कि तुम्हें मुर्गा बने हुए देखे अर्सा बीत गया"....
"तो?"...
"एक बार...
"नहीं!...बिलकुल नहीं"...
"प्लीज़!..पुरानी यादों को ताज़ा हो जाने दो"....
"कौन सी यादें?....कैसी यादें?"...
"वही जब तुम पहली बार मुझसे मिलने मेरे होस्टल की दिवार फान्द के आए थे और मेरे बजाय धोखे से वार्डन को छेड़ दिया था"....
"ओह!.....
"फिर सबके सामने उसने तुम्हें.....
"बस...बस...रहने दो"....
"अपनी इस कहानी को पढने वाले सभी प्रबुद्ध पाठक हैँ".....
"तो?"....
"क्यों सबके सामने मेरी मिट्टी पलीद करती हो यार?"...
"ओ.के...बाबा!...नहीं करती लेकिन पहले मेरी पूरी बात बिना किसी टोका-टाकी के सुननी पड़ेगी"...
"हाँ!..बताओ...क्या कह रही थी?"..
"यही कि 'जयहिन्द मीडिया' वालों ने तुम्हें चैक भेजा है"...
"कितने का?"....
"एक हज़ार रुपए का"....
"बस?....धुर्र फिट्टे मुँह"...
"मेरी अठाईस कहानियों के हिसाब से तो....ये कोई 'पैंतीस रुपए और इकहतर नए पैसे' पर कहानी नहीं पड़ा?"...
"कुछ कम नहीं है?"...
"अरे!...इतना भी मिल गया...गनीमत समझो"...
"वर्ना वो 'नवभारत' वाले तो छापने-छूपने के बाद भी.....
"हाँ!..चलो...ये सोच के ही खुश हो लेता हूँ कि कम से कम मेरे लेखन को पहचाना तो सही"...
"और कुछ भी लिखा है उन्होंने?"...
"हाँ!...पन्द्रह दिन के अन्दर एक नई कहानी लिख 'अखिल भारतीय कहानी कम्पीटीशन' में भाग लेने के लिए भी कहा है"...
"पन्द्रह दिन में?"....
"इनके बाप का नौकर हूँ जैसे?"....
"कुछ ईनाम-विनाम भी दे रहे हैँ?...या ऐसे ही फोकट में?"....
"अरे!...फोकट में काहे को?"...
"पूरे पाँच हज़ार का ईनाम है प्रतियोगिता में प्रथम आने वाले के लिए"...
"बस?"....
"अपने बस का नहीं है कि महज़ पाँच हज़ार के पीछे कम्प्यूटर पे घंटो उँगलियाँ टकटकाता फिरूँ"....
"तो फिर पहले क्यों पूरी रात टक...टकाटक कर मेरी तथा बच्चों के साथ अपनी भी नींदें हराम किया करते थे?"...
"अरे!...तब अपुन का कोई नाम-शाम नहीं था ना"..
"तो?"....
"अरे!...समझा कर यार"...
"तब ज़रूरी था"...
"अच्छा!...एक बात बता"...
"क्या?"...
"पाँच हज़ार ज़्यादा होते हैँ के एक करोड़?"...
"मतलब?"....
"अरे!...पहले तू बता तो सही"....
"करोड़"....
"बस!...इसीलिए तो कह रहा हूँ कि ये कम्पीटीशन-वम्पीटीशन में भाग लेना....बस टाईम खोटी करने के अलावा कुछ नहीं है"...
"मतलब?"...
"अरे!...बढिया स्क्रिप्ट लिखने के बदले में अपने बॉलीवुड के सबसे बड़े शोमैन याने के   'सुभाष घई' ने पूरे एक करोड़ का ईनाम रखा है"...
"एक क्करोड़?"....
"हाँ!...पहला ईनाम 'एक करोड़' का.....
दूसरा ईनाम ...'पचास लाख' का और तीसरा ईनाम ...'बीस लाख' का"...
"भांग तो नहीं चढा रखी कहीं?"..
"इतना पैसा भला लेखक को कौन देता है?"...
"अरे!...अब भांग चढाएँ मेरे दुश्मन"...
सुभाष घई से अपने ताज़ा-तरीन इंटरविय्यू में साफ-साफ कहा है कि......"जब हमारी फिल्में देश-और विदेश में कुछ ही हफ्तों में करोड़ों का बिज़नस कर लेती हैँ" .......
"तो क्या हम एक अच्छी और उम्दा कहानी के लिए एक करोड़ नहीं खर्च कर सकते?"...
"मैँने तो जब से ये इंटरव्य्यू पढा है...तब से 'भांग'...'सुरती' और 'गांजा' छोड़ सिर्फ और सिर्फ 'स्काच' तथा 'चरस' ही पीने का मन बना लिया है"...
"तो क्या 'सुभाष घई' जैसे बड़े और नामी व्यक्ति  के लिए तुम 'जयहिन्द मीडिया' जैसे नए खिलाड़्यों को मना कर दोगे?"..
"और नहीं तो क्या?"...
"इधर भी पंद्रह दिन का समय है...और उधर भी पंद्रह दिन का ही समय है"...
"तो?"...
"'कोसी' का पानी तो उसी तरफ बहेगा ना...जिस तरफ ढाल होगा"...
"लेकिन अपने काम के प्रति निष्ठावान 'लेखक' का छोटे-बड़े...नामी-बेनामी से क्या लेना-देना?"...
"क्यों नहीं लेना-देना?"...
"क्या वो कोने वाला मोची बिना पैसे लिए ही मेरा फटा जूता सिल देता है?"...
"या वो 'एवर ग्रीन' ब्यूटी पॉरलर वाली मीनाक्षी बिना पैसे लिए ही 'पैडीक्योर'...'मैनीक्योर' और 'थ्रैडिंग' से लेकर 'फेशियल' तक कर तुम्हारे इस 'पैंतालिसवाँ बसंत' देख रहे थोबड़े को चमका कर महज़ बत्तीस का कर डालती है?....
"ओफ्फो!...कोई ज़रूरी नहीं कि तुम कहानी पढ रहे इन पाठकों के सामने मेरी असली उम्र का बखान भी करों"...
"अच्छा बाबा....नहीं करता"....
"अब खुश?"...
"हम्म!....बस अब आप बिना किसी भी प्रकार की कोई देरी किए फटाफट से जुट जाओ अपने लेखन में"....
"अरे!...फिकर नॉट वर्री करी"...
"अभी बहुत टाईम बाकी है"....
"किसमें टाईम बाकी है?"...
"जयहिन्द वालों के लिए तो तुम साफ मना ही कर रहे हो"...
"एक्चुअली!...मैँ सोच रहा हूँ कि किसी को ऐसे ही बेकार में क्यों नाराज़ करा जाए?"....
"क्या पता?...खोटा सिक्का कब काम आ जाए"...
"कम से कम नैट का चार-छै महीने का खर्चा तो निकलेगा...अलग से"...
"हाउ स्वीट!...तुम कितने अच्छे हो"....
"मेरे ख्याल से अब देर करना ठीक नहीं"...
"अरे!...तुम चिंता ना करो...सब आराम से मैनेज हो जाएगा"....
"माना कि तुम कलम के धनी हो लेकिन 'टॉपिक' वगैरा के बारे में तो पहले से ही सोच के रखना पड़ेगा ना कि क्या लिखना है और क्या नहीं"...
"कहानी का प्लाट....ताना-बाना वगैरा"....
"कहा ना!...तुम बिलकुल भी...तनिक भी परेशान ना हो"...
"एक से एक...धांसू से धांसू...कहानियों और उपन्यासों के प्लाट ऑलरैडी भरे पड़े हैँ इस 'डॉयमंड कट' भेजे में"...
"'डॉयमंड कट'...माने?"...
"अरे!...'डॉयमंड कट' माने अच्छी तरह से कुशलतापूर्वक तराशा गया नक्काशीदार भेजा"...
"किसी भी एक आध...फुटकर से आईडिए को सुबह-सवेरे खुली हवा में....हवा भर लगानी है और पल भर धमाकेदार कहानी तैयार समझो"...
"ओ.के....जैसी तुम्हारी मर्ज़ी"....
{पाँच दिन बाद}
"कुछ हुआ?"....
"कुछ होने वाला था क्या?"....
"लड़का या लड़की?"....
"ओफ्फो!....मैँ कहानी की बात कर रही हूँ और तुम कहाँ की कहाँ सोचे जा रहे हो?".....
"ओह!...मॉय मिस्टेक"...
"फिलहाल तो मैँ ये सोच रहा हूँ कि इस बार कहानी का सबजैक्ट क्या रखूँ?"...
"हे भगवान!...पाँच दिन गुज़र गए और जनाब ने अभी तक विष्य ही नहीं सोचा है"...
"अरे!...वैसे तो मेरा प्रिय विष्य हास्य एवं व्यंग्य है लेकिन इस बार फॉर ए चेंज...मैँ सोच रहा हूँ कि 'प्रेम त्रिकोण' याने के लव ट्राईएंगल पर कोई कहानी लिखूँ"...
"अरे नहीं!...ऐसी भूल बिलकुल भी ना करना"...
"नहीं!...ये तो किसी भी हालत में सही टॉपिक नहीं है"...
"क्यों?...क्या बुराई है इसमें?"...
"हर तीसरी या चौथी फिल्म में यही कहानी तो बार-बार दोहराई जा रही है"....
"तो फिर भाईगिरी या गैंगवार वगैरा पे क्यों ना लिखूँ?....
"ना बाबा ना!...भाईगिरी और गैंगवार के बारे में लिखने में तो बहुत लफड़ा है"...
"कैसे?"...
"कल को क्या पता 'दुबई' में बैठा कौन सा भाई नाराज़ हुआ पाए?...और सीधा खड़ा हो तुम्हारे कान के नीचे  घोड़ा लगा धमाका करता नज़र आए"....
"ओह!...
"और वैसे भी अपने  'राम गोपाल वर्मा' जी को इस सब तरह की कहानियों में महारथ हासिल है"...
"मैँने तो यहाँ तक सुना है कि अब वो ऐसी फिल्मों को बनाने और लिखने के बारे में होल वर्ल्ड का ऑल इण्डिया फेमस कॉपीराईट लेने की सोचने लगे हैँ ताकि ना रहे बाँस और ना ही बज पाए किसी दूसरे की बाँसुरी"....
"ओह!...
तो फिर  गान्धीगिरी के बारे में लिखना कैसा रहेगा?".....
"अरे यार!...उसमें तो  संजू बाबा पहले ही राईटर-डाईरैक्टर के साथ मिल कर ऐसा कमाल दिखा चुके हैँ कि कुछ और लिखने या करने की गुंजाईश ही कहाँ बचती है किसी और के लिए?"...
"तो फिर क्यों ना किसी 'पीरियड' याने के ऐतिहासिक फिल्म की कहानी लिखूँ...जैसे  'पृथ्वीराज चौहान'... 'लक्ष्मीबाई' वगैरा..?"....
"पता भी है कि कितने चैनलों पे ऐसे सीरियल बे-भाव धक्के खा रहे हैँ आजकल"....
"और 'लक्ष्मीबाई' पर तो अपनी  'सुश्मिता' बना रही है फिल्म"...
"नहीं!...'एक्स मिस यूनीवर्स' याने के 'पूर्व ब्रह्मांड सुन्दरी' से पंगा लेना ठीक नहीं होगा"....
"तुम कुछ 'मॉयथोलॉजिकल' याने के धार्मिक टाईप की कहानी क्यों नहीं लिखते?"...
"अरे!...उसमें तो अपनी 'एकता कपूर' पहले से ही 'हमारी-तुम्हारी  'महाभारत' शुरू कर चुकी है और 'सागर बन्धु' अपने पिताजी के ज़माने के बीस-बाईस साल पुराने  'रामायण' वाले हिट फार्मुले को फिर से भुनाने में जुटे हैँ"...
"ये कहाँ का इनसाफ है कि किसी एक कहानी को बार-बार एक ही आदमी भुनाए?".....
"कभी  'नदिया के पार' के नाम पे तो कभी....  'हम आपके हैँ कौन' के नाम पे?"....
"सही में!...दूसरों को भी बराबर का चाँस मिलना चाहिए"....
"हमारी सरकार वैसे बातें तो बड़ी-बड़ी समानता और सदभावना की करती है लेकिन....
"सही में...देश में....बड़े-छोटे में...अमीर-गरीब में समानता तो तब आएगी जब हर एक को नकल करने का बराबर का हक होगा चाहे वो स्कूल-कॉलेज का कोई इम्तिहान हो या फिर हो किसी 'एम.बी.ए' वगैरा का कोई टैस्ट"....
"बिलकुल!...तभी हमारा देश बिना किसी बाधा के तेज़ी से उन्नति के पथ की ओर अग्रसर हो पाएगा"...
"लेकिन मेरे हिसाब से तो आजकल में ऐसा होना नामुमकिन सा ही जान पड़ता है"....
"सरकार को तो चाहिए कि जो करना है..जल्दी करे"....
"हाँ!...बाद में जब लपलपाती 'कोसी' के कहर से सब मर लेंगे...तब राहत और आपदा सामग्री मिल भी गई तो क्या फायदा?"...
"अब तुम ये 'कोसी-वोसी' को मारो गोली और कहानी लिखना शुरू कर दो"...
"बिलकुल"....
{दस दिन बाद}
"हाँ!....कुछ हुआ कहानी का?"....
"यार!...लाख कोशिशों के बावजूद भी बात कुछ जम नहीं रही"...
"क्यों?..क्या हुआ?"...
"कुछ सोच के लिखने बैठता हूँ तो याद आता है कि ऐसा सीन तो फलानी-फलानी फिल्म में या फिर फलानी-फलानी कहानी में पहले ही कोई लिख चुका है"...
"किस तरह की फिल्मों में तुम्हें ऐसे सीन दिखाई देते हैँ?"...
"देसी या विदेशी?"....
"देसी"...
"ओ.के!...फिर तो कोई मुश्किल नहीं है"...
"तुम एक काम करो!...ये देसी-दासी का चक्कर छोड़े और कुछ नीली-पीली फिरंगी फिल्में झट से देख मारो"...
"और जिस से जो अच्छा लगता है...सब चुन-चान के एक उम्दा सी कहानी रातोंरात तैयार कर डालो"...
"नहीं...बिलकुल नहीं"....
"अरे!...क्या फर्क पड़ता है?"....
"जैसे सब कर रहे हैँ...वैसे ही तुम भी करो"....
"और डंके की चोट पे अपनी कहानी के मौलिक तथा मालिक होने का दावा पेश कर डालो"...
"ध्यान रहे!...ऐसा दावा पेश करते समय तुम्हारा चेहरा आत्म ग्लानी से पीड़ित नहीं बल्कि कांफीडैस से भरपूर एकदम लबालब दिखाई देना चाहिए"....
"अरे!...वो  'साजिद खान' का बच्चा एक मिनट भी टिकने नहीं देगा मेरे दावे को"...
"पल भर में ही पोल खोल के रख देगा कि मैँने फलाना-फलाना सीन फलानी-फलानी फिल्लम से चुराया है".....
"तो वो खुद ही कौन सा दूध का धुला है?"...
"उसने भी तो अपनी फिल्म 'हे बेबी' में 'जैकी चैन' की एक फिल्म से दृष्य उड़ाए थे"...
"अरे!...चुराए या उड़ाए नहीं थे बल्कि वो तो इंस्पायर हुआ था उस फिल्लम से"..
"हाँ!...तभी कुछ सीनो में फ्रेम दर फ्रेम नकल कर मारी थी"...
"ये सब संयोग भी तो हो सकता है या नहीं?"....
"हाँ-हाँ!....हो क्यों नहीं सकता?"....
"होने को तो कुछ भी हो सकता है"....
"मैँ  'जार्ज बुश' के घर और...'जार्ज बुश'...बिना किसी भी प्रकार का कोई लेन-देन किए   'ओसामा बिन लादेन' के घर भी पैदा हो सकता है"....
"क्यों?...है कि नहीं"...
"हा हा हा हा"...
"खैर!...बहुत हो लिया मज़ाक-वज़ाक"....
"अब कुछ सीरियस बात हो जाए?"...
"हाँ..हाँ....क्यों नहीं?"...
"तुम मुझे साफ-साफ खुले शब्दों में बता दो कि तुमने कहानी लिखनी है या मैँ किसी और को भाड़े पे रख लूँ?"...
"अरे!...ऐसा गज़ब मत करना"....
"लिखनी क्यों नहीं है?"...
"ज़रूर लिखनी है"...
"तो फिर ये आलस-वालस छोड़ो और तुरंत जुट जाओ काम पे"...
"जैसा हुकुम मेरे आका का".....
"बस...बस ...ये लल्लो-चप्पो छोड़ो और अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाओ"....
"ठीक है"...
{बारह दिन बाद}
"अरे!...सुनो!.....बड़े मज़े की बात सुनो"...
"क्या हुआ?...कहानी पूरी हो गई क्या?"...
"कहाँ यार?"...
"अभी-अभी एक बड़ी ही धांसू सी....फन्ने खाँ टाईप....फन्नी सी कहानी का आईडिया आया है".....
"अच्छा?...अभी सिर्फ आईडिया भर ही आया है?"...
"मैँ ही पागल हूँ जो तुम्हारे पीछे पड़-पड़ के बार-बार कहानी के बारे में पूछती फिरती हूँ और एक तुम हो कि कोई फिक्र ही नहीं"...
"अरे!...अगर अच्छी कहानी लिखोगे तो तुम्हारा ही नाम होगा...मेरा नहीं"....
"अरे!...तुम सुनो तो"...
"मैँ एक ऐसी कहानी लिखने जा रहा हूँ जिसमें ट्रैजेडी अपनी चरम सीमा पर होगी...रोमांस अपने पूरे उत्थान पर होगा और...और एक्शन के मामले में मेरी कहानी हॉलीवुड की फिल्मों की भी सरताज होगी"...
"गुड!...वैरी गुड".....
"मेरी कहानी पर बनी फिल्म बॉक्स आफिस के अगले-पिछले सभी रेकार्डों को धवस्त कर डालेगी"...
"अरे वाह!...क्या कहने"...
"मेरी कहानी बच्चों से लेकर बड़ों तक...सभी को भाएगी"...
"मैँने सब सोच लिया है...सुभाष जी से मैँ पर्सनल  रिकवैस्ट कर कहानी का ऐसा साऊंड ट्रैक बनवाऊँगा कि सब हक्के-बक्के रह जाएँगे"...
"बिना इसका संगीत सुने गाय-भैंसे दूध देना बन्द कर देंगी...हिरन घास चरना छोड़ देंगे...शेर शिकार करना भूल अपनी-अपनी मांदों में लुप्त हो जाएंगे"....
"ओ.के....ये सब म्यूज़िक वगैरा तो खैर एक्स्ट्रा बात हो गई...किसी अच्छी और सफल की आत्मा तो उसकी पटकथा याने के कहानी होती है"...
"बिलकुल"...
"तो फिर उसी के बारे में बताओ ना"...
"मैँ तो कहानी सुनने को उतावली हुए जा रही हूँ"...
"तो फिर सुनो.....
"नहीं!...पहले तुम सुनो...
कहानी में "जाने तू या जाने ना'  जैसा रोमांस ज़रूर डालना ...आजकल यही ट्रैंड चल रहा है"...
"अरे!...तू काहे को चिंता करती है?"...
"मैँ हूँ ना"...
"चिंता ना कर!...मेरी कहानी में वो सभी ज़रूरी मसाले हैँ जो एक हिट फिल्म के लिए निहायत ही ज़रूरी होते हैँ"...
"जैसे?"...
"जैसे उसमें  मदर इण्डिया जैसा माँ का प्यार भी है ...और 'दोस्ती' जैसी दोस्ती भी".....
"मेरी कहानी में  'संगम'  जैसी कुर्बानी होगी और...'गोलमाल' जैसी कॉमेडी भी होगी"...
"'लैला-मजनू' जैसे प्यार-मोहब्बत पे मिटने वाले प्रेमियों की दास्तान भी होगी...और 'एतबार' जैसा षड़यंत्र भी होगा"....
'आग ही आग' जैसी दिल दहला देने वाली दुश्मनी होगी....और 'फूंक' जैसा फूंक सरका देने वाला डरावनापन भी होगा".....
"दर्द का रिश्ता'  जैसा आखों से आँसू ला देने वाला दर्द होगा...और 'कयामत से कयामत तक' जैसा नयापन भी होगा"...
 'शूल'  जैसा शुद्ध आईटम नम्बर होगा....और अंत में 'शोले' जैसा धांसू  क्लाईमैक्स तो ज़रूर होगा ही".....
"गुड!...वैरी गुड"...
"लेकिन एक बात का ध्यान रखना कि कहानी बिलकुल ओरिजिनल लिखनी है...तभी सुभाष घई जी ने उसे अप्रूव करना है...वर्ना नहीं"....
"जानता हूँ यार कि नकल के पाँव नहीं होते"...
"अरे!...तुम चिंता ना करो"....
"पहला ईनाम ना मिले ...ना सही"...
"दूसरा ईनाम भी बेशक ना मिले...कोई गम नहीं लेकिन ये तीसरा वाला याने के 'बीस लाख' का नकद ईनाम तो अपना पक्का ही समझो"...
"भले ही सारी दुनिया इधर-उधर हो जाए...कोई भी बड़े से बड़ी ताकत मुझे इस ईनाम को हासिल करने से रोक नहीं सकती"....
"इतना ओवर कॉंफीडैंस भी ठीक नहीं"....
"कॉंफीडैंस की बात करती हो?"....
"वो तो इतना है कि पूछो मत"....
"ईनाम की तो तुम चिंता मत ही करो"...
"मैँ तो ये सोच-सोच के कंफ्यूज़ हुए जा रहा हूँ कि जब सुभाष घई से एक करोड़ वसूलने जाऊँगा तो...
"कौन सी ड्रैस पहन के जाऊँगा?"...
"कौन सा परफ्यूम लगा के जाऊँगा?"...
"'वुडलैंड' के या फिर 'रैड टेप' के जूते पहन के जाऊँगा?"....
'ज़ोडियॉक' की टाई पहनूँगा या फिर इम्पोर्टेड 'बो' लगाऊँगा?"...
"बो को तो तुम रहने ही देना"..
"क्यों?...क्या कमी है 'बो'  लगाने में?"....
"अच्छी भली तो लगती है नन्ही सी....प्यारी सी"...
"अरे!...ये 'बो-बॉ' लगा के बन्दा कम और वेटर ज़्यादा लगता है"...
"देखा नहीं है क्या शादियों और पार्टियों में वेटरों को ये 'चार्ली चैपलिन' के बड़े भाई माफिक मूछों को कमीज़ पे लगा प्लेटें इधर-उधर करते हुए?"...
"ओह!....
"तुम ये 'बो-बॉ' का लफड़ा छोड़ सीधे-सीधे टाई ही लगा लेना"...
"टाई?"...
"क्यों?...उसमें क्या बुराई है?"....
"अच्छी भली तो लगती है"...
"ओ.के...तुम्हारी बात मान लेता हूँ लेकिन सूट तो मैँ अपनी मर्ज़ी का ही पहनूँगा"...
"और ऐन टाईम पे आपा-धापी से बचने के लिए मैँने तो अभी से तैयारी कर ली है"...."
"तैयारी?..कैसी तैयारी"....
"जैसे के मैँ करोल बाग वाले  'दिवान साहब' को दो सूट बनाने का आर्डर पहले ही दे आया हूँ"....
"दिवान साहब' को?"....
"हाँ"....
"लेकिन उनके चार्जेज़ तो....
"अरे!...कपड़ों से शाही अन्दाज़ टपकना चाहिए और इस मामले में उनसे बेहतर कौन?"...
"वो कहते हैँ ना अँग्रेज़ी में कि फर्स्ट इम्प्रैशन इज़ दा लास्ट इम्प्रैशन"...
"हाँ!....ये बात तो है"....
"सामने वाले को भी पता होना चाहिए कि बन्दा खाते-पीते घर का नामी-गिरामी लिक्खाड़ है कोई वेल्ला सड़कछाप टट-पूंजिया लेखक नहीं"...
"बिलकुल!...पहनावा रुआबदार होना चाहिए"....
"नहीं तो ये फिल्मी लोग पहले तो मज़े-मज़े में सारे काम करवा लेते हैँ और बाद में पेमेंट के वक्त....
इतने नहीं...इतने.....कह बॉरगेनिंग पे उतर आते हैँ"....
"तो ठीक है आप अपनी कहानी फाईनल कर प्रिंट-आउट निकाल लें"...
"मैँ सोच रहा हूँ कि दो-चार एक्स्ट्रा कॉपी भी साथ ही साथ निकाल लूँ"...
"वो किसलिए?"...
"बॉलीवुड के दूसरे निर्माताओं को फ्री में ऐज़ ए सैम्पल गिफ्ट देने के काम आ जाएगी"...
"लेकिन अगर किसी दूसरे प्रोड्यूसर ने नकल मार उनसे पहले ही अपनी फिल्म रिलीज़ कर दी तो?"...
"ओह!...इस बारे में तो मैँने सोचा ही नहीं"...
"अगला हमारी कहानी के दम पे करोड़ों रुपया दाव पे लगाएगा...तो ऐसे में उससे गद्दारी करना ठीक नहीं"...
"बिलकुल"...
"ठीक है!...आज तो मैँ आराम करता हूँ...कल से कहानी को फाईनल टच दे दूंगा"....
"ओ.के"....
{चौदहवाँ दिन}
"सुनो!...वो कहानी का प्रिंट आउट तो दिखाना"...
"ज़रा देखूँ तो सही कि मेरे मियाँ जी ने कैसी कहानी लिखी है?"....
"अरे!...क्या खाक प्रिंट आउट दिखाऊँ?"....
"इस स्साले!...प्रिंटर को भी आज ही खराब होना था"...
"क्यों?...क्या हुआ है इसे?"...
"पता नहीं जब-जब कमांड देता हूँ इसे प्रिंट करने की...तब-तब बस सैम्पल पेपर छाप अपने कर्तव्य को पूरा समझ लेता है"...
"ओह!...अब क्या होगा?"...
"हे ऊपरवाले!...हमारी लाज बचा ले"...
"अब इसमें ऊपरवाला क्या करेगा?"....
"जो करना है...सो मकैनिक ने करना है...उसे फोन कर दिया है...बस आता ही होगा"...
"तुम बेकार में टैंशन मत मोल लो"..
"ओ.के"...
"उम्मीद करती हूँ कि सब ठीक हो जाएगा लेकिन मुझे एक चिंता खाए जा रही है"...
"क्या?"...
"यही कि ईनाम मिलने के बाद हम बड़े आदमी बन जाएंगे"....
"तो?"...
"बधाईयाँ देने के लिए दोस्तों...रिश्तेदारों का घर में आना-जाना लगा रहेगा"...
"तो?"...
"यार!...इस पुराने मॉडल के घर में आदर से सबका स्वागत-सत्कार करना अच्छा लगेगा क्या?"...
"वाशबेसिन है तो वो टूटा पड़ा है"..
"बाथरूम से लेकर रसोईघर तक की सभी टूटियाँ लीक करती हैँ"....
"रंग-रोगन करवाए हुए तो बरसों बीत गए"...
"सीलन के मारे प्लास्टर कभी भी बिना किसी न्योते के पपड़ी बन आ टपकता है"....
"अरे!...मेरे होते हुए चिंता काहे को करती है?"...
"जानती नहीं कि चिंता...चिता समान है?...और तुझे-मुझे तो अभी कई सावन एक साथ...एक ही छत के नीचे गुज़ारने हैँ"...
"छत?"....
"छत कमज़ोर इतनी है कि सोते हुए भी डर सा लगता है कि कहीं पंखा मेरे सिर के ऊपर ही ना पड़े"...
"परेशान ना हो...अभी प्लम्बर को फोन करके सभी टूटियाँ बदलवा डालता हूँ"...
"लेकिन ये चौखटों में भी तो दीमक ताबड़-तोड़ हमला कर चुकी है"...
"चिंता ना कर...पैस्ट कंट्रोल वालों को भी अभी के अभी फोन कर देता हूँ"....
"कोई फायदा नहीं होता ये कंट्रोल-शंट्रोल करके"...
"कंट्रोल करना ही है तो अपने नामुराद बच्चियों को करो"...
"नाक में दम किए रहती हैँ हमेशा"...
"कभी किसी की कॉपी गुम हुई रहती है तो कभी किसी की पैंसिल"....
"अरे!...तुम घर की बात करती हुई ये बीच में बच्चों का टॉपिक कहाँ से घुसेड़ लाई?"...
"शर्मा जी कह रहे थे कि तीन साल की गारैंटी देते हैँ"....
"बच्चों की?"....
"ओफ्फो!...बच्चों की नहीं रे बाबा"...
"पैस्ट कंट्रोल के बाद घर में दीमक ना लगने की तीन साल की गारैंटी देते हैँ वो लोग"....
"तो ऐसे कहो ना"....
"सब बकवास...बेफिजूल की है ये गारैंटी-शारैंटी"...
"लेकिन शर्मा जी तो....
"तो उन्हीं से कह के देखो कि एक बार ऐसे ही फोन मिला ...बुलवा के देखें उन्हें"...
"पहली बात तो फोन नम्बर ही बन्द पाएगा"....
"और अगर गल्ती से मिल भी गया फोन तो...आज कल...आज कल के झूठे वायदे के अलावा और कुछ हाथ नहीं लगने वाला"....
"तो क्या फिर सारी चौखटें ही बदल दें?"...
"मैँ तो कहती हूँ कि ये घर ही बदल दो"...
"बहुत साल हो गए एक ही जगह रहते-रहते"....
"कमाल करती हो तुम भी"....
"घर बदल दो"....
"कोई मज़ाक है क्या?"...
"घर बनाना भला कहाँ आसान है?"....
"कौन बावलों की तरह कभी 'सैनीटेरी' का तो कभी 'इलैक्ट्रीशियन' का सामान इकट्ठा करता फिरे?"...
"कभी लेबर के नखरे सहे तो कभी ठेकेदार से माथा फोड़े"...
"कभी पुलिस वालों को चढावा चढाए तो कभी 'एम.सी.डी.वालों की मुट्ठी गरम करे"....
"अपने बस का नहीं है ये ईंट...बदरपुर और रेते के साथ सीमेंट में धूल-धूसीरत होना"...
"इसका मतलब!...मेरा नए घर का सपना...सिर्फ सपना बन के रह जाएगा?"....
"अरे!...मेरी जान...तुझ पर मेरा प्यार....मेरा दुलार...सब कुर्बान"....
"तुम बस पैसे आने दो...सीधे-सीधे तुम्हें पंजाबीबाग में ढाई सौ गज़ की कोठी दिलवा दूंगा"...
"क्या सच?"...
"सच-सच...एम.डी.एच' के मसाले...सच-सच"...
हा हा हा हा हा...
"अच्छा मैँ तो चली खाना बनाने"...
"तुम उस मकैनिक के बच्चे को अभी फोन करो और तुरंत आने को कहो"..

"ओ.के"...
{पंद्रहवें दिन}

"अरे!...क्या हुआ....कल मकैनिक आया था के नहीं?"...
"मुझे तो घर के काम-काज से फुर्सत ही नहीं मिली कि मैँ तुमसे इस बाबत कुछ पूछ सकूँ"....
"नहीं!...मकैनिक तो आया नहीं था"....
"ओह!...
"हे भगवान...अब क्या होगा?"...
"धरी रह गई सारी की सारी मेहनत"....
"पानी फिर गया हमारे अरमानों पर"...
"अरे!....ऐसा कुछ नहीं हुआ है जो तुम इतनी हाय-तौबा मचा रही हो"...
"कुछ नहीं हुआ है?"...
"पूरे एक करोड़ निकल गए हाथ से और तुम कह रहे हो कि ऐसा कुछ नहीं हुआ है"...
"हाँ!..बेगम...यकीन मानों...ऐसा कुछ नहीं हुआ है"...
"उस पैसे पे हमारा हक है और वो हमें मिल के ही रहेगा"...
"तुम चिंता ना करों"...
"क्या तुम सच कह रहे हो?"...
"बिलकुल"...
"खाओ मेरी कसम"....
"तुम्हारी कसम"...
"लेकिन तुम तो कह रहे थे कि मकैनिक आया ही नहीं"...
"हाँ"...
"तो फिर प्रिंट आउट.....
"उसकी तो ज़रूरत ही नहीं पड़ी"...
"मतलब?"...
"यार...आज कहानी भेजने का आखरी दिन था और प्रिंटर भी खराब था तो मैँने सोचा कि क्यों ना सारी कहानी उनकी मेल आई.डी पर मेल कर दूँ"...
"ओह!...अच्छा किया"...
"मेरी इस समझदारी ने कई फायदे भी करा दिए"...
"वो कौन से?"...
"कागज़ का कागज़ बचा और पैसे के पैसे भी बचे"...
"और कई पेड़ भी तो कटने से बचे"...
"पेड़?"...वो कैसे?"...
"अरे!...कागज़ लकड़ी से ही तो बनता है".....
हा हा हा...सही बात"....
"अरे हाँ!...देखना ज़रा...तुम्हारी फोनबुक में उस कमला का नम्बर होगा"...
"कौन कमला?"...
"अरे!...तुम्हारी सहेली कमला...और कौन?"...
"अच्छा!....वही...जिसको पटाने के चक्कर में तुमने उसके बँगले के कई-कई चक्कर काटे थे"...
"कोई ज़रूरी नहीं कि यहाँ...इस कहानी के बीच में तुम गड़े मुर्दे उखाड़ो"...
"ओ.के....मॉय मिस्टेक"...
"हाँ!...अब बताओ...क्या काम पड़ गया तुम्हें उस कमला से?"...
"कहीं फिर से कमला के जलवों का हमला तो नहीं होने वाला?"....
"अरे!...ऐसी कोई बात नहीं है"...
"तो फिर क्या खास काम पड़ गया?"....
"ऐसा कुछ खास काम नहीं है"...
"मुझे तो बस नई मर्सडीज़ के रेट पता करने थे"...
"काहे को?"...
"अच्छी-भली दो-दो कारें तो हैँ...
"हाँ!..हैँ...एक तीन साल पुरानी 'वैगन ऑर' जो डैंटिंग-पेंटिंग माँग रही है और दूसरी बाबा आदम के ज़माने की 'फिएट ऊनो' जो बिना धक्के के स्टार्ट ही नहीं होती"....
"अच्छा लगेगा क्या हमें ईनाम मिलने के बाद इन लो स्टैंडर्ड की गाड़ियों में चढना-उतरना?"...
"बात तो तुम ठीक ही कर रहे हो"...
"सोच रहा हूँ कि अभी बुक करा देता हूँ..फैस्टिव सीज़न है...अच्छा-खासा डिस्काउंट मिल जाएगा"...
"लेकिन मर्सडीज़ लेने का मतलब हम कहीं ओवर बजट तो नहीं होते जा रहे?"....
"अरे!...पूरी फिल्म इंडस्ट्री क्या सिर्फ 'सुभाष घई' के दम पे चलती है?"....
"कला के कद्रदान भतेरे हैँ अपने इस बॉलीवुड में"...
"पहले सुभाष घई को खरीदने दो हमारी कहानी...उसके बाद बस तुम चुपचाप कोने में खड़ी हो कर तमाशा देखती रहना"....
"अपने आप ही 'यश चोपड़ा' से लेकर 'विधु विनोद चोपड़ा' तक....और  'शाहरुख' से लेकर 'सलमान' तक सभी ने ब्लैंक चैक ले अपनी-अपनी होम प्रोडक्शन के लिए हमें साईन करने के वास्ते लाईन बना के खड़े हो जाना है"...
"लेकिन मेरा दिल कहता है कि कम से एक बार हमारी कहानी को लेकर  बिग बी ज़रूर फिल्म बनाएँ"...
"मेरी दिली तमन्ना भी यही है लेकिन क्या किसी के पास जा कर ऐसे काम मांगते हमें शोभा देगा?"....
"लेकिन अगर वो तुम्हारी प्रसिद्धी सुन खुद ही आ जाएँ तो?"...
"तो वायदा है ये राजीव का कि मेरा पहला प्रैफरैंस...पहला रुझाना उन्हीं की तरफ होगा"....
"आखिर 'बिग बी' सचमुच में बिग भी हैँ"....
{परिणाम घोषित}
"ज़रा कम्प्यूटर तो ऑन करना...आज ही नतीजा आना था"....
"एक मिनट!...पहले ये बालाजी टैलीफिल्मस का प्रसाद लो और कम्प्यूटर को चन्दन-तिलक कर सफलता प्राप्ति मंत्र का जाप करते हैँ"...
"ठीक है"...
ऊँ गणपति नमाय:....
ऊँ कम्प्यूटराय नम:....
ऊँ सुभाष घई नमाय:...
ऊँ बॉलीवुडाय नम:...
ऊँ लेखकाय नम:..
हाँ!...अब ऑन करो कम्प्यूटर"...
अरे वाह!...
देखो तो!...घई साहब ने खुद मेल भेजा है"....
"गुड!...वैरी गुड"...
"ये देखो!...सबजैक्ट में 'अर्जैंट रिप्लाई नीडिड' लिखा है"...
"इसका मतलब ज़रूर पूछना चाह रहे होंगे कि हमें पैसा एक नम्बर में चाहिए कि दो नम्बर में?"...
'कैश' में चाहिए या फिर 'बैंक ड्राफ्ट' के रूप में?"...
"इंडिया में चाहिए या फिर अब्राड में?"...
हम तो साफ-साफ कह देंगे कि.....
"ओ जी!...हम ठहरे पक्के देशभक्त"...
"इस नाते पैसा हमें विदेश में नहीं बल्कि स्वदेश में चाहिए"...
"और वो भी नकद नहीं बल्कि 'पे-आर्डर' के रूप में"...
"अपना जितना टैक्स बनेगा...ईमानदारी से भर देंगे"...
"बिलकुल!...ज़मीर नाम की भी कोई चीज़ होती है कि नहीं?"...
"हाँ!..एक बात उनको पहले से बोल देंगे"...
"क्या?"...
"यही कि पे आर्डर हमे सिंगल नेम पे नहीं बल्कि जॉयंट नेम पे चाहिए"...
"मतलब?"...
"अरे यार!...पे आर्डर पे हम दोनों का नाम होना चाहिए कि नहीं?"...
"वो किस खुशी में?"...
"क्यों?...मेरा भी हक बनता है कि नहीं?"...
"हक?...किस बात का हक?....और कैसा हक?"....
"प्लाट सोच...कहानी का ताना-बाना बुनूँ ...मैँ".....
"रात भर जाग-जाग के अपनी उँगलियाँ टकटकाऊँ...मैँ"...
"और जब माल कमाने की बारी आए तो   तुम फोकट में अपनी हिस्सेदारी जताने लगो?"...
"वाह...क्या सोच है तुम्हारी?"...
"हट ज्या सुसरी...पाच्छे  ने"...

"कोई हक नहीं बनता तेरा"...

"हाँ...तुम्हारे लिए बार-बार चाय बनाऊँ ...मैँ"...
"कहानियाँ लिखने के नए-नए आईडियाज़ खोज निकालूँ ...मैँ"....
"तुम्हारे मैले-कुचैले ...कपड़े-लीड़े धोऊँ...मैँ"...
"तुम्हारे नासपीटे....न्याणों को पालूँ...मैँ"...
"तुम्हारे जूठे-सुच्चे बर्तन माँजूँ....मैँ"....
"और जब चार पैसे कमाने की बारी आए...तो....
"हट ज्या...सुसरी...पाच्छे  ने"...
"क्यों यार?...सुबह-सुबह....अच्छे-भले...बने-बनाए मूड को खराब करने पे तुली हो"....
"मैँ खराब करने पे तुली हूँ?"....
"और नहीं तो क्या?"...
"तो फिर सीधे-सीधे मेरा हक मुझे क्यों नहीं सौंप देते?"...
"अरे!..थोड़ा-बहुत हो तो मान भी जाऊँ...लेकिन तुम तो सीधे-सीधे आधा हिस्सा माँग रही हो"...
"तो क्या गलत कर रही हूँ?"...
"आज तुम ये जो लेखक का तमगा लगाए-लगाए फिर रहे हो ना?....
"वो सब मेरी ही देन है"...
"अच्छा?"...
"कई बार तो तुम्हारी टोका-टाकी के कारण मुझे अपनी कई कहानिय़ाँ बीच में ही रद्द कर रद्दी की टोकरी में फैंकनी  पड़ी  और तुम कह रही हो कि तुमने मुझे लेखक बनाने में मदद की?"...
"और नहीं तो क्या?"...
"सच-सच बताना...मेरे द्वारा की गई टोका-टाकी को तुमने कितनी बार अपनी कहानियों में हूबहू लिखा है?"...
"कई बार"...
"तो?"...
"चाहे वजह कोई भी रही हो...लेकिन तुमने जाने-अनजाने मेरी नकल तो की ही ना?"...
"हाँ!...ये तो है"...
"तो फिर मेरा आधा हिस्सा पक्का?"...
"हम्म!...आधा तो नहीं...लेकिन चलो...पैंतीस से चालीस परसैंट के बीच में कहीं ना कहीं तुम्हारी सैटिंग कर दूँगा"...
"नहीं!...बिलकुल नहीं"...
"तो फिर जाओ भाड़ में...अपना जो उखाड़ना हो...उखाड़ लो"...
"एक मिनट!...मुझे सोचने का मौका दो"...
"ओ.के....जो सोचना है..जल्दी सोचो"...
"ज़्यादा वक्त नहीं है मेरे पास"...
"ठीक है...मैँ काम्प्रोमाईज़ करने को तैयार हूँ"...
"हमारे आपसी इस झगड़े की वजह से तुम कहीं पति से 'एक्स पति' ना हो जाओ ....इसलिए मान जाती हूँ.....वर्ना कोई और हो तो आधे हिस्से से कम का तो सवाल ही नहीं पैदा होता"...

"चलो...अब ओपन करो मेल"..

"ओ.के"....
"ओह!...ये क्या?"...
"शिट!...शिट....शिट.....
मेरी कहानी तो अंतिम दस में भी नहीं पहुँच पाई".....
"ज़रूर तुम्हें गल्ती लगी है....वर्ना  ये ऊपर  'अर्जैंट रिप्लाई' ना लिखा होता"....
"उत्तर देने के लिए लिखा है कि हमारी हिम्मत कैसे हुई उसे ये बेकार की.....सड़ी सी...वाहियात कहानी भेज उसका कीमती समय खराब करने की"...
"हुँह...दो-चार हिट फिल्में क्या बना ली"...
"बड़ा तीसमारखाँ समझता है खुद को"...
"मेरी कहानी को बेकार की कह रद्दी की टोकरी में डालने वाले  पहले आईने में खुद को तो झाँक के देख"....
"ये तो पब्लिक पागल है वर्ना तेरी फिल्लम तो पहले हफ्ते में ही ठुस्स हो जाए"....
बता...क्या अनोखा मसाला होता है तेरी कहानियों में जो मैँने नहीं डाला?"...
"ओ जनाब जी...ये नींद में बड़बड़ाते हुए किस पे गरम हुए जा रहे हो?"...
"उठो!...सुबह हो गई है"...
"ये क्या?...रात को तो कह रहे थे कि पूरी कहानी एक ही बार में लिख कर सुभाष जी को मेल करूँगा और यहाँ तो एक पेज भी लिखा दिखाई नहीं दे रहा है"...
"ओह!...लगता है कि लिखना शुरू करने से पहले ही आँख लग गई थी"...
"कोई बात नहीं!..अभी तो पूरे पंद्रह दिन पड़े हैँ कहानी भेजने में"...
"अपना ...आराम से बाद में लिख लेना"...
"नहीं...बाद में नहीं....अभी से सोच-सोच के लिखना शुरू करूँगा तभी टाईम पे पूरी हो पाएगी"...
"ओ.के...जैसी तुम्हारी मर्ज़ी"...
"लिखने से पहले एक बात अच्छी तरह दिमाग में बिठा लेना कि तुमने अपने लेखन से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करना है"...
"ऊपरवाले का दिया बहुत कुछ है"...
"ईनाम भले ही मिले ना मिले...लेकिन एक पहचान ज़रूर मिले"...
"जी"....
"ऐसी नेक और पाक कोशिश करोगे तो इंशाअल्लाह एक ना एक दिन सफलता तुम्हारे कदम ज़रूर चूमेगी"...
"आमीन"...
"हा...हा...हा....हा"...
***राजीव तनेजा***
Rajiv Taneja
Delhi(India)
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http://hansteraho.blogspot.com
+919213766753
+919810821361

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गुरुवार, 12 नवंबर 2009

दो बूंद ज़िन्दगी की

***राजीव तनेजा***
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"सुनो...अपने पड़ोस में नए किराएदार आए हैँ"....
"तो?"....
"चलो मिल आते हैँ"...
"अरे!...रोज़ाना ही तो किराएदार बदलते रहते हैँ सेठ जमनादास की इस तिमंज़िली बिल्डिंग में...किस-किस से दुआ-सलाम करते फिरें?"...
"समझा करो बाबा...पड़ोस का मामला है"...
"तो?"...
"पास-पड़ोस वालों से हमेशा बना के रखनी चाहिए"...
"वो किसलिए?"...
"अरे!....तुम तो जैसे जानते ही नहीं हो?.....अपने घर से कभी 'आलू' खत्म होते हैँ तो कभी 'प्याज़' आखरी साँसे गिन रहे होते हैँ"....
"तो खत्म होने ही क्यों देती हो?…अपना पहले से ही एडवांस में ला के रखा करो"....
"हाँ-हाँ...पहले से ही ला के रखा करूँ...जैसे तुम्हारा बाप चलती-फिरती टकसाल छोड़ गया है ना मेरे लिए".....
"तो मुझ से माँग लिया करो"..
"हुँह!...बड़े आए माँगने पर देने वाले...दस-दस दफा चिरौरी करो..तब कहीं जा के बड़ी मुश्किल से एक बार अपने खीस्से को बाहर की हवा दिखाते हो...और वो भी तब...जब तक सौ दफा सिर ना खा लूँ तब"....
"अरे!...मुश्किल से या आसानी से...लेकिन देता तो हूँ ना?"....
"तुम्हारी तरह इनकार तो नहीं करता?"...
"मैँने कब इनकार किया?"...
"याद करो!...परसों रात जब फिल्म देख रहे थे...और तुम बीच में ही नींद का बहाना बना...चुपचाप दूसरी तरफ मुँह कर के लेट गई थी के नहीं?"....
"तो क्या रात के बारह बजे तुम्हारे लिए परांठे सेकती फिरती?"...
"क्यों?...पति को परमेश्वर मान उसकी सेवा करना तुम्हारा धर्म नहीं है?"...
"और उसकी इच्छाओं की पूर्ति करना तुम्हारा कर्तव्य नहीं है?"...
"मैँने कब ना करी है?"...
"क्यों?...ये जब मैँ किसी चीज़ की डिमांड करती हूँ तो तुम्हारी मुण्डी दूसरी तरफ क्यों घूम जाती है?"...
"तो क्या सारी तिजोरी ही तुम्हारे हवाले कर दूँ?"....
"हाँ-हाँ!...कर दो...कौन मना करता है?"...
"याद रखो!...मेरी जीते जी...ना धेला...ना पाई....कुछ भी नहीं मिलने वाला तुम्हें"...
"हाँ!...मेरे मरने के बाद बेशक सब तुम्हारा है"....
"सब पता है मुझे...बड़ी सख्त जान हो तुम...इतनी जल्दी नहीं मरने वाले"बीवी बड़बड़ाते हुए बोली...
"तो मेरे अंत समय तक इंतज़ार ही कर लो"...
"बुढापे में क्या मैँ पैसे का अचार डालूंगी?....जो देना है...अभी दे दो...तुरंत दे दो...फटाफट दे दो"....
"हाँ-हाँ!...अभी दे दूँ और खुद पाई-पाई का मोहताज हो जाऊँ?"...
"बड़े शौक से"...
"तुम तो यही चाहती हो ना कि सब कुछ तुम्हारे हवाले कर के मैँ खुद कटोरा थाम लूँ?"....
"दैट्स इट!...यही...यही तो मैँ चाहती हूँ कि तुम बुज़दिली छोड़...दिलेर बनो"...
"मतलब?"...
" मतलब कि तुम माँगना सीखो"...
"हुँह!...बड़ी आई मुझको माँगना सिखाने वाली"...
?...?...?..?..
?...?..?..
"जुम्मा-जुम्मा नौ दिन हुए नहीं घास चरते हुए कि चरागाहों के गुण बखारने लगी"...
"मतलब?"...
"तुम ..कल की लौंडी...मुझे?...मुझ अहले फकीर को माँगना सिखाने चली हो?...
"तो?"....
"अरे!...मुझ से बड़ा मँगता तो तुम्हें पूरे जहाँ में लाख ढूँढे से भी ना मिलेगा लेकिन कोई ढंग की चीज़ हो तो माँगी भी जाए...ये क्या?...कि मुँह उठाओ और चल दो आलू-प्याज़ माँगने"...
"तो फिर क्या माँगूँ?"...
"अपना ऊँची...ऊँचे लैवल की चीज़ माँगो"...
"तो क्या मैँ आलू-प्याज़ के बजाय लोगों से इमरती और घेवर माँगा करूँ?"...
"अरे बेवाकूफ!...ये भी कोई माँगने की चीज़ें हैँ?"...
"तो फिर चलो तुम ही बता दो कि मैँ क्या चीज़ें माँगा करूँ और क्या चीज़ें नहीं?"....
"क्या चीज़ें क्या?...अपना जो पसन्द हो वो माँग लो"...
"इसलिए तो मैँ 'इमरती' और 'घेवर' माँगने की कह रही थी...या फिर तुम कहो तो 'गाजर पाक' माँग लिया करूँ?"...
"ओफ्फो!...ये भी कोई माँगने की चीज़ें है?"...
"तो?"...
"अरी भागवान!...मेरा मतलब है अगर किसी से कुछ माँगना ही है तो दिल खोल के माँगो"...
"ठीक है!...तो फिर मैँ किलो-दो किलो माँग लिया करूँगी"...
"पागल हो गई हो क्या?"....
"क्या मतलब?...तुम ही तो कह रहे थे कि...
"ओफ्फो!...क्या मुसीबत है?"...
"अरे!...माँगना है तो अपना 'सैंत्रो' माँगो...'वैगन ऑर' माँगो...'एम.पी थ्री प्लेयर' माँगो...हो सके तो 'डी.वी.डी प्लेयर' भी  माँगो"...
"हुँह!...तुमने कह दिया  और मैँने माँग लिया"...
"क्यों?...क्या दिक्कत है?"....
"अरे!...लोगों को इतना पागल समझ रखा है क्या?..जो अपनी मँहगी चीज़ें तुम पर ऐसे ही न्योछावर कर..मुफ्त में लुटाते फिरेंगे?"...
"माना कि दुनिया वाले लाख मतलबी...निर्मोही और निर्दयी सही लेकिन अमावस के काले दिनों के बाद पूनम का चाँद भी तो निकलता है ना?"...
"मतलब?"..
"सभी तो नहीं...लेकिन कुछ एक तो किसी ना किसी दिन तरस खा कर हमारे झाँसे में ज़रूर फँस ही जाएँगे"...
"हम्म!...
"अपना ट्राई करते...करते रहो...और करते रहो"....
"जी"...
"यही हमारा फर्ज़ है...यही हमारा कर्तव्य है"...
"लेकिन....
"कोई लेकिन-वेकिन और किंतु-परंतु नहीं....इन सब को मारो गोली और बस इतना याद रखो कि ...
कभी ना कभी तो लहर आएगी...आएगी नहीं तो क्या माँ.....     &ं%$%ं#@
"क्या बक रहे हो?"...
"सॉरी!....ब्बस...ऐसे ही मुँह से निकल गया था"...
"ओह!...अगर गलती से है तो....दैन इट्स ओ.के....मैँ अपने शब्द वापिस लेती हूँ"...
"वर्ना तुम्हें पता है कि मुझे ऐसी बेहूदगी भरी भाषा बिलकुल भी पसन्द नहीं"...
जी"...
"हाँ!...तो तुम क्या कह रहे थे?"...
"कभी तो लहर आएगी...आएगी नहीं तो क्या?....
"बस-बस....क्या मतलब था तुम्हारी इस बात का?"..
"यही कि कभी ना कभी...कोई ना कोई बकरा तो ज़रूर हलाल होगा ही"...
"ओ.के"....
"चलो!...मान लो कि खुदा ना खास्ता किसी ने हम पर तरस खा के अपना 'एम.पी.थ्री' या 'डी.वी.डी  प्लेयर' हमें पकड़ा भी दिया...तो?"..
"अपना...ले के चलते बनो"...
"आय-हाय!...ऐसे-कैसे ले के चलते बनो?...अगला वापिस नहीं माँगेगा?"...
"तो दे दो"...
"क्या?"...
"गोली"...
"मतलब?"...
"ढीठ बन के मीठी गोली थमा दो अगले के हाथ में....क्या दिक्कत है?"...
"ओह!...
"बस!..आजकल-..आजकल कर के कुछ दिन टरकाते रहो...अपने आप थक हार के कुछ दिन बाद माँगना छोड़ देगा"...
"लेकिन अगर कुछ दिन बाद भी माँगना नहीं छोड़ा तो?"...
"अरे!...तब तक तो वैसे ही कचूमर निकल चुका होगा उसके 'एम.पी.थ्री प्लेयर' या फिर सो कॉल्ड ''डी.वी.डी प्लेयर' का"...
"मतलब?"...
"प्ले होने लायक ही कहाँ बचा होगा?"..
"और फिर ऐसी कण्डम आईटम को ले के क्या वो उसे चूल्हे में झोंकेगा?"...
"गुड!...वैरी गुड.....अब समझी"...
"बात में तुम्हारी दम तो है"...
"खाली दम नहीं...'दस कदम' कहिए हुज़ूर...'दस कदम' कहिए"...
"यू मीन!...दस का दम?"...
"हाँ-हाँ!...वही"...
"ओ.के!...म्यूज़िक प्लेयर वगैरा तक तो ठीक है लेकिन ये जो तुम 'सैंत्रो' वगैरा माँगने की बात कर रहे हो...ये गलत है"...
"वो कैसे?"...
"इतनी बड़ी आईटम...अगर कहीं गलती से किसी दिन ठुक-ठुका गई तो?"...
"माल मालिकों का...मशहूरी कम्पनी की"...
"??...??...??...??...
"ये तो पहले से ही डैमेजड थी"..कह अपना खी...खी...खी कर के खींसे निपोर कर अपने रस्ते चलते बनो...सिम्पल"....
"ना...बाबा ना!...तुमने कह दिया...'सिम्पल'..और हो गया?"...अपने बस का नहीं है ये सब"...
"ओ.के!...तो फिर...'घाघरा'...'चोली'....'लिपिस्टिक'...'बिंदी'....यही सब माँग के पूरी ज़िन्दगी कुँए में बसी मेंढकी की तरह रह जाना"....
?...?...?...?...
"और अगर इतना भी जिगरा ना हो ना....तो किसी सहेली या पड़ोसन से 'सैनिटेरी नैपकिन' वगैरा  माँग के ही संतुष्ट हो लेना"...
"मतलब?"...
"सोच लेना कि ..संतोषम परम सुखम"..
"हाँ!...यही सही भी रहेगा"...
?...?..?..?..
"ठीक है!...तो फिर चलो...आज थोड़े से ही संतोष कर लेते हैँ"...
"ओ.के...जैसी तुम्हारी मर्ज़ी"मैँ ठण्डी साँस लेते हुए बोला...
"लगता है बारिश होने वाली है"बीवी खिड-अकी से बाहर देखती हुई बोली....
"हम्म!...बादलों की गड़गड़ाहट से तो मुझे भी यही लग रहा है"...
"पकोड़े खाओगे?"...
"हाँ-हाँ!...क्यों नहीं...नेकी और पूछ-पूछ?"...
"तो फिर चलो"...
"कहाँ?"...
"अपने नए पड़ौसियों के घर"...
"उन्होंने पकोड़े बनाए हैँ?"...
"मुझे क्या पता?"...
"तो?"...
"अरे बाबा!...अभी थोड़ी देर पहले बताया ना कि आलू-प्याज़ खत्म हो रहे हैँ?"...
"तो?"...
"तो क्या खाली बेसन ही तल के दे दूँ?"...
"नहीं!...खाली बेसन से क्या फायदा?"...
"तो फिर चलो!...माँग के लाते हैँ"...
"अपने बस का नहीं है"...
"अरे!...अभी-अभी तो जनाब ये बड़ी-बड़ी डींगे हाँक रहे थे कि इन से बड़ा भिखमँगा पूरे जहाँ में ढूँढे से मिलेगा और दो-चार आलू-प्याज़ माँगने में भी शर्म आ रही है जनाब को"...
"अरे!...व्वो?...वो तो बस मैँने ऐसे ही तुम्हारे सामने नम्बर बनाने के लिए मज़ाक-मज़ाक में कह दिया था और तुम हो कि उसे सीरियसली ले बैठी"....
"क्या?"...
"एक्चुअली!...इस सब से मुझे डर लगता है...किसी से मना कर दिया तो?"...
"कर दिया तो कर दिया...हमें कौन सा डर मारा है किसी का?..किसी और के घर के आगे डेरा डाल के खड़े हो जाएँगे"...
"मुझ से नहीं होगा ये सब"...
"क्यों?"...
"शर्म आती है"....
"वाह...मेरे बजरंगी शेर...वाह....छुप-छुप के लड़कियाँ ताड़ते वक्त तो ज़रा सी भी शर्म नहीं आती"...
"तो?"...
"उनसे भी तो माँगते ही हो ना?"...
"लेकिन कोई कम्बख्त मारी देती तो नहीं"...
"तो फिर तुम कौन सा सब्र कर के रुक जाते हो?"...
"दूसरी के पास जा के उसका फोन नम्बर माँगते हो कि नहीं?"...
"हाँ!...माँगता तो हूँ?"...
"तो फिर पड़ौसियों से माँगने में भला क्या दिक्कत है?"...

"ना!...अपने बस का नहीं है ये सब"...
"ठीक है!...तुम्हारे बस का नहीं है तो फिर बैठे रहो यहीं हाथ पे हाथ धर के...मैँ अकेली ही हो आती हूँ"...
"नहीं!...बिलकुल नहीं"...
"ओफ्फो!...क्या मुसीबत है?...ना खुद किसी से कुछ माँगता है और ना ही मुझे माँग के लाने देता है"....
"हे ऊपरवाले!...हे परवरदिगार.. हे मेरे अल्लाह!...हे म्रेरे भगवान...
कुछ समझाओ मेरे इस निगोड़े नटवर लाल को कि ऐन टाईम पे कोई और नहीं बल्कि पड़ौसी ही काम आते हैँ"...
"आज तक कोई आया है?...जो अब आएगा".... "यही तो तुम में सबसे बड़ी कमी है...कभी किसी से कुछ माँगोगे नहीं तो कोई अपने आप आ के थोड़े ही तुम्हारी झोली में डाल जाएगा?"...
"अपने बस का नहीं है कि एक-दो आलू-प्याज के लिए मैँ हर किसी ऐरे-गैरे...नत्थू-खैरे की चिरौरी करता फिरूँ"...
"हे भगवान!...पता नहीं कब अक्ल आएगी इस कम्बख्त को?"...
"कितनी बार समझा चुकी हूँ कि ज़िन्दगी में अगर बढिया तरीके से कामयाब होना है तो हाथ फैलाना सीखो....हाथ" बीवी हथेलियाँ फैला उन्हें नचाती हुई बोली...
1223116355774
"किस से माँगूँ?...किसके आगे फैलाऊँ हाथ?....यहाँ तो सब के सब स्साले!.....कँगले की औलाद बसते हैँ"...
"ये तुम 552 नम्बर वाले शर्मा जी से कुछ माँग के क्यों नहीं देखते?...बड़े ही सज्जन आदमी हैँ...तुरंत बिना किसी ना-नुकर के दे देंगे"...
"हाँ-हाँ...बड़े ही सज्जन आदमी हैँ"....
"वोही तो"....
"पिछले हफ्ते मेरी 'नेज़ल ड्रॉप' माँग के ले गए थे कि अभी दो मिनट में नाक साफ कर के वापिस देता हूँ"...
"तो?"...
"अभी तक नहीं लौटाई"....
"तो तुम भी कुछ माँग लेते"...
"माँगा ना"...
"क्या?"...
"उनका लाल लँगोट"...
"हे भगवान!...कुछ इलाज करो मेरे इस ढपोरशँख का.....पहले तो किसी से कुछ माँगेगा नहीं और अगर माँगेगा तो उसका लाल लंगोट"बीवी अपना माथा पीटती हुई बोली...... 
"अरे!...तुम सुनो तो...मैँने उनसे उनका लंगोट क्या माँग लिया?....बेशर्म हो के तुरंत कहने लगे...
"माफ करना!...ऐसी निजी चीज़ें बाँटने के लिए नहीं होती...सॉरी".... 
"ओह!...तो तुमने ऐसी निजी चीज़ माँगी ही क्यों?"...
"निजी?"...
"हाँ!...निजी"...
"झूठ!...बिलकुल झूठ.....मैँने खुद उसे...उसके भाई के साथ एक ही कच्छा शेयर करते हुए देखा है"....
"क्या सच?"...
"बिलकुल सच"....
"अपनी इन्हीं आँखों से?"....
"हाँ-हाँ!...अपनी इन्हीं आँखों से"....
"यू मीन!...एक पाँयचे में इसकी टाँग तो....दूसरे पाँयचे में उसकी टाँग?"...
"पागल हो गई हो क्या?"...
"क्यों?...मैँ भला क्यों पागल होने लगी?...पागल हों मेरे दुश्मन"....
"अरे!...मेरा मतलब था कि कभी वो इस्तेमाल कर लेता है तो कभी उसका भाई"...
"ओह!....तो फिर ऐसे कहना था ना....लेकिन मेरे ख्याल से तुम उससे...उसके कच्छे के बजाय कुछ और माँगते तो ज़्यादा बेहतर होता"....
"और है ही क्या उन कँगलों के पास?"....हमेशा ही तो चड्ढी-बनियान में इधर से उधर मटरगश्ती कर रहे होते हैँ"...
"ओह!....क्या पता बेचारों के पास एक ही लंगोट हो?"...
"लाल वाला?"...
"हाँ-हाँ!...वही... और उसी को रोज़ाना धोते...सुखाते और पहनते हो?"...
"बारी-बारी से"...
"हाँ भय्यी!...बारी-बारी से"....
"तो फिर तुम ये 422 नम्बर वाले गुप्ता जी से कुछ क्यों नहीं माँग के देखते?...वो सज्जन टाईप के ही इनसान हैँ"...
"अच्छा?...तुम्हें कैसे पता?"....
"अरे!...कैसे ...क्या पता?...कई बार मैँ खुद ही ट्राई कर चुकी हूँ"...
"मतलब?"...
"चाहे उनसे मैँ अपने सूटों की तुरपाई करवा लूँ या फिर ब्लाउज़ के हुक टँकवा लूँ...कभी इनकार ही नहीं करते"...
"बड़े ही सज्जन आदमी हैँ"...
"अरे!...तुमने उससे दो-चार ब्लाउज़ों के हुक क्या टंकवा लिए?...वो कमीना ...सज्जन आदमी हो गया?"...
"क्यों?...तुम्हें क्या कमी दिखती है उनमें?"...
"बेचारा!...बड़ा ही बदनसीब है"...
"अच्छा?....तुम्हें कैसे पता?"...
"बेचारे को भरी जवानी में जो उसकी बीवी अकेला छोड़ के भाग गई"...
"गुड!...वैरी गुड!...उस स्साले...दो कौड़ी के आदमी के साथ तो ऐसा ही होना चाहिए था"...
"क्यों?...उसने क्या तुम्हारी भैंस खोल ली है जो तुम उसे इतना बुरा-भला कह रहे हो?"बीवी तमकती हुई बोली...
"अरे!...भैंस खोली होती तो मैँ उसे नादान समझ कर माफ भी कर देता"...
"तो?"...
"याद है?  जो पिछले साल वैलैनटाईन वाले दिन मेरा और तुम्हारा झगड़ा हुआ था?"...
"हाँ!...अच्छी तरह याद है...उसे कैसे भूल सकती हूँ?"...
"हमारे उस झगड़े की असली वजह...असली कारण...यही गुप्ता ही तो था"...
"क्या बात कर रहे हो?...तुमने पहले कभी नहीं बताया"...
"याद है!...पिछले साल सीलिंग की वजह से अपना काम बड़ा डाउन था"...
"हाँ!...याद है"...
"तो वैलैनटाईन वाले दिन मैँने उससे दो हज़ार रुपए दस्ती क्या माँग लिए....रोनी सी सूरत बना अपना दुखड़ा खुद ही गा-गा सुनाने लगे कि....

  • बीवी पान खाने तक को पैसे नहीं देती है...
  • बीड़ी फूंके कई महीने गुज़र गए....
  • सुरती तक को रि-सॉईकिल कर के चबाता हूँ....
"रि-सॉईकिल?...सुरती को?....मतलब?"...
"मैँने भी उनसे यही...सेम टू सेम...यही सवाल किया था?"...
"फिर क्या जवाब दिया उन्होंने?"...
"कहने लगे..कि...
  • पहले तो सुरती को मज़े से रस ले-ले के चबाता हूँ...
"ओ.के"...
  • फिर स्वाद खत्म होने पर उसे उगल कर चाँदनी रात के दिन धूप में सूखने के लिए डाल देता हूँ" ...
"ओ.के"...
"और फिर ...
"पुन: उसी को रस ले-ले के चबाता हूँ?"...
"जी"...
"छी!....छी-छी"...
"बिलकुल!...बिलकुल मेरे मन में भी उस दिन...उन्हें इसी तरह....छी!...छी-छी कह धिक्कारने के भाव उत्पन्न हुए थे लेकिन अफसोस...मैँ तो  सिर्फ..गुड!...वैरी गुड कर के रह गया"...
"वो भला क्यों?"...
"अरे यार!...उस दिन अगर तुम उस बेचारे के चेहरे की बेचारगी को देखती तो तुम्हारे जैसा पत्थर दिल इनसान भी एक बार को पसीज उठता"...
"ओह!...
"तो इसलिए आपको अपने दिल में उमड़ रहे विचारों के विपरीत गल्त शब्दों को अपनी ज़ुबान देनी पड़ी?"...
"जी"...
"तो फिर क्या कहा उसने?"....
"कहना क्या था?...अपना दुखड़ा गा-गा सुनाने लगा कि...
तलब के मारे इतना बुरा हाल है कि हलक से निवाला तक नीचे नहीं उतरता है".....
"ओह!...
"इस तरह घुट-घुट के....मर-मर के जीने से तो अच्छा है कि 'भंग-धतूरा' निगल के अपनी जान दे दूँ"...
"ओह!...शायद उन्हें पता नहीं होगा कि 'भंग-धतूरे' का स्वाद बड़ा ही विस्मयकारी रूप से कड़वा होता है"...
"जी"...
"तुम्हें उन्हें 'सलफास' खा के आत्महत्या करने का आईडिया देना चाहिए था"...
"हुँह!...'सलफास' खा के आत्महत्या करने का आईडिया देना चाहिए था"....
"तुम्हें कुछ पता भी है कि 'सल्फास' का स्वाद कितना बकबका होता है?"...
"कितना बकबका होता है?"...
"इतना बकबका होता है....इतना बकबका होता है..खाने वाला इनसान असमय ही बकबकाने लगता है"...
"ओह!...फिर क्या हुआ?"...
"मैँने उन्हें समझाया कि गुप्ता जी!...आत्महत्या करना तो बहुत बड़ा पाप है....आप तो अच्छे खासे जवाँ मर्द हैँ....ऐसी नपुंसकता भरी कायराना सोच रखना आपको शोभा नहीं देता"...
"गुड!...अच्छा किया"....
"फिर क्या हुआ?"....
"होना क्या था?.....गुटखा चबाने के नाम पे मुझसे दो रुपए और ले मरे"....
"ओह!...बेचारा...लेकिन एक बात नहीं समझ आ रही"...
"क्या?"...
"यही कि तुमने उस गरीब से पैसे माँगे ही क्यों?
"तुम्हारे लिए"...
"मेरे लिए?"...
"हाँ-हाँ!...तुम्हारे लिए"...
"झूठ!...बिलकुल झूठ...मैँने भला कब तुमसे दो हज़ार रुपए माँगे थे?"...
"पैसे नहीं माँगे थे लेकिन गिफ्ट तो माँगा था"...
"मतलब?"...
"याद करो!...पिछले वैलैनटाईन पर तुमने...मुझपे ऐज़ ए गिफ्ट...घड़ी देने के लिए दबाव डाला था के नहीं?"...
"नहीं!...बिलकुल नहीं...दबाव तो बिलकुल नहीं...तुमने खुद ही प्रामिस किया था"....
"मुझे क्या पागल कुत्ते ने काटा था जो मैँ तुमसे ऐसे वेल्ले प्रामिस करता फिरता?"...
"तुमने!...तुमने ज़बरदस्ती अपने शब्दों को मेरी ज़बान दी थी"...
"अब अपनी मर्ज़ी से हो या फिर ज़बरदस्ती लेकिन तुमने वादा तो किया था ना?"...
"तो?"...
"तुमने वादा किया था...लेकिन निभाया नहीं था"....
"अरे वाह!...ऐसे कैसे नहीं निभाया था?....कुछ तो ऊपरवाले के कहर से डरो"....
"क्यो?...ऊपर कोई डॉन...भाई या फिर कसाई बसता है जो मैँ उससे डरती फिरूँ?"बीवी कमर पे हाथ रख अपनी एक्सरे नज़रों से छत के पार देखने की कोशिश करते हुए बोली...
"अरे मेरी अम्मा!...मैँ किसी 'भाई' या 'कसाई' की बात नहीं कर रहा हूँ बल्कि मैँ तो उस ऊपर बैठे परम पिता परमात्मा याने के ऑल माईटी गॉड की बात कर रहा हूँ कि...उसके कहर से डरो"...
"मैँने कोई चोरी करी है?....या फिर डकैती डाली है?...जो मैँ डरती फिरूँ?"....
"मैँ भला क्यों डरने लगी?....डरें मेरे दुश्मन"....
"ओफ्फो!...पिछले वैलैनटाईन पे मैँने तुम्हें घड़ी ला के दी थी के नहीं?"....
"हाँ!...बड़ी....बहुत बड़ी घड़ी ला के गिफ्ट में दी थी...माँगी मैँने तुमसे 'टाईटन' की हाथ वाली घड़ी थी लेकिन तुम उठा के ले आए थे पैंतीस रुपए में सड़ी सी दिवार घड़ी"....
"अरे!...तुम्हें टाईम देखना था के साईज़ देखना था?.....हाथ घड़ी हो या दिवार घड़ी...क्या फर्क पड़ता है?...
"घड़ी तो थी ना?"...
"हाँ-हाँ!...घड़ी हो या घड़ियाल...तुम्हें क्या फर्क पड़ता है?....पहननी तो मैँने थी ना?...कौन सा तुमने पहननी थी?"...
"तो?"...
"कल को मेरे बजाय किसी टुनटुन को ब्याह के ले आते तो भी तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ना था"...
"अरे!...पागल हो गई हो क्या?...तुम्हारे जैसी मस्त आईटम को छोड़कर मैँ भला टुनटुन को क्यों ब्याह कर लाने लगा?"...
"क्या सच?"...
"और नहीं तो क्या झूठ?"...
"तो फिर सच-सच बताओ"..
"क्या?"...
"यही कि क्या सोच के दिवार घड़ी लाए थे कि मैँ बड़ी खुश होउँगी?...साबासी दूंगी?"....
"अरे!...मेरी माँ....मैँ तो वो घड़ियाल...ऊप्स!...सॉरी घड़ी इसलिए लाया था कि तुम्हें पसन्द आएगी"....
"जी नहीं!...आप इसलिए लाए थे कि बड़ा सा पैकेट दिखा के मेरे साथ-साथ मेरी माँ को भी इंप्रैस कर सको"...
"तेरी माँ से मैँने लड्डू लेने थे जो मैँ उसे प्रभावित करने की सोचता?"...
"अब मुझे क्या पता कि लड्डू लेने थे या फिर....
हा...हा...हा...
"अरे यार!....तुम्हें शुरू से ही बड़ी चीज़ें जैसे 'बड़ी कार'...'बड़ा घर'...'बड़े-बड़े मैच्योर्ड बच्चे पसन्द थे कि नहीं?"...
"तो?"...
"यहाँ तक कि तुम्हें 'बच्चन' भी छोटा वाला नहीं बल्कि बड़ा वाला याने के 'अमिताभ बच्चन' पसन्द था तो मैँने सोचा कि....
"था नहीं!...है"...
"मतलब?"...
"मुझे तो अभी भी बड़ा वाला...याने के 'अमिताभ बच्चन' पसन्द है"...
"ओह!...
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"सच्ची!...जब वो कहता है कि... "याद
रहे!...इस रविवार....दो बूंद ज़िन्दगी की"...lr03
"तो कितना क्यूट और हैण्डसम दिखता है ना?"...
"बहुत"...
"अरे हाँ!...याद आया...तभी....तभी तो मैँ तुम्हारे लिए हाथ घड़ी के बजाय...वो दिवार घड़ी लाया था"...
"क्या सच?"...
"और नहीं तो क्या?"...
"सच्ची!...तुम कितने अच्छे हो"...
"सॉरी यार!...मैँने तुम्हें गलत समझा"...
"इटस ओ.के"...
"तो फिर चलें?"...
"कहाँ?"...
"आलू-प्याज़ माँगने...और कहाँ?"...
"हाँ-हाँ!...क्यों नहीं?....अभी चलते हैँ...तुरंत चलते हैँ"...
हा...हा...हा...हा...
हा....हा...हा...हा...
***राजीव तनेजा***
Rajiv Taneja
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