केवल गम्भीर चिंता करने वाले चिंतक ही इसे पढ़ें - शरद कोकास
हमारे देश में चिंता और चिंतन के द्वन्द्व की परम्परा सदा से रही है । यहाँ हर चिंता करने वाला चिंतक भी है। कई लोग सुबह से ही इस चिंता में डूबे रहते हैं की आज का दिन किस चिंता में बिताया जाये । ऐसा कौन सा चिंतन प्रस्तुत किया जाये जो यह प्रदर्शित करे कि देश और समाज की हमें भी चिंता है । या ऐसी कौनसी चिंता पाली जाये जो चिंतन की तरह महसूस हो । जैसे आज हमारे मित्र ललित शर्मा की सुबह से ही यह चिंता थी कि आज ब्लॉग “ चर्चा पान की दुकान पर “ क्या चिंतन प्रस्तुत किया जाये । जिन्हे इस चिंतन की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी उन्हे कोई चिंता ही नहीं थी और वे अपनी चिंता ललित जी को ट्रांसफर कर कहीं और चिंतन करने चले गये थे । सो ललित जी ने आज सुबह सुबह ही फोन किया कि शरद भाई ,मेरे सर से इस चिंता का बोझ उतारो और आपके रेडीमेड स्टॉक में से कोई कविता ब्लॉग पर लगा दो । इस तरह से अपनी चिंता मुझ पर डाल कर वे निश्चिंत हो गये और इस चिंता को लेकर मेरा चिंतन शुरू हो गया ।
अपने देश में चिंता और चिंतन की परम्परा सदा से रही है । घर से लेकर देश और देश से लेकर विदेश तक यही चलता है । पत्नी ने रात को ही फरमान जारी कर दिया ,सुबह के लिये सब्ज़ी नही है । अब अपनी चिंता मेरे सर पर डालकर वे तो निश्चिंत होकर सो गईं ,हम जाग रहे हैं इस चिंता में कि सुबह होते ही सब्ज़ी लेने जाना है । दफ्तर में देखिये वहाँ भी यही होता है 26 जनवरी को झंडा फहराना है बड़े साहब ने छोटे साहब से कहा , छोटे साहब ने बड़े बाबू से और बड़े बाबू चपरासी पर अपनी चिंता डालकर निश्चिंत हो कर सो गये। अब चपरासी लगा है यह देखने में कि झंडा धुला है या नहीं, झंडा बान्धने का डंडा ठीक है या नहीं ..जैसे वही एक अकेला हो संविधान का रखवाला । और फहराने और फोटो खिंचाने तक तो ठीक है बड़े साहब से लेकर छोटे तक सब आ जायेंगे लेकिन शाम को झंडा उतारते वक्त उसे अकेले ही आना होगा जबकि झंडा फहराना जितना महत्वपूर्ण काम है उतना ही महत्वपूर्ण है उसे उतारना । कवि रघुवीर सहाय ने ऐसे ही लोगों के बारे में कहा है ... “राष्ट्रगीत में कौन भला वह भारत भाग्य विधाता है / फटा सुथन्ना पहने जिसके गुन हरचरना गाता है ।“ खैर अभी तो 26 जनवरी दूर है अभी से चिंता क्यों करें ।
लेकिन यह भी होता है कि कई लोग ऐसी ऐसी चिंता में डूबे रहते हैं जिसका कोई अर्थ ही नहीं होता । अचानक कहीं किसी अखबार में छपता है .. फलाने महीने की फलानी तारीख को दुनिया खत्म । फिर टीवी चेनल भी राग अलापना शुरू कर देते हैं । आम आदमी हो या खास आदमी ..चिंतन शुरू । कोई कहता है यह जीवन तो पानी का बुलबुला है , जीवन् तो हवा का एक झोंका है । बबली जी अपनी कविता में कहती हैं " जीवन एक खेल है / सुख और दुख का मेल है "। कोई कहता है मनुष्य का जीवन तो क्षणभंगुर है , हमारी किताबों मे लिखा है कि एक दिन यह दुनिया नष्ट हो जायेगी ..सब कुछ खत्म हो जायेगा .. इसलिये पाप मत करो ..फिर दान धर्म .पूजा पाठ सब चालू हो जाता है । पान की दुकान वाले से लेकर प्रवचन करने वाले बाबाओं के चिंतन की सूची मे यह मुद्दा टॉप पर रहता है । फिर एक दिन आता है वह तारीख भी निकल जाती है और जितने भी पुण्य़ कमाने का उपदेश देने वाले होते है पुन: पाप कर्म में डूब जाते हैं ।
चलिये यह चिंतन तो हो गया अब ललित भाई के आदेशानुसार कोई कविता ढूँढी जाये . लीजिये सभी लोगों ने जीवन के बारे में चिंतन किया तो हम भी कर लेते है , एक परिभाषा कभी रची थी इस जीवन की ..कि यह जीवन है जिसकी कोई परिभाषा नहीं , सो प्रस्तुत कर रहे हैं...
और जीवन भी कोई गोलगप्पा नहीं जिसे आप पुदीने की चटनी मिले जलजीरे में डुबोये
और परम संतृप्तता के भाव में गप से खा जाये
अपनी अजीब अजीब परिभाषाओं में जीवित है यह
जीने की उत्सुकता और सम्भावनाओं से भरा जीवन ।
अपनी 53 पेज की लम्बी कविता “पुरातत्ववेत्ता “से उद्धृत इस अंश के साथ दुनिया की चिंता आप पर सौंपता हूँ और आपसे विदा लेता हूँ । फिर मुलाकात होगी ।
आपका - शरद कोकास