शनिवार, 2 अप्रैल 2011

वाकई , आईडिया हो तो ऐसा !

                                                                                                   
                                                                      ( लघु-कथा )
                                                                                             लेखक   -- स्वराज्य करुण  
  देश के पहरेदार और समाज के ठेकेदार अब  हमको और आपको 'जागते रहो' की पुकार लगा कर सावधान नहीं करते.  आज-कल उनका जोशीला नारा हो गया है--'खेलते रहो, खेलते रहो '. इसी में उनकी भलाई है . क्यों और कैसे , यह जानना हो , तो  पढ़िए यह लघु-कथा . 
   किसी देश के एक  शहर में  कुछ जागरूक युवाओं ने महंगाई , मिलावट ,मुनाफाखोरी, जमाखोरी, बेरोजगारी   कल-कारखानों के बढ़ते  प्रदूषण और सार्वजनिक जीवन में व्याप रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष के लिए प्रगतिशील   युवा मंच का गठन किया था. काले कारोबारियों ,  उद्योगपतियों  और  अज़गर संस्कृति वाले भ्रष्ट अफसरों ने अपने कथित वी.आई .पी. क्लब में शराब की बहती नदी के बीच  इस समाचार को छोटे परदे के लाफ्टर -शो वाले जोकरों का कोई लतीफा मान कर चटखारों के साथ इसका खूब मज़ा लिया.
         एक दिन युवा मंच के कार्यकर्ताओं   ने सेठ धरमचंद  की दुकान पर मिर्च के पैकेट में लकड़ी के बुरादे की मिलावट पकड़ ली. दूसरे दिन इन्ही  कार्यकर्ताओं ने एक मशहूर मिठाई की दुकान' मधुर मिष्ठान्न'  में नकली खोवे का जखीरा बरामद किया . प्रमाण सहित दोनों मामलों की शिकायत स्थानीय खाद्य-निरीक्षक से की गयी. लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई . कलेक्टर को लिखा गया .  कोई ज़वाब नहीं आया .शिकायत ने और भी आला      -अफसरों के दफ्तरों तक दौड़ लगाई . फिर भी  कोई नतीजा नहीं निकला . सेठ धरमचंद  और  मिठाई दुकानदार  दोनों खूब हँस रहे थे ,लेकिन प्रगतिशील युवा मंच  ने जब नाराज़ हो कर शहर बंद का आव्हान किया ,तो दोनों चिंतित हो गए .
                           सेठ जी ने मोबाईल फोन पर आरा -मिल के मालिक सत्यव्रत  और मधुर-मिष्ठान्न के प्रोप्राइटर   हरिश्चन्द्र  को आपात बैठक के लिए बुलवाया . दरअसल जिस मामले को वे तीनों मामूली समझ रहे थे ,वह उतना ही गंभीर होता जा रहा था .  मिलावट से परेशान जनता इन युवाओं को समर्थन दे रही थी . सत्यव्रत जी का चिंतित होना भी स्वाभाविक था.क्योंकि सेठ धरमचंद  के 'देशभक्त ब्रांड ' मिर्च के लिए लकड़ी के बुरादे की पूर्ति उनके आरा-मिल से होती थी.  हरिश्चन्द्र जी  के माथे पर भी गहरी चिंता की लकीरें उभरने लगी थी .कारण यह कि नकली खोवे के राष्ट्रीय कारोबार में भी तीनों  साझेदार थे.
                        अब तक तीनों को मिलावट के इस काले कारोबार में करोड़ों का मुनाफ़ा हो चुका था और वे पिछले कई वर्षों से  ऐश-ओ-आराम की जिंदगी का मज़ा ले रहे थे .रहस्यों का पर्दाफ़ाश होने पर अब उन्हें यह फायदे का व्यापार डूबता दिखाई दे रहा था. तीनों साझेदारों की आपात बैठक सेठ धरमचंद  के महलनुमा  मकान में शुरू हुई . बैठक में सेठ धरमचंद  ने धरम-करम का हवाला देते हुए कहा - जनता को बेवकूफ बना कर रूपए कमाने के दिन लगता है कि लद गए .  क्या करें ,समझ में नहीं आ रहा . सत्यव्रत जी ने उन्हें दिलासा देते हुए कहा- '' निराश नहीं होना चाहिए . तुम तो अभी से हिम्मत हार रहे हो.'' धरमचंद  ने मायूसी के साथ कहा -''अब उपाय ही क्या रह गया है सत्यव्रत भाई ? '' तभी सेठ धरमचंद  का पैंतीस वर्षीय सुपुत्र वसूलीचंद  ' 'उपाय है बाबूजी ,मै बताता हूं '' कहते हुए कमरे में आया . वह स्थानीय महाविद्यालय  में पिछले दस वषों से समाज-शास्त्र में एम.ए. का छात्र था और छात्र-संघ का अध्यक्ष भी. ''क्या उपाय है बेटे ? ''--तीनों साझेदारों ने बहुत व्यग्र होकर उसकी तरफ देखा . इस पर मुस्कुराते हुए 'धर्म-पुत्र ' ने उन्हें जो उपाय बताया , उसे सुनकर तीनों मित्रों की बांछे खिल उठीं . सत्यव्रत  जी ने धरमचंद  की पीठ ठोंकी -वाह ! क्या होनहार बेटा पाया है तुमने !
                                    'मिलावटखोरों के खिलाफ कल शहर बंद के आयोजन को सफल बनाएँ ' --प्रगतिशील युवा मंच  के कार्यकर्ता एक सायकल रिक्शे पर घूम-घूम कर लाऊड स्पीकर से नागरिकों के नाम अपील प्रसारित कर रहे थे . जनता में मिलावटखोरों के खिलाफ  काफी  गुस्सा था. लिहाजा ,वह इस बंद को कामयाब बनाने के लिए मानसिक रूप से तैयार थी . बंद के दिन रास्ते वीरान हो गए थे . मिलावटखोरों ने   भी डर के मारे अपनी दुकानें बंद रखी . नागरिकों का यह स्व-स्फूर्त  बंद शत-प्रतिशत सफल होने के  साफ़-साफ़  संकेत दे रहा था. सुबह के दस बजे ही थे .         
    तभी शहर की वीरान सडकों पर एक मोटर गाड़ी घूमने लगी , जिस पर लाऊड-स्पीकर से ऐलान किया जा रहा था ---  ' आज सवेरे नेहरु-स्टेडियम में  हमारे जिले और पड़ोसी जिले के  प्रसिद्ध क्लबों की मशहूर टीमों के बीच बीस-बीस ओवरों का क्रिकेट मैच होगा. इसका शुभारंभ महेंद्र सिंह धोनी के ड्राय -क्लीनर  सुरेन्द्र सिंह जी करेंगे . आप लोगों से निवेदन है कि मैच देख कर अपना मनोरंजन करें और खिलाड़ियों का भी हौसला बढाएं ! ''  फिर क्या था ? स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थी अपने घरों से निकल कर परेड-मैदान की तरफ दौड़ने लगे ! मूंगफली . चाट-पकौड़े , टायलेट-क्लीनर (कोल्ड-ड्रिंक ), पान-गुटका और बीडी -सिगरेट बेचने के लिए खोमचे वाले और छोटे दुकानदार भी दौड़े ! शहर के रईसजादों की चमचमाती कारें भी मैदान की ओर दौड़ने लगी .मैदान खचाखच भर गया . विशेष अतिथियों के लिए आरक्षित सीटों पर बैठे सेठ धरमचंद  , सत्यव्रत  और हरिश्चन्द्र  काफी खुश नजर आ रहे थे . उन्होंने देखा - शहर के नागरिक मिलावट की समस्या को भूल कर क्रिकेट मैच देखने में मगन हैं   और नगर-बंद की अपील करने वाले प्रगतिशील युवा मंच  के कार्यकर्ता अपना सिर धुन रहे हैं !
        सत्यव्रत जी ने सेठ धरमचंद  को बधाई दी और कहा --- '' वाह ! क्या आइडिया दिया था तुम्हारे लाडले बेटे ने ! अब हम 'देशभक्त'  ब्रांड मिर्च पावडर का व्यापार खुलकर आसानी से कर सकेंगे !    मिर्च पावडर में बुरादे की मिलावट के लिए   मेरी   'जंगल-प्रेमी'  आरा मशीन  भी खूब चलेगी    !''   बधाई हो धरमचंद  !  मेरी नकली खोवे की मिठाइयां  भी खूब बिकेंगी !''--हरिश्चन्द्र ने चहकते हुए कहा . क्रिकेट मैच देखने के बाद तीनो साझेदार खुशी-खुशी एक  सितारा होटल के  बीयर-बार में गए,जहां  उन्होंने  जमकर जाम छलकाया .
                                                                                                                      लेखक -  स्वराज्य करुण

2 टिप्पणियाँ:

Manpreet Kaur 2 अप्रैल 2011 को 11:37 am  

अच्छा पोस्ट है जी ! हवे अ गुड डे !
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Udan Tashtari 5 अप्रैल 2011 को 2:43 am  

तुम भी खुश-हम भी खुश!!


बाकी सब चले छुक-छुक!!

नवसंवत्सर पर हार्दिक शुभ कामनाएँ.